बिहार विधानसभा चुनाव होने में अभी व़क्त है, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियों से औरंगाबाद में ऐसा लग रहा है, जैसे चुनाव सिर पर हैं. सभी राजनीतिक दल चुनाव की तैयारी ज़ोरशोर से कर रहे हैं. एक ओर कांग्रेस का संगठन चुनाव और युवक कांग्रेस का सदस्यता अभियान चल रहा है, वहीं राजद-लोजपा गठबंधन अपने आंदोलन से राज्य सरकार को उखाड़ फेंकने पर आमादा नज़र आ रहा है. दोनों विपक्षी दलों की राजनीतिक गतिविधियों में टिकटार्थी नेताओं की ज़्यादा भागीदारी नज़र आ रही है. लगता है, एक अनार-सौ बीमार वाली स्थिति उत्पन्न होने वाली है. ज़िले के सभी छह विधानसभा क्षेत्रों की ओर यदि नज़र दौड़ाएं तो सभी प्रमुख दलों में टिकटार्थी नेता अपनी गोटी फिट करने की कोशिश में लगे हुए हैं.
जहां तक गठबंधनों की बात है तो राज्य की स्थिति के अनुरूप यहां भी एक ओर भाजपा-जदयू तो दूसरी ओर राजद-लोजपा गठबंधन है. तीसरी ओर कांग्रेस एकला चलो रे की नीति पर चुनाव मैदान में उतरेगी. जदयू-भाजपा में गठबंधन की स्थिति पिछली बार जैसी ही बनती नज़र आ रही है. इस स्थिति में भाजपा के खाते में औरंगाबाद की ही सीट आएगी, जबकि अन्य पांच सीटें जदयू की झोली में जाएंगी. यही बात राजद-लोजपा गठबंधन के मामले में भी लागू होती नज़र आ रही है. लोजपा के खाते में उसके क़ब्ज़े वाली नबीनगर की सीट ही आएगी, जबकि अन्य सीटों पर राजद के उम्मीदवार मैदान में होंगे. कांग्रेस की स्थिति कुछ अलग है. इस बार पार्टी का हर कार्यकर्ता उत्साहित है और वह अकेले दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का आकांक्षी है. यही कारण है कि राजद एवं कांग्रेस में टिकटार्थियों की संख्या कुछ ज़्यादा है. सीटों पर नज़र दौड़ाने की शुरुआत अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित कुटुंबा विधानसभा क्षेत्र से करते हैं. वर्तमान में यह सीट जदयू के क़ब्ज़े में है. यहां से रेणु देवी प्रतिनिधित्व कर रही हैं. हालांकि बहुत अच्छी स्थिति न होने के बावजूद सेटिंग-गेटिंग के आधार पर उनका टिकट पक्का लगता है, लेकिन उन्हें दरकिनार कर अरविंद पासवान एवं रामचंद्र चौधरी जैसे नेता भी यहां से टिकट के दावेदार हैं. रामचंद्र चौधरी विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के क़रीबी रिश्तेदार हैं. लिहाज़ा टिकट मिलने का उन्हें पूरा भरोसा है, जबकि इसी सीट से कांग्रेस के राजेश राम अपने पिता स्वर्गीय दिलकेश्वर राम (पूर्व स्वास्थ्य मंत्री) की विरासत संभालने के इरादे से टिकट के आकांक्षी हैं. उन्हें वरिष्ठ नेताओं का समर्थन हासिल है, लेकिन अक्षय पासवान, डॉ. रामनंदन चौधरी एवं ब्यास राम जैसे नेता भी इस सीट से कांग्रेस की ओर से टिकट की दावेदारी करने में पीछे नहीं हैं.
एक ओर कांग्रेस का संगठन चुनाव और युवक कांग्रेस का सदस्यता अभियान चल रहा है, वहीं राजद-लोजपा गठबंधन अपने आंदोलन से राज्य सरकार को उखाड़ फेंकने पर आमादा नज़र आ रहा है. दोनों विपक्षी दलों की राजनीतिक गतिविधियों में टिकटार्थी नेताओं की ज़्यादा भागीदारी नज़र आ रही है. लगता है, एक अनार-सौ बीमार वाली स्थिति उत्पन्न होने वाली है.
नबीनगर सीट अभी लोजपा के क़ब्ज़े में है और विजय कुमार सिंह उ़र्फ डब्लू सिंह को ज़िले का इकलौता पार्टी विधायक होने का गौरव हासिल है. इस स्थिति में राजद के साथ तालमेल में यह सीट सेटिंग-गेटिंग के आधार पर लोजपा के खाते में होगी. इसके अलावा पार्टी को ज़िले की कोई और सीट मिलने की उम्मीद नज़र नहीं आ रही है. यहां से पिछली बार जदयू प्रत्याशी सुशील कुमार सिंह को पराजय का मुंह देखना पड़ा था, लेकिन वह औरंगाबाद से सांसद हैं. इस नाते जदयू उम्मीदवार के तौर पर उनकी पसंद का ख्याल ज़रूर रखा जाएगा. उनके पसंदीदा उम्मीदवार के रूप में सुनील कुमार यादव का नाम चर्चा में है. जहां तक कांग्रेस की बात है तो इस सीट से फिलहाल श्याम बिहारी सिंह का नाम चर्चा में है. ओबरा की सीट अभी राजद के सत्य नारायण यादव के क़ब्ज़े में है और उनका टिकट पक्का माना जा रहा है. लेकिन, एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के सहयोग से राम नरेश सिंह एवं दिलीप यादव खुद टिकट हथियाने की फिराक़ में हैं. कांग्रेस की ओर से अरविंद शर्मा एवं किरण शर्मा का नाम हवा में तैर रहा है. दोनों में से किसी को भी टिकट मिल सकता है. पिछली बार दूसरे स्थान पर रहे जदयू के प्रमोद चंद्रवंशी इस बार भी टिकट के लिए प्रयासरत हैं. वैसे इस सीट से जदयू के व्यवसायिक प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष शंभु प्रसाद टिकट के आकांक्षी हैं, लेकिन उनकी दिल्ली दूर लग रही है. इस सीट से दो बार विधायक रहे और दो बार पराजय का सामना कर चुके भाकपा(माले) के राजाराम सिंह भी चुनाव मैदान में होंगे. तालमेल में यह सीट राजद के खाते में जाने की प्रबल संभावना के बावजूद पिछली बार लोजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके अभिमन्यु शर्मा भी टिकट की लाइन में खड़े नज़र आ रहे हैं.
गोह क्षेत्र से डॉ. रणविजय कुमार विधायक हैं, जो चुनाव जीतने के एक साल बाद से ही एक मामले में अब तक जेल में हैं. इस स्थिति में पार्टी किसी और को टिकट दे सकती है, लेकिन फिलहाल किसी नए नाम की चर्चा नहीं है. कांग्रेस से इस बार कौकब कादरी का टिकट तय माना जा रहा है, जबकि राजद में संतोष यादव, कौलेश्वर यादव एवं राम अयोध्या यादव टिकट के लिए ज़ोर आज़माइश कर रहे हैं. रफीगंज सीट राजद के डॉ. नेहालुद्दीन के क़ब्ज़े में है. उनका टिकट लगभग पक्का है. इस सीट से जदयू के उम्मीदवार के रूप में दूसरी पार्टी से आए अशोक कुमार सिंह द्वारा दावेदारी जताई जा रही है. जबकि कांग्रेस से डॉ. विजय कुमार सिंह चुनाव लड़ने के आकांक्षी बताए जा रहे हैं. सबसे ज़्यादा घमासान औरंगाबाद सीट पर होने के आसार हैं. यह सीट वर्तमान में भाजपा के रामाधार सिंह के क़ब्ज़े में है और उन्हें टिकट मिलना तय है. यहां से कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष यमुना सिंह भी चुनाव लड़ने के आकांक्षी हैं, लेकिन यहां पूर्व सांसद श्यामा सिंह का नाम भी हवा में तैर रहा है. राजद में भी सबसे ज़्यादा मारामारी औरंगाबाद सीट को लेकर है. यहां एक अनार-सौ बीमार की तर्ज़ पर पूर्व विधायक सुरेश मेहता, रवींद्र सिंह, सेठ विनय प्रसाद, पूर्व ज़िला परिषद अध्यक्ष राघवेंद्र प्रताप, बैजनाथ मेहता एवं पूर्व विधान पार्षद डॉ. शंकर दयाल सिंह चुनावी टिकट के लिए मैराथन दौड़ में शामिल हैं. लेकिन, टिकट उसे ही मिलेगा, जो लालू प्रसाद की पसंद बन पाएगा.
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