बीटी बैगन के मामले में पूरे देश में चल रही विचार-विमर्श की प्रक्रिया का समापन जिस तरह से वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अपने विचार प्रकट करके किया है, मैं भी उस पर अपनी राय देना चाहता था. लेकिन, मेरे दोस्त जो जनवरी 2010 में बैंगलुरु में एक सेमिनार का आयोजन कर रहे थे, वे चाहते थे कि मेरी राय दूरदर्शी हो. लेकिन मैं इस विचार से हैरान हूं. कोई व्यक्ति कैसे दूरदर्शी बयान दे सकता है? कोई बहुत ही मूर्ख आदमी यह सोच सकता है कि फलां व्यक्तिदूरदृष्टि वाला है और ऐसी बात कह सकता है, जो आगे चलकर बिल्कुल सही हो जाए. बात चाहे जो भी हो, जहां तक मैं अपनी बात करूं तो 40 साल से ज़्यादा हो गए. उन दिनों मैं कॉलेज में था. मैं दृष्टिदोष का शिकार हो गया. डॉक्टरों ने कहा कि मैंने नंगी आंखों से सूर्यग्रहण देख लिया है, इसलिए मेरी आंख की कॉर्निया क्षतिग्रस्त और नज़र अस्पष्ट हो गई है. वह पहला मौक़ा था, जब मेरी नज़र में सुधार किया गया. बाद में ऐसे कई अवसर आए, जब ज़िंदगी में मुझे अपनी नज़र में तत्काल सुधार की ज़रूरत महसूस हुई. चाहे वह साहित्य, कला और मीडिया के बारे में मेरी समझ की बात हो या फिर अपने इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों को समझने की बात क्यों न हो.
अगर आज कोई दूरदर्शिता भरा बयान देना है तो वह उनका नज़रिया होगा. आज मैं उस नज़रिए को ही प्रस्तुत करना चाहूंगा. पिछले दिनों विश्व समुदाय के सामने जलवायु परिवर्तन पर कम्युनिटी चार्टर पेश करने के लिए मैं कोपेनहेगन में था. एक आयोजन में इस बात पर परिचर्चा हो रही थी कि दुनिया की सरकारों के सामने क्या मांग रखी जानी चाहिए.
सत्तर के दशक की बात है. तब मैं दूरदर्शन के लिए टेलीविज़न प्रोड्यूसर का काम कर रहा था. उस समय मैं अक्सर कर्नाटक के गुलबर्ग, रायचूर और बीजापुर ज़िलों का दौरा करता था. ये वे ज़िले थे, जिन्हें विकास मामलों के जानकार बिल्कुल पिछड़ा मानते थे. मैं भी उन्हें वास्तविक तौर पर पिछड़ा ही मानने लगा. वहां मैं ऐसे लोगों से जुड़ा, जो मददगार प्रवृत्ति के थे. कहां मैं मीडिया से जुड़ा व्यक्ति और कहां उन जैसे पिछड़े लोग! उन्हें मुझसे सीखने को तैयार रहना चाहिए. लेकिन कुछ माह ही बीते होंगे, मेरा सारा दृष्टिकोण बदल गया. सुदूर बसे और दुर्गम माने जाने वाले गांवों के लोगों से जब मेरे ताल्लुकात बढ़े, उनकी चौपालों में चारपाई पर मेरा उठना-बैठना शुरू हुआ, उनकी रसोइयों तक मैं गया और उनके खेतों-खलिहानों तक पहुंचा तो धीरे-धीरे विकास के प्रति मेरा पूरा नज़रिया ही बदल गया. मैंने इस बात की तलाश शुरू कर दी कि डेवलपमेंट मीडिया में हमारे दृष्टिकोण कितने संकीर्ण थे. इससे बड़ा सुधार हुआ. मेरे नज़रिए में सबसे बड़ा बदलाव दो दशक पूर्व तब आया, जब आंध्र प्रदेश के मेडक ज़िले में पांच हज़ार दलित महिलाओं के साथ मैंने काम करना शुरू किया. यह भी वह इलाक़ा है, जो का़फी पिछड़ा माना जाता है. वे महिलाएं समाज के का़फी अंत्यज्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती थीं. वे सभी लघु और सीमांत किसान थीं. उनमें से ज़्यादातर पढ़ी-लिखी भी नहीं थीं. लेकिन, उन्होंने मुझे जो सिखाया, उससे मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि उन्हें खाद्य और फसल के बारे में गहरी समझ थी. उन्होंने कृषि के प्रति मेरे नज़रिए में परिवर्तन किया. उसके बाद इससे जुड़े मुद्दों पर मेरी पूरी सोच ही बदल गई.
इसलिए, अगर आज कोई दूरदर्शिता भरा बयान देना है तो वह उनका नज़रिया होगा. आज मैं उस नज़रिए को ही प्रस्तुत करना चाहूंगा. पिछले दिनों विश्व समुदाय के सामने जलवायु परिवर्तन पर कम्युनिटी चार्टर पेश करने के लिए मैं कोपेनहेगन में था. एक आयोजन में इस बात पर परिचर्चा हो रही थी कि दुनिया की सरकारों के सामने क्या मांग रखी जानी चाहिए. मध्य प्रदेश की एक महिला जो प्रतिनिधि मंडल के साथ थीं, अचानक बोलीं, उन्हें कह दीजिए कि हमें कोई मांग नहीं करनी है. लेकिन, अगर वे इस धरती पर जीवन फिर से वापस लाना चाहते हैं तो मांग हम लोगों के सामने उन्हें रखनी चाहिए. ऐसा इसलिए, क्योंकि जीवन और प्रकृति के साथ कैसे जिया जाता है और कैसे उनकी देखभाल की जाती है, इस बारे में केवल हमें पता है. कहने का मतलब यह कि उन्होंने उन सारी शिक्षाओं का निचोड़ मेरे सामने रख दिया, जिसे पिछले दो दशकों के दौरान मैंने सीखा था. उस महिला ने मुझसे जो कुछ कहा, उसकी शिक्षा यह थी कि अगर आप इस ग्रह पर कृषि को जिंदा रखना चाहते हैं तो इसे पृथ्वी, बीजों, पौधों, फसलों और खाद्यान्नों के साथ हमारे मानवीय रिश्ते के तौर पर देखा जाना चाहिए. सभी चीज़ों में ज़िंदगी अंतर्निहित है. इसे पहचानो और इसका आदर करो. उस महिला ने जो कहा, अगर उसे सही तरीक़े से समझा जाए और उस पर अमल किया जाए तो बीटी बैगन जैसे मुद्दे अप्रासंगिक हो जाएंगे.
जिस महिला के साथ मैंने काम किया, ऊंची पैदावार की अवधारणा पर वह जोर से हंस पड़ती है. उसके अनुसार, हाईब्रीड सीड्स वह चीज़ नहीं है, जिससे ख़ुशहाली लाई जा सके. वास्तव में ये वे बीज हैं, जो हमें आगम पंतालू (क्रेजी क्रॉप्स) देते हैं. यह अवधारणा इस विश्वास से निकली है कि प्रकृति के कुछ नियम हैं. और, नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं कि हमें धरती से कितना कुछ लेने की ज़रूरत है. अगर बेलगाम तरीक़े से ज़मीन से फसल लेने की कोशिश करेंगे तो आप धरती से जीवन पाने की चिरौरी नहीं कर रहे होंगे, बल्कि उसका ख़ून चूस रहे होंगे. उस ख़ून से आपको थोड़ी देर के लिए भले ही ख़ुशहाली पाने में मदद मिल जाए, लेकिन अंततः वह मौत के मुंह में समा जाएगी और आप ख़ाली हाथ रह जाएंगे. आप अनाथ हो जाएंगे. आधुनिक विज्ञान यह बताता है कि हमें कभी भी उम्र में छोटी लड़की के साथ विवाह बंधन में बंधने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. जब तक कि वह किशोरावस्था को पार नहीं कर लेती, उसे गर्भधारण नहीं करना चाहिए. हमारी आबादी बेलगाम न बढ़े और जन्म दर नियंत्रण में रहे, इसके लिए करोड़ों रुपये भी ख़र्च किए गए. विज्ञान भी इस बात का हिमायती है कि धरती पर भीड़ नहीं बढ़नी चाहिए. तो फिर वही विज्ञान अंकुरण, जन्म और वृद्धि के प्राकृतिक चक्र को पूरा किए बग़ैर फसलों को सीमित अवधि में तैयार करने को जायज़ कैसे कह सकता है? हमारी आबादी न बढ़े, इसके लिए तो परिवार नियोजन जैसी योजना है, लेकिन धरती माता के लिए कोई इस नज़रिए से क्यों नहीं सोचता? वह अनिवार्य रूप से अनियंत्रित होकर हमें क्यों कुछ प्रदान करें?
अगर हम मेदक की दलित महिला के नज़रिए से देखें तो हमें तुरंत ही इस बात का पता चल जाएगा कि जेनेटिक इंजीनियरिंग, जिसका लक्ष्य धरती से अनियंत्रित पैदावार लेना है और जो प्रकृति के सभी नियमों से दूर होती जा रही है, कैसे जीवन का विज्ञान नहीं है और कैसे बीटी बैगन मौत का प्रतीक बन गया है. इसलिए हमारे सामने सवाल पृथ्वी पर जीवन का मार्ग प्रशस्त करने या प्रकृति की मौत का है. और, मुझे लगता है कि कुछ भी चुनना बहुत आसान है.
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