कोलकाता के पास टीटागढ़ के जूट मिल मज़दूर शाम को चौपाल में जब लोक गायिका प्रतिभा सिंह का यह गीत गाते हैं तो माहौल गमगीन हो जाता है. ढोलक की थाप और झाल की झनकार में सिसकते आंसुओं की आवाज़ भले ही दब जाती हो, पर जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे जूट मज़दूरों की बस्तियों में दरिद्रता का अंधेरा गहराता जा रहा है. सूदखोरों की चांदी है. हताशा के आख़िरी छोर पर पहुंच गए हैं चटकलिया मज़दूर. पिछले साल 14 दिसंबर से पश्चिम बंगाल की 54 में से 52 जूट मिलों के 2,50,000 म़जदूर बेमियादी हड़ताल पर हैं. पांच चक्र की त्रिपक्षीय वार्ताओं के विफल होने के बाद उन्होंने यह रास्ता अख्तियार किया. हड़ताल में वाम ट्रेड यूनियनें, इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस और भारतीय मज़दूर यूनियन सहित कुल 20 यूनियनें शामिल हैं. राज्य की जो दो मिलें खुली हैं, उनमें तृणमूल कांग्रेस की इंडियन नेशनल तृणमूल ट्रेड यूनियन कांग्रेस का दबदबा है. अन्य दस मिलें भी बंद होने की कगार पर हैं, क्योंकि उनके मालिकों को पर्याप्त मुना़फा नहीं हो रहा है. मालूम हो कि भारी घाटे के कारण राज्य की पांच सरकारी जूट मिलें बंद हो चुकी हैं.
फेर दिहलस गाचा चटकल, मुंहझौसा ताला लटकल
नोकरिया अब हम कहां पाईं ए राम!
बहिनी के गवना बा, बिटिया सयान बा,
बाबू जी के दवा चाहीं, टूटल पलान बा,
देशवा लउट कइसे जाईं हे राम!
सोचा जा सकता है कि बंगाल के जूट श्रमिक अभी किस अवस्था में जी रहे होंगे. त्रिपक्षीय वार्ताओं के लंबे-लंबे दौर चल रहे हैं. केंद्र हो या राज्य सरकार, सब जनता की भलाई का दावा करती हैं, पर समाधान नहीं निकल रहा है. यूनियन नेताओं को भी श्रमिकों ने ही चुना है, पर उन्हें गतिरोध की उलझी गुत्थी सुलझाने का कोई छोर नहीं मिल रहा है. पिछले दशक में 2002 और 2004 में राज्य की जूट मिलें बंद हुई थीं, पर महीने भर में हल निकल आया. इसी तरह 2007 में 63 और 2008 में 18 दिनों तक जूट हड़ताल चली थी. इस बार की हड़ताल के भी दो माह पूरे होने को हैं. जूट मिल मालिक अस्थायी एवं ठेका श्रमिकों की सेवाएं लेने पर जोर दे रहे हैं और वेतन को उत्पादकता से जोड़ रहे हैं. राज्य सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ख़ुद ही ठेका प्रथा पर उतर आई है. कुछ और क्षेत्रों में ठेकेदारी शुरू करने की तैयारी है और इसी वजह से वह अपना हाथ बंधा हुआ महसूस कर रही है. इसके अलावा मिल मालिक किसी भी तरह की वार्ता के लिए यूनियनों की एक इकाई गठित करने की मांग कर रहे हैं. अक्सर देखा गया है कि समझौते से कुछ यूनियनें असहमत हो जाती हैं और मिल में विवाद एवं अशांति की स्थिति बनी रहती है.
हड़ताल के 46वें दिन 28 जनवरी को हुई त्रिपक्षीय वार्ता में मिल मालिकों के प्रतिनिधियों ने संशोधित वेतन और बकाए को किस्तों में चुकाने का प्रस्ताव किया. इस पर यूनियनों का रुख़ थोड़ा नरम हुआ है, लेकिन गतिरोध जस का तस है. मालूम हो कि पूरे देश में क़रीब 50 लाख लोग अपनी जीविका के लिए जूट उद्योग पर आश्रित हैं. इनमें 50 लाख किसान हैं और छह लाख लोग श्रमिक, छोटे व्यापारी और ब्रोकर हैं. पूरे देश के जूट उत्पादन में पश्चिम बंगाल का हिस्सा आधा है और कच्चे जूट के उत्पादन में राज्य के क़रीब 40 लाख किसान लगे हुए हैं. पैकेजिंग के लिए सिंथेटिक सामग्रियों के चलन के बढ़ते ही इस उद्योग पर संकट के बादल मंडराने लगे. पिछले साल सितंबर में आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने सरकारी एजेंसियों द्वारा ख़रीदी गई चीनी और अनाज की पैकेजिंग जूट के बस्तों में ही करने के क़ानून को बहाल रखा. मालूम हो कि 1987 के जूट पैकेजिंग मटीरियल (कंपल्सरी यूज इन पैकेजिंग कमोडिटीज) अधिनियम की वजह से ही भारत के कुल जूट उत्पादन का 58 प्रतिशत हिस्सा खप जाता है. वैसे पिछले साल केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के एक चौथाई चीनी एवं अनाज की पैकेजिंग में सिंथेटिक सामग्रियों के उपयोग की अनुमति देने से कच्चे जूट और जूट के बस्तों की क़ीमतों में भारी गिरावट आई. जूट उद्योग की लड़खड़ाती हालत के लिए मध्य पूर्व और यूरोप में जूट की क़ीमतों में हुई कमी भी ज़िम्मेदार है.
सोचा जा सकता है कि बंगाल के जूट श्रमिक अभी किस अवस्था में जी रहे होंगे. त्रिपक्षीय वार्ताओं के लंबे-लंबे दौर चल रहे हैं. केंद्र हो या राज्य सरकार, सब जनता की भलाई का दावा करती हैं, पर समाधान नहीं निकल रहा है. यूनियन नेताओं को भी श्रमिकों ने ही चुना है, पर उन्हें गतिरोध की उलझी गुत्थी सुलझाने का कोई छोर नहीं मिल रहा है.
28 जनवरी को मंत्रिमंडल ने आधुनिकीकरण के लिए जूट मिल मालिकों को दी जाने वाली सब्सिडी की सीमा 75 लाख से बढ़ाकर 3.5 करोड़ रुपये कर दी. इसमें भी पूर्वोत्तर की नई और वर्तमान जूट मिलों के लिए सब्सिडी की सीमा एक करोड़ रुपये होगी, जबकि देश के बाक़ी राज्यों के लिए यह सीमा 75 लाख रुपये है. इस स्कीम के लिए कुल योजना आवंटन 80 करोड़ रुपये का है. उपभोक्ता मामलों, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने रबी की फसलों के लिए कपड़ा मंत्रालय से 3.80 लाख बेल जूट बैग की मांग की थी, पर हड़ताल को देखते हुए वह इस मात्रा को कम करना चाहती है, क्योंकि फसल आने तक इतना उत्पादन नहीं हो पाएगा. हालांकि इंडियन जूट मैर्न्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के चेयरमैन संजय कजरिया ने कहा है कि अगर यह मात्रा कम की गई तो जूट मिलों का फिर से खुलना मुश्किल हो जाएगा.
हड़ताल तोड़ने के लिए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की कोशिशें भी अभी तक विफल साबित हुई हैं. हाल ही में 20 ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों के साथ सचिवालय में हुई बैठक विफल हो गई और उन्होंने मज़दूर नेताओं की बात मालिकों तक पहुंचाने का आश्वासन दिया. भट्टाचार्य ने एक पत्र में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है. उधर संजय कजरिया ने बताया कि 2010-11 के जूट वर्ष में केंद्र सरकार ने 9.7 लाख गांठ (बेल) की कुल मांग का 78 प्रतिशत हिस्सा प्लास्टिक सेक्टर को दे दिया है. उन्होंने बताया कि पिछले आठ वर्षों से केंद्र सरकार ख़ुद ख़रीदने वाले जूट बैगों की उचित क़ीमत नहीं दे रही है, जिससे जूट उद्योग को कुल 900 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. सरकार ने वर्ष 2009 की नए टैरिफ कमीशन की रिपोर्ट भी लागू नहीं की है, जिससे उद्योग के नुक़सान के एक हिस्से की भरपाई हो जाती. इसके अलावा हड़ताल में शामिल 2.6 लाख श्रमिकों की मज़दूरी के मद में 400 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है. हड़ताल से 2010-11 के जूट सीजन में राज्य के क़रीब 40 लाख किसानों को जूट की उचित क़ीमत मिलने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि मिलें ऊंची क़ीमत पर कच्चा जूट ख़रीदने की हालत में नहीं होंगी. ज़ाहिर है, हड़ताल जितनी लंबी खिंचेगी, जूट उद्योग का उतना ही नुक़सान होगा.
यह बताने की बात नहीं कि हड़ताल से प्लास्टिक लॉबी को सीधा फायदा होगा. प्लास्टिक बस्तों की घरेलू खपत तो बढ़ेगी ही, निर्यात भी कई गुना बढ़ जाएगा. इस साल बांग्लादेशी जूट उद्योग एवं निर्यातकों को भारी लाभ होने की उम्मीद है. इस साल बांग्लादेश से भारत में कच्चे और तैयार जूट का निर्यात 517 प्रतिशत बढ़ जाएगा. हड़ताल से लाभ उठाने के चक्कर में कच्चे जूट के व्यापारियों द्वारा बड़ी मात्रा में जमाखोरी की भी आशंका है. नेशनल यूनियन ऑफ जूट वर्कर्स के संयुक्त सचिव एवं इंटक नेता मास्टर निजाम ने बताया कि बंगाल की 52 जूट मिलों में मज़दूरों की ग्रेच्युटी के मद में 350 करोड़ और पीर्ऐं के 425 करोड़ रुपये बकाया हैं. उनके मुताबिक़, फरवरी 2007 से महंगाई भत्ता भी बंद है. 890 प्वाइंट की दर से मिलने वाले महंगाई भत्ते के रूप में हर श्रमिक को प्रति माह 1691 रुपये कम मिल रहे हैं. इस मद में हर श्रमिक की 45 से 46 हज़ार रुपये तक की रक़म बकाया है. यही नहीं, चटकलों में पुरुषों के रिटायर होने की उम्र 58 साल है, पर महिलाओं को 55 साल की उम्र में ही रिटायर कर दिया जाता है. ट्रेड यूनियनें कई समस्याओं के लिए केंद्र की नीतियों को ज़िम्मेदार मानती हैं. जूट का मामला केंद्र के दायरे में आता है और राज्य सरकार स़िर्फ क़ानून एवं व्यवस्था तथा श्रम क़ानूनों का पालन कराने तक सीमित रहती है. मास्टर निजाम के मुताबिक़, जूट मिल मालिक पीर्ऐं और ग्रेच्युटी के स्थापित नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हैं. उन्होंने यह भी मांग की कि सरकार किसानों का 100 प्रतिशत जूट ख़रीदने की ज़िम्मेदारी ले, ताकि किसानों का हक़बिचौलिए न छीन सकें.
भाकपा नेता गुरुदास दासगुप्ता ने बताया कि जूट मिल मालिकों ने पांच जनवरी 2002 को वाममोर्चा सरकार की मध्यस्थता वाले ऐतिहासिक समझौते का उल्लंघन किया है और वे उत्पादकता से जुड़े वेतन का नाजायज़ लाभ उठा रहे हैं. ठेका श्रमिकों की भी कई श्रेणियां जैसे-वाउचर मज़दूर, अस्थायी मज़दूर एवं जीरो श्रमिक बना दी गई हैं. इस तरह ठेका श्रमिकों को हर रोज 200 से भी कम रुपये दैनिक मज़दूरी के रूप में मिलते हैं.
पीर्ऐं और ईएसआई की सुविधा तो दूर, उन्हें साल में पूरे दिन काम की भी गारंटी नहीं है. इन ठेका श्रमिकों को स्थायी श्रमिकों की तुलना में आधे यानी साल में औसतन 35000 रुपये मिलते हैं. चाय बागानों के बाद राज्य का जूट उद्योग बहुत पहले से बीमार चल रहा है. अर्जुन मोटरसाइकिल और नैनो कार के बवाल में ये दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिनकी हालत लगातार ख़राब हो रही है. यह भी ग़ौरतलब है कि इन दोनों क्षेत्रों में 60 प्रतिशत से ज़्यादा श्रमिक हिंदीभाषी राज्यों के हैं. इनमें सबसे ज़्यादा संख्या बिहार (जूट उद्योग) और झारखंड (चाय उद्योग) से आए लोगों की है. वैसे पश्चिम बंगाल देश के उन गिने-चुने राज्यों में से है, जहां ट्रेड यूनियनों के ख़िला़फ बड़े पैमाने पर विद्रोह हो चुके हैं. एंबेसडर कार बनाने वाली हिंदुस्तान मोटर्स की हिंद मोटर इकाई में वाम ट्रेड यूनियनों की श्रमिक विरोधी नीति के ख़िला़फ संग्रामी श्रमिक यूनियन बनी थी. तो क्या जूट उद्योग में भी ऐसी कोई संभावना है, सोचने की बात है. कुछ लोग यह भी कहने वाले हैं कि इन दोनों क्षेत्रों की हालत इसलिए ख़राब की जा रही है, क्योंकि इनमें हिंदीभाषियों की संख्या ज़्यादा है और इसमें ट्रेड यूनियनों के कुछ बड़े-बड़े नेता शामिल हैं. अगर ऐसा है तो सोचना होगा श्रमिकों को ही, पहल ख़ुद करनी होगी.
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