करीब 60 वर्षीय अब्दुल सलाम मुंडु को देखकर यह नहीं समझ में आता कि झुर्रियां उनके चेहरे पर हैं या फिर उनका चेहरा ही झुर्रियों के बीच है. इतने पर भी मुंडु की हाज़िरजवाबी और बेबाकी देखते ही बनती है, झूठ नहीं बोलता साहब, आपसे औरों की तरह 400 या 500 नहीं लूंगा. स़िर्फ 150 रुपये दे देना, हम आपको पूरा डल लेक दिखाएगा. आपको अच्छा लगेगा तो आप मुझे 200 से 250 रुपये भी दे सकता है. हम आपको ग़लत नहीं बोलेगा साहब, आप हमारा मेहमान है, इसलिए ख़ूब ख़िदमत करेगा हम आपका, पारंपरिक फैरन पहने हुए छरहरी क़द-काठी के अब्दुल सलाम मुंडु के इतने आग्रह पर उनकी बात मैं टाल नहीं सका. मैंने कहा कि मुझे ज़्यादा देर नहीं घूमना, इसलिए सौ रुपये ही दूंगा. आमतौर पर इतने कम पैसों में कोई भी शिकारे वाला टस से मस नहीं होता. सीजन में तो यही शिकारे वाले सैलानियों से 500 से 600 रुपये तक वसूल लेते हैं. बहरहाल मेरी बात पर अब्दुल राजी हो गए और हाथ पकड़ कर अपने शिकारे की ओर लेकर चल पड़े. झील तक क़रीब 200 गज के रास्ते के बीच अब्दुल लगातार बोलते रहे. उन्होंने डल झील समेत कश्मीर और स्थानीय आवभगत के बारे में बताकर आकर्षण का एक सूक्ष्म एवं वर्चुअल रेखाचित्र मेरी आंखों के आगे खींच दिया.
पृथ्वी के स्वर्ग यानी कश्मीर में रहने वाला हर शख्स स़िर्फ अमन और चैन चाहता है, जिससे वह दो जून की रोटी आसानी से कमा सके. लेकिन, दुर्भाग्य यह है कि पिछले बीस सालों से यहां आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच में पिसना आमजन की नियति बन गया है.
झील के किनारे पहुंचते ही अचानक उन्होंने मुझसे कहा, आप यहीं रुकिए, मैं शिकारे को जरा सजा लेता हूं. ख़ूब ख़िदमत करेगा हम आपका. फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर शिकारे की गद्दीदार सीट पर बैठाते हुए हाथ में एक टोकरी थमाकर कहा, यह कांगड़ी है साहब, इससे आप हाथ सेंक सकते हैं और पास रखने से सर्दी भी नहीं लगेगी. फिर शिकारे के दूसरे सिरे पर खड़े होकर उन्होंने अपने साथी राशिद को आवाज़ लगाई और मुझसे मुख़ातिब होते हुए कहा कि हम अकेला नाव नहीं चलाएगा साहब, दो लोग चलाएगा, जिससे जल्दी से आपको ज़्यादा से ज़्यादा चीज दिखा सकें.
इतने में राशिद भी आ गए और अब्दुल ने शिकारे पर बैठकर पतवार घुमानी शुरू कर दी. शिकारा थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि अब्दुल ने ऊंची आवाज़ में कहा, यह छोटा लेक है और इसी के पास में यह गोल्डन लेक है. उन्होंने बताया कि झील के इस हिस्से में ही पंच सितारा हाउसबोट है, जहां अंगे्रज आकर ठहरते हैं. इसलिए इसे गोल्डन लेक कहा जाता है. थोड़ा और आगे बढ़े तो झील के पानी पर तैरते खरपतवार की तऱफ इशारा करते हुए बताया कि यह लोटस गार्डन है. यहां कमल खिलते हैं, लेकिन अभी सर्दी की वजह से सब मुरझा गए हैं. जब थोड़ा मौसम बदलेगा तो यहां सुंदर कमल देखने को मिलेंगे. कुछ ही दूरी पर लोटिंग गार्डन था. अब्दुल ने बताया कि गर्मी के मौसम में लोटिंग गार्डन में टमाटर, खीरा, कमल ककड़ी जैसी सब्जियों की खेती होती है.
सुबह के क़रीब 11 बज रहे थे. घने कोहरे की चादर से छनकर आ रही मखमली धूप से डल झील के पानी में सुनहरा प्रकाशपुंज समेटे किरणें उठ रही थीं और ठंडी हवा के झोंके शिकारे को अधिक तेज़ी से धकेल रहे थे. झील में तैरते शिकारे से दूर पहाड़ की चोटी पर कोहरे की चादर में लिपटे शंकराचार्य मंदिर को देखा जा सकता था. सूरज की किरणें मंदिर के गुंबद पर पड़ रही थीं और शंकराचार्य मंदिर धीरे-धीरे इस धुंधले आवरण के आगोश से बाहर झांकने लगा था. पास में रखी कांगड़ी से थोड़ी-बहुत गर्माहट ज़रूर मिल रही थी. वैसे तो अब्दुल मुंडु की बातें भी कम गर्मजोशी भरी नहीं थीं.
इतना सब चल ही रहा था कि शिकारे के पास एक और नाव आकर रुक गई. नाव में दो नवयुवक मुझे पारंपरिक कश्मीरी फैरन और साफा पहन कर फोटो खिंचवाने के लिए सैलानियों की सुंदर तस्वीरें दिखाकर रिझाने लगे. अंतत: उन्होंने कश्मीर की मनमोहक वादियों का हवाला देते हुए फोटो खिंचवाने के लिए बाध्य कर दिया. इस बीच अब्दुल भी बोल पड़े, कश्मीर में कहीं भी फोटो खिंचाएंगे तो अच्छा आएगा साहब. फोटो खिंचवा कर हम थोड़ा आगे बढ़े तो एक दूसरे व्यक्ति ने शिकारे के दाईं तऱफ अपनी नाव लगा दी. उसने अपने खेतों में उगाई गई केसर दिखाकर उसके सैकड़ों फायदे गिनाने के बाद कहा कि अभी सीजन का टाइम नहीं है, इसलिए आपको सस्ते में दे दूंगा. जब मैंने उसके आग्रह को नकार दिया तो उसने एक दूसरे डिब्बे से गहरे भूरे रंग का एक चमकदार सा दिखने वाला टुकड़ा निकाला और उसे दिखाते हुए धीरे से कहने लगा कि यह शिलाजीत है, दूर हिमालय में मिलने वाले इस पत्थर को पहाड़ का पसीना भी कहा जाता है. यह कई प्रकार की बीमारियों में अचूक इलाज के लिए कारगर है.
इससे पहले कि अपने पिटारे में से वह मोबाइल बोट वेंडर कुछ और निकाल कर दिखाता, मैंने केसर की एक डिब्बी लेकर उसे अलविदा कह दिया. यह सब अभी ख़त्म नहीं हुआ था कि बाईं तऱफ एक और नाव आकर खड़ी हो गई. उसमें बैठे अधेड़ उम्र के छरहरे व्यक्ति ने नाव के बीचोबीच कई तरह के सामान सजा रखे थे. एक छोटा सा चमकीले तराशे हुए पत्थरों से जड़ा पर्स दिखाते हुए उसने कहा कि यह कश्मीरी पर्स है. और भी कई चीजें वह दिखाने लगा, इस बीच कश्मीरी पर्स को अपने हाथ में लेकर मैंने एक फोटो खींच ली.
इस तरह देखें तो डल झील में पानी पर तैरती हुई एक अलग ही दुनिया नज़र आती है. वैसे अब्दुल मुंडु से का़फी कुछ जानने को बाक़ी रह गया था. इसी बीच शिकारा डल झील के बीचोबीच पहुंच गया. आसपास पुराने से दिखने वाले पानी पर तैरते हुए हाउसबोट की कतारों के बीच अब्दुल ने अपना शिकारा लगा दिया और कहा, इसे ओल्ड सिटी कहते हैं. मैंने पूछा, और क्या-क्या है डल झील में देखने के लिए? जवाब में अब्दुल ने बताया कि चार चिनार, कबूतरखाना, स्वीमिंग पूल, मोटरबोट और भी बहुत कुछ है. ओल्ड सिटी पानी पर तैरते हुए बाज़ार का नाम है, जहां कश्मीरी कला, संस्कृति, परंपरा और हुनरमंदी की मिसाल नायाब चीजें बिकती हैं. अब्दुल ने मुझे ओल्ड सिटी से घरवालों के लिए शॉल आदि लेने को कहा, लेकिन मेरे मना करने पर उन्होंने शिकारे का रुख़ मोड़ दिया.
मैंने अनायास ही पूछ लिया, अभी टूरिस्ट आ रहे हैं या नहीं? जवाब मिला, अभी ठंडी है न साहब, इसलिए टूरिस्ट कम आता है. गर्मी में ज़्यादा टूरिस्ट आता है. लड़ाई के डर से भी लोग कम आते हैं. यह हमारी बदक़िस्मती है कि लड़ाई की वजह से टूरिस्ट नहीं आते तो हम कैसे कमाएगा? हम लोग मर जाएगा. आप भी बाहर जाकर सबको बताएंगे कि अब्दुल अच्छा आदमी था, हमारा बहुत ख़िदमत किया, लेकिन उसका बिजनेस नहीं है. लीडर तो अपना काम करता है, हमारा ख्याल नहीं रखता है. हमारा सुनता नहीं. यहां तो अच्छी बात बोलेगा तो गोली खाएगा. दो लोगों की लड़ाई में हम पिसते हैं. ग़रीब का तो कोई सुनता ही नहीं. बिना रुके अब्दुल मुंडु इतना कुछ कह गए, जो हरआम कश्मीरी के दिल में हर रोज पिछले 20 सालों से दबा हुआ है.
मैंने मुंडु से सवाल किया, आपने तो मिलिटेंसी का दौर कश्मीर में देखा होगा. किस तरह का मंजर अपनी आंखों से देखा है आपने? हमने बर्बादी देखा है साहब, आसमान की तऱफ मुंह करके चप्पू चलाते हुए अब्दुल ने जवाब दिया. आगे वह फिर कहने लगे, यहां तो सबका धंधा टूरिज़्म है. टूरिस्ट नहीं आएगा तो हम कैसे जिएगा? आप सरकार से क्या चाहते हैं? प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा, अमन और आज़ादी. मैंने पूछा कि आज़ादी का आपके लिए क्या मतलब है? तो बड़ा ही चौंकाने वाला जवाब अब्दुल सलाम मुंडु ने दिया. उन्होंने कहा, हमारे लिए आज़ादी हमारा कमाई है. सबका मर्जी है हमको काम मिले.
कश्मीर में चार दिन रहकर ऐसा महसूस हुआ कि अलगाववादियों, राजनीतिक पार्टियों, मीडिया और यहां तक कि कश्मीरी लोगों के मन में भी आम जनजीवन के बीच फौज की मौजूदगी को लेकर एक तरह की ख़िला़फत थी. आम लोगों की हिफाज़त में लगे फौजियों को लेकर स्थानीय लोगों में इस तरह ख़िला़फतका बीज पनपने का कारण क्या हो सकता है? यह सवाल मेरे मन में कौंधने लगा. इसका जवाब एक आम कश्मीरी ही दे सकता था. अब्दुल ने मेरी इस जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा, फोर्स मदद देता है, उसका ड्यूटी है. वह भी मरता है, हमको भी बचाता है. अगर यह भी नहीं होता तो लड़ाई (मिलिटेंसी) की वजह से यहां आदमी कुत्ता की मा़फिक मरता. आर्मी तो हमारी हिफाज़त में है. कोई दुश्मन आया और उसने जंग उठाया तो फोर्स बेचारा क्या करेगा? वह भी मरता है. और, हम लोग तो ख़ाली बैठते ही मर जाएंगे. हमारा तो यही चप्पू है, चलाता है तो कमाता है.
बातें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थीं, लेकिन समय पूरा हो गया था और शिकारा भी धीरे-धीरे वापस किनारे की ओर बढ़ रहा था. किनारे पर पहुंच कर अब्दुल को मैंने पूर्व निर्धारित मेहनताने से 50 रुपये अधिक दिए तो मुस्करा कर उन्होंने कहा, आप ख़ुश हैं न साहब? अब जब आप बाहर जाएगा तो अपने जानने वालों को भी अब्दुल सलाम मुंडु के शिकारा नंबर 15 में आने के लिए जरूर बोलना.
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