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इस जलवायु में कोई बदलाव नहीं

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वर्ष 2009 भारतीय वन क्षेत्र, तटीय इलाक़ों और कृषि योग्य भूमि के लिए बेहद अव्यवस्थित रहा. इस वर्ष लगभग हर महीने उद्योग और बुनियादी ढांचों के निर्माण की 100 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. नतीजतन आवास, जीविका और उन पर अपने अधिकारों की लड़ाई का नज़ारा हर तरफ़ देखने को मिला. अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों को एक संस्था से मदद भी मिली. यह नियामक संस्था देश के नाज़ुक पर्यावरण और जैव विविधता की रक्षा के  लिए बना है.

पर्यावरण के  विनियमन (रेगुलेशन) के  लिए नए संस्थागत ढांचे ज़रूरी हैं या नहीं, इस पर देश में बहस हो सके, उसके  पहले ही भारतीय प्रधानमंत्री अमेरिका के  सहयोग के लिए समझौते को तैयार हैं, ताकि पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (ईपीए) की स्थापना हो सके. यदि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सितंबर 2009 के  नोट में एनईपीए के लिए उम्मीद की कोई किरण नज़र आती है, तो भी इसका मतलब यह होगा कि मंत्रालय ख़ुद वार्ता प्रक्रिया एवं क़ानून बनाने में सहभागी रहेगा और उसे लागू करने का ज़िम्मा पेशेवर एवं विशेषज्ञ लोगों से संबद्ध संस्था को दे देगा.

सिविल सोसायटी तक उनकी पहुंच से यह मसला सु़र्खियों में बना रहा, लेकिन पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के  कामकाज और पूर्वाग्रह से संदेह के  बादल भी मंडराने लगे. और हो भी क्यों नहीं? आख़िर 2009 के पहले महीने में ही पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के आकलन से संबंधित अधिसूचना ईआईए-2006 को और भी कमज़ोर करने का इरादा जता दिया गया. जब नए मंत्री ने पदभार संभाला तो प्रस्ताव को बनाए रखा गया. पिछले साल एक गुप्त प्रक्रिया के तहत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने उसमें का़फी संशोधन किए. पहले परियोजनाओं को ईआईए अधिसूचना के तहत मंजूरी मिलती थी. वहीं दूसरी बातों पर ध्यान दें तो मंत्रालय ने इसमें नई बात जोड़ दी. उसने आधुनिकीकरण एवं विस्तार परियोजनाओं के लिए स्व-प्रमाणन प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी. साथ ही मंत्रालय ने यह भी सुझाव दिया कि रियल एस्टेट और निर्माण परियोजनाओं की अधिकतम सीमा तय करने के लिए राज्य स्तर पर फैसला आम सहमति के  बजाए बहुमत के आधार पर हो.

अधिसूचना में बदलाव की ज़रूरत को समझने में लगभग एक साल का वक़्त लग गया. अब दिसंबर में आख़िरी संशोधन के साथ इसे पेश किया गया. किसी भी फैसले पर पहुंचने में सिविल सोसायटी की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आधी-अधूरी कोशिश की गई. निर्माण परियोजनाओं एवं दूसरे विकल्पों के लिए यथास्थिति बरक़रार रखी गई. हालांकि मंत्रालय की आंतरिक समिति ने स्व-प्रमाणन के मत को पूरी तरह बदल दिया. इस मत के मुताबिक़ यह ़फैसला लेने का अधिकार औद्योगिक इकाइयों पर छोड़ा गया था कि उनकी विस्तार परियोजनाओं से प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा अथवा नहीं. इस प्रविष्टि में उम्मीद की जो किरण नज़र आती है, वह यह है कि मंत्रालय निकट भविष्य में राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (एनईपीए) का गठन करेगा.

एनईपीए, ऐसा लगता है कि इसकी तक़दीर भी पहले से निर्धारित है. पर्यावरण के विनियमन (रेगुलेशन) के लिए नए संस्थागत ढांचे ज़रूरी हैं या नहीं, इस पर देश में बहस हो सके, उसके पहले ही भारतीय प्रधानमंत्री अमेरिका के  सहयोग के लिए समझौते को तैयार हैं, ताकि पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (ईपीए) की स्थापना हो सके. यदि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सितंबर 2009 के  नोट में एनईपीए के लिए उम्मीद की कोई किरण नज़र आती है, तो भी इसका मतलब यह होगा कि मंत्रालय ख़ुद वार्ता प्रक्रिया एवं क़ानून बनाने में सहभागी रहेगा और उसे लागू करने का ज़िम्मा पेशेवर एवं विशेषज्ञ लोगों से संबद्ध संस्था को दे देगा. व्यवहारिक तौर पर यह संस्था पर्यावरण मंत्रालय के  क़ानूनों को मानने के लिए बाध्य होगी. अभी तक इसे लिखित तौर पर स्वतंत्र संस्था होने की बात कही जा रही है.

पिछले साल यह भी देखा गया कि नए मंत्री ने तटीय प्रबंधन क्षेत्र की अधिसूचना को रद्द कर दिया. उसे मौजूदा तंत्र की जगह लाने की बात कही जा रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के तटीय क्षेत्रों में किस तरह की गतिविधियों को अनुमति दी जा सकती है. वह कौन सा प्रस्ताव होगा, जिसे भारत के तटीय क्षेत्रों के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए मंजूर किया जाएगा? उद्योगों से बाध्यकारी प्रतिबंध हटाए जाएंगे और बुनियादी संरचनाओं के निर्माण कार्य को विशेष तटीय इलाक़ों के उच्च ज्वार क्षेत्र के  500 मीटर के दायरे में अनुमति दी जाएगी. इस मसले पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया चल रही है और आख़िरी फ़ैसले को लटका कर रखा गया है. लेकिन, इसी बीच पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पहले ही कुछ तटीय क्षेत्रों में एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजना (आईसीजेडएमपी) की तैयारी की प्रक्रिया शुरू कर चुका है. वह यह काम विश्व बैंक की सहायता से कर रहा है. इस तरह की प्रबंधन योजनाएं प्रस्तावित तटीय प्रबंधन क्षेत्र की प्रमुख घटक हैं.

इसके  समाधान का एक दूसरा उपाय भी है. वह है नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बिल. इसकी सलाह कई वकीलों एवं पर्यावरणविदों ने दी है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बिल को लागू करने के लिए मौजूदा दो तंत्रों राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण (एनईएए) और राष्ट्रीय पर्यावरण ट्रिब्यूनल (नेट) को रद्द करना पड़ेगा. इसकी वजह यह है कि इन दोनों तंत्रों को कभी पूरे अधिकार नहीं दिए गए, ताकि वे चुनौतियों का सामना करने में अहम रोल निभा सकें. नेट तो कभी गठित ही नहीं किया गया और एनईएए समुचित तौर पर कभी काम नहीं कर सका. आज यह संस्था इस बात को स्वीकार भी करती है. साथ ही आसानी से इस मामले को खारिज़ करती है कि इसके फैसले पर किसी एक सदस्य का प्रभुत्व क़ायम था. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में कई अहम क़ानून निहित हैं, बनिस्बत उन दो संस्थाओं के, जो पहले से प्रस्तावित थे. संसद के मानसून सत्र में इस बिल को चुपके से पेश किया गया और 2010 के  बजट सत्र के दौरान इसकी समीक्षा की बात कही गई है. इस मुद्दे से संबंधित समस्याओं पर निकट भविष्य में बड़े और महत्वपूर्ण उपाय किए जा सकते हैं. इन उपायों का असर भी देखने को मिल सकता है कि आख़िर किस तरह भारत का पर्यावरण और यहां के  लोग नियंत्रित होने चाहिए. लेकिन, यह वनक्षेत्र के लिए क्या बदलाव लाने वाला है, प्रबंधित तटों के विकास और कृषि योग्य भूमि के लिए इसने क्या मूल्य तय किए हैं? एक बात तो सा़फ है कि पीछे हटने या अपने फैसले को बदलने का नाम कोई नहीं ले रहा है. पर्यावरण को उसके हाल पर छोड़ने को कोई तैयार नहीं है, ताकि वह ख़ुद फल-फूल सके. जलवायु का यह बदलाव नई संस्थाओं को जन्म देता है, जो व्यवस्थित तौर पर डिज़ाइन होती हैं और बड़ी कुशलता से इन्हें मंजूरी मिली होती है. इसका असर यह होता है कि अंतत: हर साल नुक़सान तो धरती को ही झेलना पड़ता है.

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