युवाओं का देश भारत. 40 फीसदी आबादी की उम्र 18 साल से कम. युवाओं के इस देश में 1 करोड़ 70 लाख बाल श्रमिक और 50 फीसदी बच्चे यौन हिंसा के शिकार भी. बाल श्रम रोकने और बच्चों की देख-रेख और संरक्षण के लिए क़ानून भी हैं. लेकिन फिर भी स्थिति बेकाबू है. जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन एक्ट 2000) इसका सबसे सटीक उदाहरण है. इस क़ानून को लागू हुए दस साल बीतने को हैं, लेकिन ज़्यादातर राज्य सरकारें अभी तक इस क़ानून को अपने यहां पूर्णरूपेण लागू नहीं कर सकी हैं.
भविष्य की बुलंद इमारत, वर्तमान की मज़बूत नींव पर ही बनती है. बच्चे देश का भविष्य हैं. दशकों से यह बात सरकार कहती और मानती रही है. लेकिन देश के बच्चों का वर्तमान कैसा है? बाल श्रम, बाल तस्करी, बाल हिंसा और बाल यौन व्यापार जैसे कुचक्रों में फंस कर आज देश का भविष्य यानी बच्चों का वर्तमान तबाह हो रहा है. सरकार एक क़ानून बना कर अपने कर्तव्यों से इतिश्री कर चुकी है. कार्यपालिका के बारे में कुछ लिखने या बोलने का कोई मतलब नहीं है. ऐसे में उच्चतम न्यायालय का एक हालिया आदेश निश्चित तौर पर सुकून देने वाला है.
बचपन बचाओ आंदोलन नाम की एक ग़ैर सरकारी संस्था ने बाल तस्करी और सेक्स टूरिज़्म को रोकने के संबंध में उच्चतम न्यायालय में एक याचिका डाली थी. 22 जनवरी को इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने देश के सभी राज्यों को छह सप्ताह के भीतर बाल अपराध न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति एवं विशेष पुलिस बल गठित करने का निर्देश दिया. याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की खंडपीठ ने सभी राज्यों को संबंधित क़ानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मौजूदा स्थिति और अन्य पहलुओं पर हलफ़नामा दायर करने का भी निर्देश दिया. दरअसल, बाल संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार ने जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन एक्ट 2000) लाया था. लेकिन लगभग एक दशक बीत जाने के बाद भी ज़्यादातर राज्य सरकारों ने इस पर अमल नहीं किया है. नतीजतन, जिन राज्यों में बोर्ड गठित हुए भी हैं, वहां बाल संरक्षण की दिशा में कोई कारगर क़दम नहीं उठाया जा सका है. देश में ऐसा एक भी राज्य नहीं है, जहां संबंधित क़ानून की विभिन्न धाराओं के तहत एक साथ बाल अपराध न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समिति की स्थापना की गई हो. इतना ही नहीं बाल तस्करी एवं सेक्स टूरिज़्म को रोकने या इससे पीड़ित लोगों को इस दलदल से निकालने के लिए विशेष पुलिस बल का गठन भी नहीं किया गया है.
एक तो वैसे ही देश में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 का अनुपालन अब तक ठीक ढ़ंग से नहीं हो पाया है, उस पर सीडब्ल्यूसी जैसी संस्थाएं, जिसे इस एक्ट में का़फी अधिकार दिए गए है, अपने अधिकार का उपयोग भी नहीं कर रही है.
-राकेश सागर, महासचिव, बचपन बचाओ आंदोलन
ज़ाहिर है, अदालत के इस क़दम से इतना तो सा़फ हो ही जाता है कि देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे का़फी बदतर परिस्थिति में जीने को अभिशप्त हैं. बाल मज़दूरी ऐसा ही एक अभिशाप है जो देश के बच्चों से उनका बचपन छीन रहा है. हालांकि सरकार ने बाल श्रम उन्मूलन के लिए कई क़ानून बनाए. लेकिन एक सच यह भी है कि विश्व में सबसे ज़्यादा बाल श्रमिक भारत में ही हैं. देश भर में क़रीब एक करोड़ 70 लाख बाल मज़दूर हैं. इसमें से 80 प्रतिशत खेतों और कारखानों में काम करते हैं. बाल मज़दूरों की बहुत बड़ी तादाद खदानों, चाय बगानों, दुकानों और घरेलू कामों में भी लगी हुई है. ग़ैर सरकारी संस्थानों के अनुमान के मुताबिक़, देश में बाल मज़दूरों की संख्या क़रीब छह करोड़ तक हो सकती है. चिंता की बात यह भी है कि बहुत सारे बच्चे पटाखे या अन्य रसायन बनाने वाले कारखानों में काम करते हैं. ज़ाहिर है, ऐसे बच्चों को न तो ढंग की शिक्षा मिल पा रही है और न ही उनकी उचित देख-रेख हो पा रही है. ज़ाहिर है, महज़ क़ानून बना देने भर से बाल श्रम जैसी बुराई ख़त्म नहीं होने वाली है. दरअसल, सरकार को यह भी सोचना पड़ेगा कि आख़िर कोई बच्चा क्यों बाल श्रमिक बन जाता है. निश्चित तौर पर इसके पीछे कारण आर्थिक ही होते हैं. ग़रीबी की वजह से मां-बाप बच्चों को कम उम्र में ही कामों में लगा देते हैं, ताकि कुछ कमाई हो सके और उनका गुजारा चल सके. ज़ाहिर है, बाल श्रम की एक बड़ी वजह ग़रीबी भी है.
सभी राज्य छह सप्ताह के भीतर बाल अपराध न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति एवं विशेष पुलिस बल गठित करे और बाल न्याय क़ानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मौजूदा स्थिति और अन्य पहलुओं पर हलफ़नामा दायर करे.
- सर्वोच्च न्यायालय
बच्चों को मज़दूरी करनी पड़ती है इसके अलावा कई दूसरे मोर्चों पर भी उन्हें शोषण का सामना करना पड़ रहा है. बच्चों के साथ यौन हिंसा जैसे घिनौने अपराध हो रहे है. सेक्स टूरिज़्म के नाम पर बच्चों को पर्यटकों के सामने सेक्स के लिए परोसे जाने की बात अक्सर सामने आती रहती है. कुछ साल पहले मानवता को शर्मसार करने वाली घटना नोएडा के निठारी में सामने आई थी. वहां बच्चों का अपहरण करने के बाद हवस का शिकार बनाए जाने का खुलासा हुआ था और उन बच्चों के अंगों के तस्करी की भी आशंका जताई गई थी. बच्चों का अपहरण कर उनसे भीख मंगवाने का काम भी करवाया जाता रहा है.
भारतीय बच्चों की दुर्दशा पर एक अध्ययन, बच्चों के लिए काम करने वाली ग़ैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने किया है. अध्ययन के मुताबिक़, भारत के लगभग 50 फीसदी बच्चों को स्कूली शिक्षा नहीं मिल पाती है. इसके अलावा, बड़ी संख्या में बच्चे यौन उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं. इनमें भी ज़्यादातर बच्चों का यौन उत्पीड़न कार्यस्थलों पर हो रहा है. भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की बाल शोषण पर केंद्रित एक अध्ययन के मुताबिक़, हिंदुस्तान के 53.22 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण का शिकार हैं. उनमें लड़कियां भी हैं और लड़के भी. भारत में 18 साल से कम उम्र वाले लोगों की संख्या लगभग 40 करोड़ है. इनमें भी 21 करोड़ की उम्र 14 साल से भी कम है. निश्चित तौर पर यह संख्या अपने-आप में किसी देश के लिए बहुत मायने रखती है. देश की आबादी के एक बड़े हिस्से पर ध्यान दिए और उनकी स्थिति में सुधार किए बिना देश का संपूर्ण विकास संभव नहीं है.
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