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केजीबी और ब्रिटिश ख़ु़फिया एजेंसी की आंखमिचौली

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खुफिया एजेंसियों की दास्तां जितनी रहस्यमयी होती है, उतनी ही रहस्यमयी होती है उनके एजेंटों की कहानी. हम सभी इस बात से वाक़ि़फ हैं कि ख़ु़फिया एजेंसियों के जाल हर मुल्क में फैले होते हैं. हर जगह उनकी पैनी नज़र होती है. लेकिन ज़रा सोचिए, क्या कोई ख़ु़फिया एजेंसी किसी मुल्क के सबसे शक्तिशाली नेता को भी अपना जासूस बना सकता है? इसी बात का रहस्य छिपा है इस कहानी में. तारीख़ थी 18 जनवरी, 1963. इस दिन एक ब्रिटिश लीडर की मृत्यु हुई. यह लीडर कोई और नहीं, बल्कि ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने वाले नेताओं में शुमार था. लेकिन प्रधानमंत्री बनने से पहले ही इस नेता की हत्या बेहद रहस्यमयी तरीक़े से हो गई. आज तक उस राज़ को बेपर्दा नहीं किया जा सका है. वह राज़ कि आख़िर उसकी हत्या कैसे हुई? हम आपको बता दें कि यह शख्स तत्कालीन प्रधानमंत्री के उत्तराधिकारी के तौर पर माना जाता था. इसकी हत्या एक ऐसी बीमारी से हुई, जिसकी तहक़ीक़ात के बावजूद अभी तक कुछ सा़फ नहीं हो सका है. हत्या के बाद इलाज करने वाले डॉक्टर से काफी पूछताछ की गई, ताकि हत्या की वजहों का पता लगाया जा सके. ब्रिटिश ख़ु़फिया एजेंसी एमआई-फाइव के अधिकारी ने इसकी जांच का ज़िम्मा अपने हाथों में लिया. आर्थर मार्टिन यही नाम था उस ब्रिटिश ख़ु़फिया अधिकारी का. मार्टिन ब्रिटिश एजेंसी में सोवियत संघ के जासूसी अभियानों की निगरानी करता था. यानी उसे सोवियत ख़ु़फिया एजेंसी की जानकारी अच्छी तरह से थी. जब मार्टिन ने डॉक्टर से पूछताछ की तो उसने मौत की जो वजह बताई, उसे सुनकर वह भी हैरान-परेशान रह गया. दरअसल, डॉक्टर ने बताया कि ब्रिटिश नेता की हत्या एक बेहद अनजान बीमारी से हुई. यह एक ऐसी बीमारी थी, जिससे रोगी के शरीर के सभी अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं. और, एक समय के बाद उसकी मौत हो जाती है. यहां तक तो बात सही थी, लेकिन ब्रिटेन में जिस तरह का मौसम होता है, उसमें इस तरह की बीमारी के होने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. इसलिए डॉक्टर ने भी शक़ ज़ाहिर किया कि मुमकिन है, यह किसी की साज़िश हो हत्या की, ताकि उसके दुश्मन की मौत भी हो जाए और उस पर शक़ भी न किया जा सके.

यह शख्स तत्कालीन प्रधानमंत्री के उत्तराधिकारी के तौर पर माना जाता था. इसकी हत्या एक ऐसी बीमारी से हुई, जिसकी तहक़ीक़ात के बावजूद अभी तक कुछ सा़फ नहीं हो सका है. हत्या के बाद इलाज करने वाले डॉक्टर से काफी पूछताछ की गई, ताकि हत्या की वजहों का पता लगाया जा सके.

आर्थर मार्टिन ने इस पूरे मामले की जांच के लिए केमिकल लेबोरेट्री का सहारा लिया, ताकि उसके ज़रिए कोई सुराग मिले और हत्या की साज़िश करने वालों पर शिकंजा कसा जा सके. लेकिन, यहां भी डॉक्टरों ने बताया कि यह एक ऐसी बीमारी है, जिससे शरीर के अंदरूनी अंगों में संक्रमण फैलता है. पर सोचने वाली बात है कि यह बीमारी ब्रिटिश नेता को कैसे हुई? इसका अंदाज़ा अभी तक किसी को नहीं लग पा रहा था. तभी अचानक इस मामले में एक खुलासा हुआ. यह खुलासा किसी और ने नहीं, बल्कि सोवियत ख़ु़फिया एजेंसी केजीबी के एक जासूस ने किया. उसने बताया कि यह ब्रिटिश नेता कुछ दिनों तक केजीबी के डिपार्टमेंट 13 के संपर्क में था. हम आपको बता दें कि केजीबी में कई डिपार्टमेंट होते थे. और, डिपार्टमेंट 13 राजनीतिक हत्या के मिशन को अंजाम देता था. अब आप यह सोच रहे होंगे कि आख़िर इतनी बड़ी साज़िश का ख़ुलासा भला केजीबी का कोई जासूस क्यों करेगा? तो इसकी भी एक वजह थी. केजीबी का यह जासूस बाद में डिफेक्टर निकला. यानी यह जासूस भी केजीबी में किसी और एजेंसी का घुसपैठिया था. इस जासूस ने यह बताया कि केजीबी ने अपने इस मिशन को अंजाम देने के लिए काफी तैयारियां की थीं. डिपार्टमेंट 13 के मुख्य निदेशक जनरल रोडिन ने इस मिशन के लिए कई वर्षों तक ब्रिटेन में रहकर वहां के हालात को जानने-समझने की कोशिश भी की, ताकि ब्रिटेन समेत यूरोप में केजीबी के मिशन को बख़ूबी अंजाम दिया जा सके.

लेकिन इन सबके बीच एक सवाल सामने आता है कि आख़िर केजीबी ने इस ब्रिटिश नेता की हत्या करवाई भी तो क्यों? क्या उससे सोवियत संघ को कोई ख़तरा था? केजीबी को क़रीब से जानने वालों की मानें तो उन दिनों ब्रिटेन में केजीबी का अच्छा- ख़ासा प्रभाव था. अपने इसी वर्चस्व को क़ायम रखने के लिए केजीबी ने उस ब्रिटिश नेता की हत्या की साज़िश रची. एक वजह यह भी थी कि केजीबी उस समय के एक पावरफुल ब्रिटिश नेता को सत्ता की कुर्सी पर बैठाना चाहता था. और, उसके इस काम में यह ब्रिटिश लीडर, जिसकी हत्या की गई, आड़े आ रहा था. यही वजह है कि केजीबी ने उसे रास्ते से हटाने का पूरा प्रबंध कर लिया था. उसने उस लीडर को इस तरह मौत के घाट उतारा कि उस पर शक़ भी न किया जा सके. यही वजह थी कि केजीबी ने उसे मारने की बेहद जुदा साज़िश रची. केजीबी ने अपनी नापाक साज़िश को यहीं तक सीमित नहीं रखा. इस हत्या की गुत्थी को उसने इस तरह उलझा कर रख दिया कि पूरी ब्रिटिश ख़ु़फिया एजेंसी भी उसमें उलझ कर रह गई. अ़फवाह फैला दी गई कि तत्कालीन प्रधानमंत्री भी केजीबी के एजेंट हैं. इसका असर यह हुआ कि लोग अंदरूनी समस्या में ही उलझ कर रह गए. लेकिन इस पूरी साज़िश की असलियत यह थी कि जिस नेता की हत्या की गई थी, वह अमेरिका का कट्टर समर्थक था और ब्रिटेन में वह अमेरिकी हितों को का़फी तरज़ीह देता था. नतीजतन, केजीबी ने उसे अपने रास्ते से हटाकर अपने वर्चस्व को क़ायम रखने की पूरी कोशिश की.

केजीबी की यह कहानी कोई नई नहीं है. न जाने कितनी द़फा उसने ऐसे ख़तरनाक मिशनों को अंजाम दिया और उनमें सफल भी रही. जब किसी मुल्क का प्रधानमंत्री ही किसी ख़ु़फिया एजेंसी के झांसे में आ जाए, तो वह एजेंसी ख़ुद कितनी शातिर होगी, इसका सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है. यही असलियत थी सोवियत संघ की ख़ु़फिया एजेंसी केजीबी की, जिसने एक नहीं, कई राजनीतिक हत्या की वारदातों को अंजाम दिया.

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