तारीख़ 23 नवंबर 2006. इस दिन एक शख्स, जिसे फूड प्वाइजनिंग की शिक़ायत थी, अस्पताल में भर्ती हुआ. कुछ दिनों तक यह शख्स ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ता रहा. लेकिन इस जंग में ज़िंदगी मौत से हार गई. डॉक्टरों के मुताबिक़, उसकी मौत खाने में रेडियो एक्टिव तत्व के मिले होने से हुई. सोवियत संघ के जमाने में इस तरह के मामले में दुनिया भर के अस्पतालों में अक्सर आते रहते थे. और, हर किसी का अंजाम भी वही होता था, जो इस शख्स का हुआ. यानी मौत. दरअसल यह कारनामा सोवियत संघ की शातिर ख़ुफि़या एजेंसी केजीबी करती थी. अपने राजनीतिक दुश्मनों को रास्ते से हटाने के लिए सोवियत संघ अक्सर इस तरह के मिशन की इजाज़त केजीबी को देता था.
लेकिन हम यहां जिस शख्स की बात कर रहे हैं, वह कोई और नहीं, बल्कि एलेक्जेंडर लित्विंनेको है. एलेक्जेंडर सोवियत संघ की ख़ुफिया एजेंसी केजीबी का जासूस रह चुका था. इतना ही नहीं, जब सोवियत संघ का विघटन हुआ और रूस अपने वजूद में आया, तो इस नवोदित मुल्क में भी उसने जांच एजेंसी एफएसबी में अहम ओहदे की ज़िम्मेदारी संभाली. यानी एक तरह से देखें तो एलेक्जेंडर रूस की सभी छोटी बड़ी ख़ुफिया गतिविधियों और कारनामों से पूरी तरह वाकिफ़ था. एफएसबी में अधिकारी के तौर पर काम करने के दौरान उसने रूसी राजनीति और प्रशासन एवं मा़फिया के बीच के कई दाग़दार संबंधों को उजागर किया. मा़फिया और रूसी राजनीति के बीच के काले चिट्ठों को उजागर करने वाले एलेक्जेंडर के संबंध तत्कालीन राष्ट्रपति से भी अच्छे नहीं रहे. कई लोगों का तो यहां तक मानना है कि एलेक्जेंडर को इस राष्ट्रपति के इशारे पर ही मारा गया. यानी उसकी मौत नहीं हुई, बल्कि उसकी हत्या की गई थी. यही वजह है कि उसकी मौत की साज़िश की गुत्थी आज तक सुलझ नहीं पाई है. अपनी मौत के पहले ख़ुद एलेक्जेंडर ने भी उस राष्ट्रपति पर आरोप लगाए कि उसे खाने में ज़हर देकर मारने की साज़िश की गई है. इस राष्ट्रपति पर लगे इन आरोपों का खुलासा रेड हॉरिजोन नामक किताब में भी किया गया है. लेकिन यहां सवाल उठता है कि इस राष्ट्रपति ने एलेक्जेंडर लित्विंनेको की हत्या क्यों करवाई? भला इससे उसका क्या फायदा होने वाला था? रेड हॉरिजोन नामक किताब के मुताबिक़, एलेक्जेंडर को इस राष्ट्रपति के सारे काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा पता चल गया था. ज़रा सोचिए, यदि किसी राष्ट्रपति से जुड़ी कोई भी अहम जानकारी पूरी दुनिया के सामने आ जाए तो भला उसका अंजाम क्या हो सकता है? यहां तक भी यदि बात सिमटी रहती तो, कुछ नहीं बिगड़ता. लेकिन एलेक्जेंडर की मानें तो रूसी एजेंसी एफएसबी ने अलक़ायदा के एक बहुत बड़े आतंकी को ट्रेनिंग दी थी. वह आतंकी कोई और नहीं, बल्कि अलक़ायदा में दूसरे नंबर का ओहदा संभालता है. हालांकि इस बात में सच्चाई कितनी है, इसका ख़ुलासा अब कभी मुमकिन नहीं है, क्योंकि इस राज़ को जानने वाला अब इस दुनिया में नहीं रहा. ऐसे कुछ और संगीन आरोप थे, जिसे एलेक्जेंडर ने रूसी राष्ट्रपति पर लगाए थे. और, जब वह फूड प्वाइजनिंग का शिकार हुआ तो उसने खुलेआम आरोप लगाया कि यह उसको मारने की साज़िश है, ताकि वह उसके राज़ को पूरी दुनिया के सामने कभी न ला सके. लेकिन रेड हॉरिजोन नामक किताब के मुताबिक़, यह पहली बार नहीं था, जब कोई फूड प्वाइजनिंग के चलते अस्पताल में दाख़िल हुआ और मौत की नींद सो गया. सोवियत संघ की ख़ुफिया एजेंसी केजीबी पहले भी कई ऐसे वारदातों को अंजाम दे चुकी थी. और मौजूदा रूसी एजेंसी भी राजनीति और अहम शख्सियतों की हत्या के लिए इस कारगर तरीक़ो को अपनाती हैं.
हम यहां जिस शख्स की बात कर रहे हैं, वह कोई और नहीं, बल्कि एलेक्जेंडर लित्विंनेको है. एलेक्जेंडर सोवियत संघ की ख़ुफिया एजेंसी केजीबी का जासूस रह चुका था. इतना ही नहीं, जब सोवियत संघ का विघटन हुआ और रूस अपने वजूद में आया, तो इस नवोदित मुल्क में भी उसने जांच एजेंसी एफएसबी में अहम ओहदे की ज़िम्मेदारी संभाली.
हम आपको बता दें कि वह राष्ट्रपति आज भी रूसी राजनीति में सक्रिय है. फिलहाल वह एक ऐसे ओहदे को संभाल रहा है, जो फैसला लेने के हिसाब से ज़्यादा प्रभावशाली ओहदा नहीं है, लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति से उनके संबंध का़फी बेहतर हैं. यदि कहा जाए कि राष्ट्रपति के ज़रिए वह रूस की सत्ता अप्रत्यक्ष तौर संभाले हुए हैं तो कतई ग़लत नहीं होगा. रूस के पूर्व राष्ट्रपति एवं फिलहाल रूसी राजनीति की अहम धूरी. जी हां, यही पहचान है उस शख्स की. लेकिन, वह स़िर्फ एक राजनयिक ही नहीं हैं. उनकी जो सबसे असली पहचान है, वह बहुत ही कम लोगों को मालूम है. केजीबी के नाम से तो अब हमसभी वाक़ि़फ हो चुके हैं. शायद आप सोच रहे हैं कि केजीबी और पूर्व राष्ट्रपति के बीच क्या ताल्लुक़ हो सकते हैं? लेकिन हम आपको बता दें कि केजीबी और इस राष्ट्रपति के बीच बेहद ही घनिष्ठ संबंध रहे हैं. इसी रिश्ते में छिपी है, उनकी असली पहचान. जी हां, रूस के पूर्व राष्ट्रपति के अलावा एक और पहचान है इस शख्स की. वह सोवियत संघ की ख़ुफिया एजेंसी केजीबी के जासूस रह चुके हैं. केजीबी में उनका ओहदा काउंटर इंटेलिजेंस के अधिकारी के तौर पर था. जहां उनका काम विदेशी ख़ुफिया जानकारियां जुटाना था.
दुनिया की सबसे ख़तरनाक ख़ुफिया एजेंसी केजीबी तो अब नहीं रही, लेकिन केजीबी में जासूसी का काम कर चुके इस पूर्व राष्ट्रपति की कार्य शैली की झलक आज भी उनके फैसलों और गतिविधियों में मिलती है. लेकिन, यहां हम उनकी इन गतिविधियों के बारे में नहीं, बल्कि उनकी उस ख़ौ़फनाक करतूत की बात करेंगे, जिसे सुनकर ही होश फाख्ता हो जाता है. मुमकिन है कई लोगों को आज भी यह यक़ीन न हो, लेकिन यहां यह बात भी ज़ाहिर करना ज़रूरी है कि ख़ुफिया एजेंसियों की गतिविधियों को कभी क़ानूनी तौर पर अथवा दुनिया के सामने क़बूला नहीं गया है. क्योंकि पूरी दुनिया के सामने इन बातों को लाने के लिए सबूत की ज़रूरत होती है और ज़रा सोचिए भला कौन सी ऐसी ख़ुफिया एजेंसी होगी, जो अपने कारनामे को अंजाम देने के बाद मौक़ा-ए-वारदात पर सबूत छोड़ती है. हालात तो यहां तक होते हैं कि यदि भूल से भी किसी को उनके कारनामों पर शक़ भी हो जाता है तो ये एजेंसियां, उनको भी हमेशा के लिए अपने रास्ते से हटाने के लिए उनका काम तमाम कर देती हैं.
कुछ यही कहानी है, इस राष्ट्रपति की. रूस की ही जांच एजेंसी एफएसबी के एक बड़े अधिकारी एलेक्जेंडर लित्विंनेको ने उस पर बेहद संगीन आरोपों का ख़ुलासा करना चाहा. लेकिन उसे हमेशा के लिए उसके सबूत के साथ इस दुनिया से चलता कर दिया गया. उसे ठीक उसी तरह मारा गया, जैसे सोवियत संघ के ज़माने में केजीबी अपने दुश्मनों का स़फाया करती थी.
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