सुरेश कलमाडी भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष हैं. कई वर्षों से इस पद पर उनका एकछत्र राज चल रहा है. वह राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के भी अध्यक्ष हैं. यह हक़ीक़त है. लेकिन एक हक़ीक़त यह भी है कि वह भारतीय खेलों के माफिया हैं. यह कहना है हॉकी टीम के पूर्व कप्तान परगट सिंह का. मुमकिन है पूर्व हॉकी कप्तान ने यह बातें दिन ब दिन हॉकी की बिगड़ती हालत और खिलाड़ियों की अनदेखी होने की वजह से कही हो. दरअसल राष्ट्रमंडल खेल भारत में इसी साल अक्टूबर में होने हैं. लेकिन जैसे-जैसे इसके आयोजन की तारीख़ क़रीब आ रही है, इससे जुड़े विवाद भी बढ़ते जा रहे हैं. इसकी तैयारियों से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक इतने विवाद हुए हैं कि यह राष्ट्रमंडल कम विवादमंडल खेल ज़्यादा नज़र आ रहा है.
भारत में खेलों के साथ विवाद किसी एक संघ या खेल से नहीं जुड़ा है. लगभग हर खेल संघ इन विवादों के चपेट में हैं. हर खेल संघ के कर्ताधर्ता वे लोग हैं, जिन्हें खेल से कम सत्ता की कुर्सी से ज़्यादा मतलब होता है. सरकार भी अपने क़रीबियों को ऐसे पदों पर बिठाने से बाज नहीं आती है. जो अधिकारी, नेता या मंत्री सत्तारूढ़ दल के ज़्यादा क़रीब होते हैं, उसे किसी न किसी तरह से पुरस्कृत किया जाता है, ताकि वह सत्ता की मलाई का स्वाद हमेशा लेते रहें. इसकी एक नहीं, कई मिसाल हैं. सबसे पहले बात करते हैं, इन दिनों क्रिकेट से ज़्यादा सुर्ख़ियां बटोरने वाली खेल हॉकी की. पहले हॉकी के पुरुष खिलाड़ियों ने बग़ावत की, उसके बाद महिलाओं ने भी पुरुष खिलाड़ियों के नक्शेक़दम पर चलने का फैसला लिया, वजह खिलाड़ियों के पैसे का भुगतान न होना. अब एक और मामला सामने आ गया है. वह यह कि हॉकी इंडिया के चुनाव जो लगातार लटक रहे थे, अभी भी उसका समाधान नहीं हो पाया है. इसका ख़ामियाज़ा यह हुआ कि एफआईएच को यह चेतावनी देनी पड़ी है कि यदि हॉकी इंडिया अपना चुनाव हॉकी विश्वकप के पहले नहीं कराती है तो मुमकिन है भारतीय टीम इसमें भाग न ले पाए. पूरा मामला अब कोर्ट में जा चुका है. यह है एक छोटी सी कहानी भारतीय राष्ट्रीय खेल की खस्ताहालत की.
राष्ट्रमंडल खेल भारत में इसी साल अक्टूबर में होने हैं. लेकिन जैसे-जैसे इसके आयोजन की तारीख़ क़रीब आ रही है, इससे जुड़े विवाद भी बढ़ते जा रहे हैं. इसकी तैयारियों से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक इतने विवाद हुए हैं कि यह राष्ट्रमंडल कम विवादमंडल खेल ज़्यादा नज़र आ रहा है.
इसके अलावा और भी कई खेल संघ हैं, जिनको उनके ज़िम्मे छोड़ दिया जाता है जिन्हें खेल की ज़रा भी समझ नहीं होती है. पंजाब को आतंकवाद की आग से निजात दिलाने में अहम किरदार निभाने वाले के पी एस गिल का खेलों से क्या लेना देना? लेकिन हॉकी इंडिया के अस्तित्व में आने से पहले भारतीय हॉकी संघ को लंबे अरसे तक उनके भरोसे छोड़ दिया गया. क्रिकेट की ही बात करें तो इसमें वैसे नेताओं का वर्चस्व का़फी है, जिन्हें क्रिकेट की सही समझ भी नहीं है. चाहे वह लालू यादव हों या नरेंद्र मोदी और सीपी जोशी. लेकिन ये सभी क्रिकेट संघों के अध्यक्ष हैं. फुटबॉल संघ के अध्यक्ष नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल हैं. रुचिका कांड से चर्चा में आए एस पी एस राठौर भी हरियाणा लॉन टेनिस संघ के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर चुके हैं. इस तरह एक नहीं कई उदाहरण हैं. इससे एक बात तो सा़फ है, जब तक खेलों को संवारने और विकसित करने की ज़िम्मेदारी इन पर होगी, खेल का विकास हो या न हो, इनका सितारा कभी गर्दिश में नहीं रहने वाला है.
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