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किसान कंगाल बिचौलिए मालामाल

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धान के कटोरे के रूप में विख्यात रोहतास की धरती पर दिन-रात मेहनत करने वाले किसानों की कहानी देश के अन्य हिस्सों में खेती करने वाले किसानों से अलग होती जा रही है. जहां ऐन वक़्त पर खाद की किल्लत से किसानों की कमर लगातार टूटती जा रही है, वहीं सरकारी खरीद केंद्रों पर सक्रिय बिचौलिए किसानों का हक़ मार रहे हैं. 62 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पंजाब की उपज के क़रीब पहुंच चुके रोहतास के किसान 58 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपजा कर भी अपने जीवन स्तर में कोई खास बदलाव महसूस नहीं करते हैं. धान की यह उपज पिछले वर्ष 2009 में आंकी गई थी. तब कृषि विभाग ने उम्मीद जताई थी कि रोहतास जल्द ही पंजाब के रिकॉर्ड उत्पादन के समीप होगा.

किसान खून-पसीना बहाकर फसल उपजाते हैं, लेकिन जो क़ीमत उन्हें मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाती. जब वह सरकारी खरीद केंद्र पर जाते हैं तो बिचौलिए उन्हें अपने चंगुल में फंसा लेते हैं. इस तरह बिचौलिए बिना कुछ किए धरे ही चांदी काट रहे हैं और किसान अपने हक़ से वंचित हो रहे हैं.

लगातार बढ़ती उपज, खेती में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों एवं अन्य संसाधनों के उपयोग के बाद भी यहां के किसान अपने जीवन स्तर में खास सुधार नहीं कर पा रहे हैं. का़फी विचार मंथन के बाद जो बात उभर कर सामने आई, वह यह थी कि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य न मिल पाना ही इस स्थिति की वजह है. रोहतास में जब भी धान या चावल की खरीदारी शुरू होती है तो वह कुछ बिचौलियों, एफसीआई कर्मचारियों एवं अधिकारियों के आसपास केंद्रित हो जाती है. यहां के रैक प्वाइंट से लदने वाली चावल या धान से भरी बोरियां अपने गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते मिट्टी और बालू की बोरियों में तब्दील हो जाती हैं. सूचना मिलने पर कई बार का़फी हो-हल्ला हुआ, लेकिन मामला दबा दिया गया. पिछले वर्ष यहां चावल खरीदारी में गड़बड़ी के आरोप में एफसीआई के कई पदाधिकारियों पर गाज भी गिरी, लेकिन वही पदाधिकारी एवं कर्मचारी फिर से वर्ष 2010 की खरीदारी प्रक्रिया शुरू कराने के लिए सासाराम और डेहरी के केंद्रों पर आ गए हैं. इधर सहकारी संस्थाओं के संचालक एवं पैक्सों के अध्यक्ष यह कहकर उंगली उठा रहे हैं कि एक खास संस्था से एफसीआई ने क्षमता से कई गुना ज़्यादा चावल की खरीदारी की, जबकि कई अन्य संस्थाओं के चावल लदे ट्रक एक महीने तक केंद्र के बाहर खड़े रहे. इससे लगभग 50 सहकारी संस्थाओं को लाखों रुपये का नुक़सान उठाना पड़ा. किसानों से धान और चावल लेने वाली संस्थाएं मुंह ताकते रह गईं. बताया जाता है कि कुछ बिचौलिए सासाराम पहुंचने से पहले शिवसागर स्टेशन पर ही रैक की दो बोगियां कटवा कर उस पर अपना माल लाद देते हैं और रैक प्वाइंट पर मौजूद चावल लदे ट्रक खड़े ही रह जाते हैं. जब इस मामले का खुलासा हुआ तो प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की, लेकिन तब तक खरीदारी का काम बंद हो चुका था. बाहरी केंद्रों में बतौर कमीशन प्रति क्विंटल 60 रुपये तक देने पड़े, इससे संस्थाओं की कमर टूट गई.

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