इस बात पर बहस हो सकती है कि किसी आदमी के लिए कुत्ता किसिम का, कुत्ता कहीं का जैसा जुमला गाली है या व़फादारी की पदवी. गांव-गली के कुत्ते अपने इलाक़े की पहरेदारी करते हैं. कहीं भी कोई ग़ैर मामूली हरक़त हुई कि वे चौकन्ने हो जाते हैं और ज़रूरत पड़ी तो भौंकने भी लगते हैं कि होशियार-ख़बरदार. इस मोर्चे पर कोई कुत्ता कभी अकेला नहीं पड़ता. एक के शुरू होते ही सभी सुर में सुर मिलाते हैं. वे अपने इलाक़े के सबसे बड़े चौकीदार होते हैं. हर घर की हिफाज़त के लिए तैनात रहते हैं. उन्हें इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि कौन उन्हें खिलाता है, कौन दुत्कारता है. वे अपनी ड्यूटी के पाबंद और ईमानदार होते हैं. घोड़ा बेच कर सोने वाले उन्हीं के भरोसे चैन की नींद सोते हैं. कुत्ते का काम है निगरानी रखना. पत्रकार का भी यही काम है. अपनी भाषा-बोली में पत्रकारिता को कुत्तागिरी से जोड़ना अशोभनीय हो सकता है, लेकिन अंग्रेजी में वाचडॉग ज़रूर सम्मानित संबोधन है. लेकिन किसका वाचडॉग? जनता का, सरकार और प्रशासन का या कॉरपोरेट समूहों का? हम जानते हैं कि कुत्ता अगर किसी का पालतू है तो वह केवल अपने मालिक के प्रति समर्पित होता है और अगर वह आवारा यानी आज़ाद है तो अपने इलाक़े के प्रति निष्ठावान होता है. सड़क-मोहल्ले की खाक छानने वाला ही असली कुकुर होता है और जनता का वाचडॉग कहलाने का अधिकारी भी. वरना वह मालिक के तलवे चाटने में मग्न रहता है, वाचडॉग की सामाजिक भूमिका से कट जाता है और लैपडाग हो जाता है.
कुत्ते का काम है निगरानी रखना. पत्रकार का भी यही काम है. अपनी भाषा-बोली में पत्रकारिता को कुत्तागिरी से जोड़ना अशोभनीय हो सकता है, लेकिन अंगे्रजी में वाचडॉग ज़रूर सम्मानित संबोधन है.
झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों को चूसने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियां न जाने कब से घात लगाए बैठी हैं, लेकिन राज्य सरकार के साथ किए गए सौ से अधिक करारनामे काग़ज़ी उछलकूद से आगे नहीं बढ़ सके. इसमें दुनिया की चौथी सबसे बड़ी इस्पात कंपनी आर्सेलर मित्तल की परियोजना भी शामिल है. 40 हज़ार करोड़ रुपये की लागत वाले केवल इस्पात संयंत्र के लिए कंपनी को 25 हज़ार एकड़ ज़मीन और प्रति घंटे 20 हज़ार यूनिट पानी की दरकार थी. इस विशाल संयंत्र के लिए 256 गांवों की बलि चढ़नी थी. लेकिन, राज्य सरकार का गुणा-भाग काम न आया और कंपनी ने झारखंड से पैर समेट लेने का फैसला लिया. आदिवासियों के लिए यह उनके जुझारू प्रतिरोध की जीत थी, लेकिन झारखंड के ज़्यादातर अख़बारों ने इसे आंसू बहाऊ अंदाज़ में पहले पेज की पहली ख़बर बनाया. एक बड़े अख़बार का मन इससे भी नहीं अघाया तो आर्सेलर मित्तल पर उसने ख़ास पेज अलग से नत्थी कर दिया और इसका अंत कंपनी को ईश्वर का दर्जा देते हुए किया गया. चाटुकारिता की जय हो!
अब छत्तीसगढ़ चलें. रायपुर प्रेस क्लब ने तय किया है कि किसी माओवाद समर्थक एनजीओ या बुद्धिजीवी के लिए उसके फाटक नहीं खुलेंगे. हालांकि इसका खुलासा नहीं किया गया है कि माओवादी समर्थक के बतौर उनकी शिनाख्त कैसे होगी. ज़ाहिर है कि जो राज्य प्रायोजित हिंसा के विरोध में आवाज़ उठाएंगे, वे माओवादियों के हमदर्दों में गिने जाएंगे. फिलहाल, माओवाद समर्थक एनजीओ से मतलब पीयूसीएल, आदिवासी महासभा या वनवासी चेतना आश्रम जैसे संगठनों से है. पीयूसीएल और आदिवासी महासभा बहुत पहले से जन विरोधी सरकारी नीति और नीयत की चीरफाड़ करते रहे हैं. अब वनवासी चेतना आश्रम भी रमन सिंह सरकार की आंखों की किरकिरी है. पिछले कोई 17 वर्षों से यह संगठन ग़रीब और वंचित आदिवासियों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर काम कर रहा था. तब तक कोई समस्या नहीं थी, बल्कि संस्था के सचिव हिमांशु कुमार कई सरकारी समितियों के सदस्य भी थे. 2005 में टाटा का राज्य सरकार से करार हुआ और आदिवासियों पर विस्थापन की तलवार लटकने लगी. माओवादियों से लोहा लेने के नाम पर सलवाजुड़ूम की पैदाइश हुई और ग़रीब आदिवासियों पर अत्याचार का नया एवं हिंसक अध्याय खुल गया. गांधीवादी उसूलों के पक्षधर वनवासी चेतना आश्रम ने सामाजिक कार्य के मर्म को समझा और राज्य की बर्बरता के अनगिनत मामलों को सामने लाने का दुस्साहस किया. इसकी उसे तगड़ी सजा मिली. जो माओवादी हिंसा का विरोध करता रहा, उसी संगठन को माओवादियों का समर्थक करार दिया गया.
ख़ैर, रायपुर प्रेस क्लब का विवादास्पद फैसला अघोषित रूप से न जाने कब से लागू है. कोई तीन माह पहले दंतेवाड़ा में राज्य के दमन के शिकार आदिवासी प्रेस के सामने अपनी आपबीती रखना चाह रहे थे. उन्हें वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कुमार ने इसके लिए तैयार किया था. लेकिन, प्रेस क्लब चाहता था कि आयोजक पहले साबित करें कि तथाकथित पीड़ित माओवादियों के समर्थक नहीं हैं. आयोजकों में पीयूसीएल की राज्य इकाई भी शामिल थी, जिसके उपाध्यक्ष डा. विनायक सेन माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में यानी सामाजिक सुरक्षा के लिए ख़तरा बन जाने के कारण दो साल की जेल काट चुके हैं. रायपुर प्रेस क्लब के इस रवैये पर हिमांशु कुमार ने दु:ख और आक्रोश भरे स्वरों में कहा था कि नहीं चाहिए हमें मीडिया का साथ. आदिवासी हमेशा से लड़ते रहे हैं, आगे भी लड़ेंगे, मीडिया साथ रहे या न रहे.
अख़बार अक्सर आज़ादी का राग अलापते हैं. लेकिन, किसकी आज़ादी? कैसी आज़ादी? कॉरपोरेट समूहों का चेहरा चमकाने की, सरकारी धतकरमों पर पर्दा डालने की और भूखी-नंगी जनता के सवालों से मुंह चुराने की आज़ादी? झूठ का पर्दा सरक चुका है और यह सीन सामने है कि माओवादियों के सफाए के सरकारी यज्ञ में किस तरह आदिवासियों की आहुति दी जा रही है. उन्हें उनकी ज़मीन और जंगलों से खदेड़ा जा रहा है. पुलिस, सीआरपीएफ, सलवाजुड़ूम और एसपीओज ताक़त की नंगी आज़माइश यानी लूट, आगजनी, बलात्कार और हत्याएं करने के लिए छुट्टा छोड़ दिए गए हैं. ख़ौ़फ और सितम का अश्वमेध आदिवासी गांवों को वीरान बना रहा है. लेकिन, अपने ही देश के नागरिकों के साथ किया जा रहा दुश्मन सरीखा यह सुलूक छत्तीसगढ़ के अख़बारों के लिए कोई ख़बर नहीं. सलवाजुड़ूम कठघरे में है. उसे लेकर पूरी दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की थू-थू हो रही है. बावजूद इसके उसे सरकार का संरक्षण जारी है. तो इस पर क्या चौंकना कि अगर मुख्यमंत्री रमन सिंह सलवाजुड़ूम को माओवादियों के ख़िला़फ आदिवासियों का स्वत: स्फूर्त आंदोलन मानते हैं और उनकी पुलिस के मुखिया विश्वरंजन उसे गांधीवाद के नए प्रयोग के तौर पर देखते हैं. ज़्यादातर अख़बारों की भी यही राय है. इसीलिए उन्हें सलवाजुड़ूम के शिविरों में बंधक ज़िंदगी की कराहें नहीं सुनाई पड़तीं. राज्य सरकार और अख़बारों के बीच तालमेल इस क़दर गहरा है.
इस जुगलबंदी से अलग होना कमलेश पैंकरा के लिए महंगा साबित हुआ. उन्होंने सलवाजुड़ूम के हाथों हो रहे मानवाधिकारों के हनन पर रिपोर्ट लिखने की ज़ुर्रत की थी. पुलिस अधीक्षक का आदेश था कि वह यह रिपोर्ट लिखने को अपनी ग़लती मानें और उसके लिए माफी मांगें. लेकिन, कमलेश पैंकरा दबाव में नहीं झुके और अख़बार से उनकी छुट्टी कर दी गई. हम जानते हैं कि ज़िला या ब्लॉक स्तर पर तैनात अख़बारों के प्रतिनिधि आम तौर पर वेतनभोगी नहीं होते. उनकी सेवाएं सांकेतिक मानदेय पर या मुफ़्त होती हैं. कमलेश पैंकरा बहुमत का हिस्सा नहीं बन सके. उनके लिए पत्रकारिता कोई धंधा नहीं, जज़्बे का नाम था. आजीविका का मुख्य आधार सरकारी राशन की दुकान थी, जिसका लाइसेंस रद्द कर दिया गया. माओवादियों को शरण देने का आरोप मढ़कर उनके भाई को जेल पहुंचा दिया गया. पुलिस की योजना कमलेश पैंकरा को हमेशा के लिए ख़ामोश कर देने की थी. इसकी भनक लगते ही उन्हें सपरिवार बीजापुर ज़िले से भागना पड़ा. तबसे वह दर-बदर भटक रहे हैं. इस बीच सीआरपीएफ ने उनके घर पर बुलडोज़र चला दिया. अब वहां वर्दीधारी गुंडे वॉलीबॉल खेलते हैं.
अपने पेशे के प्रति ईमानदार पत्रकार के इस हश्र पर ख़बरों की दुनिया के खिलाड़ी न जाने कहां बिला गए. मुसीबत से कौन मुठभेड़ करे और क्यों? युवा पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी. नेशनल क्राइम रिकॉडर्स ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से उनकी रिपोर्ट ने खुलासा किया कि किसानों की आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश में सबसे आगे है. रायपुर से प्रकाशित एक अख़बार में छप रहे अपने नियमित स्तंभ में उन्होंने इसका ज़िक़्र किया. इस पर ख़ासा हंगामा मचा. सरकार ने रिपोर्ट को झूठ का पुलिंदा करार दिया. अख़बार ने भी उसी मुस्तैदी के साथ शुभ्रांशु चौधरी की खोजपरक रिपोर्ट को धोखाधड़ी का नमूना बताया और एक दूसरी रिपोर्ट अपने पहले पन्ने पर छाप दी. इसी के साथ उनका स्तंभ भी समाप्त कर दिया गया. सरकारी विज्ञापनों की बैसाखी इतनी ताक़त रखती है कि उसके लिए सच को अपाहिज भी किया जा सकता है. बताते चलें कि एनसीआरबी राज्य सरकारों से प्राप्त अपराध के आंकड़ों को राष्ट्रीय स्तर पर केवल व्यवस्थित करने का काम करता है. शुभ्रांशु की रिपोर्ट को ख़ारिज़ करने का मतलब ख़ुद राज्य सरकार द्वारा एनसीआरबी को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों पर संदेह करना है. किरकिरी हुई तो राज्य सरकार यह तथ्य भूल गई और अख़बार ने भी अपनी भूल सुधारने में देरी नहीं की. लगता है कि छत्तीसगढ़ के अख़बारों ने सच को ब्लैकलिस्ट में डाल रखा है. तभी तो वे नहीं देख पाते कि सरकारी अमला किस तरह कंपनियों का कहार बनकर उनके हितों की पालकी ढोने में जुटा हुआ है. नहीं सूंघ पाते कि विकास का नारा तो मुना़फे के लुटेरों के लिए है और जिसका रास्ता जनता जनार्दन के सर्वनाश से होकर गुज़रता है. दंतेवाड़ा में सात जनवरी की जन सुनवाई नहीं होने दी गई. होती तो राज्य प्रायोजित अत्याचारों की भयावह कहानियों का पिटारा खुलता. बात दूर तलक जाती और यह सरकार की सेहत के लिए ठीक नहीं होता. इसलिए ज़िले को सील कर दिया गया. कोई 40 आदिवासी किसी तरह जन सुनवाई में अपनी आपबीती सुनाने पहुंचे. उन्हें इस तरह सुरक्षित वापस भेज दिया गया कि आइंदा वे ज़ुबान खोलने की हिम्मत न जुटा सकें. गोमपड़ गांव के उस दो साल के बच्चे को भी पुलिस संरक्षण में ले लिया गया, जिसके हाथों की अंगुलियां सुरक्षाबलों के बहादुर जवानों ने अलग कर दी थीं. उनकी गोलियों ने नौ लोगों को लाश में बदल दिया था. उस हत्याकांड की इकलौती गवाह सोडी शंबो है. वह घायल हुई और इलाज को तरसती रही. हिमांशु कुमार ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया तो उल्टे उन्हें ही शंबो के अपहरण के झूठे मामले में फंसा देने की साजिश रच दी गई. और, उन्हें दंतेवाड़ा ही छोड़ देना पड़ा. जन सुनवाई के गवाह बनने के लिए पूरे देश से लोग जुटे, उनका स्वागत सड़े अंडों और गोबर से किया गया. इन तमाम घटनाओं पर अख़बारों के कान नहीं खड़े हुए. लेकिन हां, जिद करो और दुनिया बदलो का नारा लगा रहे एक अख़बार समूह के ज़मीन हथियाओ अभियान के ख़िला़फ ग़रीब-गुरबे ज़रूर खड़े हो गए और सड़कों पर उतर आए. बिजली पैदा करने के कमाऊ धंधे के लिए किया जाने वाला गोरखधंधा करंट भी मार सकता है.
ख़ैर, रायपुर प्रेस क्लब का फैसला दरअसल अख़बारों की दुनिया में मानवीयता, स्वतंत्रता, पारदर्शिता, तथ्यपरकता और न्यायप्रियता जैसे मूल्यों के क्षरण की ओर इशारा करता है, जहां ख़बरें कच्चा माल हैं और अख़बार केवल एक उत्पाद. पाठक बस उसके उपभोक्ता. गुजरी छह अक्टूबर को रायपुर में विस्थापन के ख़िला़फ एक राज्यस्तरीय रैली का आयोजन हुआ था. इसमें सुदूर इलाक़ों से कोई दस हज़ार दुखियारे शामिल हुए थे. इनमें दो तिहाई से अधिक महिलाएं थीं. ज़्यादातर लोग नंगे पांव थे. रैली के बाद उसके कर्ताधर्ता आयोजन की समीक्षा के लिए बैठे. एक कार्यकर्ता को अगले दिन के सभी अख़बार (प्रतियां) ख़रीदने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. तभी किसी दूसरे ने मुस्करा कर कहा कि ज़्यादातर अख़बारों को तो सरकार पहले ही ख़रीद चुकी है. इस पर वहां मौजूद लोग ठहाका मारकर हंस पड़े. और, सचमुच अगले दिन के अख़बारों में रैली की ख़बर नदारद थी या फिर उसे रूटीन ख़बर के तौर पर कहीं कोने में सरका दिया गया था.
यह कारनामा वॉचडॉग नहीं, लैपडॉग करते हैं.
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