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महिलाओं को समान दर्जा समाज की हक़ीक़त नहीं

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आज हर कोई भारतीय समाज में महिलाओं को समानता की बात करता है, लेकिन जो बातें की जा रही हैं या जिस बात की वकालत की जा रही है, हक़ीक़त उससे का़फी अलग है. पुरुष प्रधान भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक प्रतिबंधों के चलते महिलाएं हाशिए पर हैं. भारतीय संदर्भ में लैंगिक समानता की बात केवल काग़ज़ों पर दिखाई देती है. भारत में लैंगिक समानता एवं महिला सशक्तिकरण की बातें करने वालों के सामने सबसे बड़ी चुनौती और हतोत्साहित करने वाली बात यह है कि महिलाओं की क़ानूनी स्थिति व समाज में उनकी वास्तविक स्थिति के बीच की गहरी खाई को पाटा कैसे जाए. यह खाई स़िर्फ समाज के अंदर ही देखने को नहीं मिलती है. सरकार और न्यायपालिका में भी कमोबेश यही स्थिति देखने को मिलती है. यह सही है कि देश के शीर्ष पद पर आज एक महिला विराजमान है और लोकसभा अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी भी एक महिला के ही ज़िम्मे है. यहां तक कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन एवं देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल की कमान भी एक महिला के ही हाथ में है. लेकिन, इन बातों से आम महिलाओं की स्थिति सुधारने में कोई मदद नहीं मिल पा रही है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रशासन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है, लेकिन यह आज भी न्यूनतम है. सर्वोच्च न्यायालय का ही उदाहरण लें, पिछले कई वर्षों से वहां कोई महिला न्यायाधीश नहीं रही है. आज भी न्यायाधीश के पद पर स़िर्फ दो महिला न्यायमूर्ति विराजमान हैं. यहां तक कि उच्च न्यायालयों में भी महिला न्यायाधीशों की संख्या नगण्य है. हालांकि सभी लोग समान प्रतिनिधित्व की बात करते हैं, लेकिन हक़ीक़त में इसका कोई प्रभाव नज़र नहीं आता है. फैसला लेने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण स्थानों में, जिनमें न्यायपालिका भी शामिल है, महिलाओं की भागीदारी किसी नखलिस्तान की तरह है, जिसमें कोई विस्तार नहीं हो रहा.

समाज में महिलाओं का दर्ज़ा आज भी पुरुषों के बाद और निम्नतर माना जाता है. समाज की तथाकथित हाई सोसाइटी में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है. हाल के दिनों में एक बड़ा परिवर्तन यह देखने को मिला है कि सामाजिक समारोहों में महिलाएं अब पुरुषों के साथ गलबहियां करते हुए ज़्यादा नज़र आने लगी हैं. विवाह समारोह आदि में धनबल का फूहड़ प्रदर्शन ग़ौर करने वाली बात है. हालांकि दहेज प्रतिषेध क़ानून और भारतीय दंड संहिता में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं. मसलन 1980 में एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि दहेज लेना और देना दोनों को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया, लेकिन इससे दहेज लेने और देने की कुरीति पर कोई असर नहीं हुआ.

दहेज निरोधक क़ानून 1961 से प्रभावी है और इसमें बाद में कड़े संशोधन भी हुए, फिर भी हालात बुरे हैं. दहेज के कारण होने वाली हत्या के मामलों को देखें तो स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा. गर्भस्थ शिशु का लिंग निर्धारित करने वाली जांच पर क़ानूनी रोक है, फिर यह निर्बाध रूप से जारी है और मादा भू्रण की हत्या बेरोकटोक की जा रही है. भ्रूण की ग़ैरक़ानूनी लैंगिक जांच शहर और गांव दोनों ही जगहों पर की जा रही है. भ्रूण के मादा होने का पता चलने पर गर्भपात कराने का चलन जोर पकड़ता जा रहा है. दहेज प्रतिषेध क़ानून के साथ ही घरेलू हिंसा निरोध क़ानून भी प्रभावी है, लेकिन महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा की घटनाओं पर इसका शायद ही कोई असर देखने को मिलता है. घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में पुलिस में रिपोर्ट कम ही दर्ज़ कराई जाती है. महिलाओं की पुरुषों पर सामाजिक-आर्थिक निर्भरता इसकी एक बहुत बड़ी वजह है. सामाजिक सुरक्षा और आजीविका के कोई उपाय न होने से हर सितम सहकर भी पति के घर में रहना उनकी विवशता होती है. ज़्यादातर मामलों में महिलाओं की पति पर निर्भरता देखने को मिलती है. पति का साथ छूट जाने की स्थिति में उनके पास जीवनयापन का कोई विकल्प नहीं होता. जीवनयापन के लिए पति से पैसा पाने की क़ानूनी लड़ाई में का़फी व़क्त बर्बाद हो जाता है.

पूरा का पूरा मामला हमारे सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा है. समाज में महिलाओं का दर्ज़ा आज भी पुरुषों के बाद और निम्नतर माना जाता है. समाज की तथाकथित हाई सोसाइटी में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है. हाल के दिनों में एक बड़ा परिवर्तन यह देखने को मिला है कि सामाजिक समारोहों में महिलाएं अब पुरुषों के साथ गलबहियां करते हुए ज़्यादा नज़र आने लगी हैं. विवाह समारोह आदि में धनबल का फूहड़ प्रदर्शन ग़ौर करने वाली बात है. हालांकि दहेज प्रतिषेध क़ानून और भारतीय दंड संहिता में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं. मसलन 1980 में एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि दहेज लेना और देना दोनों को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया, लेकिन इससे दहेज लेने और देने की कुरीति पर कोई असर नहीं हुआ. वास्तविकता यह है कि पिछले कुछ दशकों में दहेज की कुरीति सभी धर्मों, जातियों और संप्रदायों में घर कर चुकी है. दहेज के मामले केवल तभी दर्ज़ कराए जाते हैं, जब विवाह के बाद तनाव हद की सीमा को लांघ गया हो या इसके अलावा दूसरा कोई उपाय न बचा हो.

बलात्कार के मामले को ही लें. बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के बावजूद इसके ज़्यादातर मामले दर्ज़ नहीं कराए जाते, क्योंकि मामला दर्ज़ कराने से लेकर तहक़ीक़ात की पूरी प्रक्रिया महिलाओं की गरिमा को का़फी कलंकित करने वाली है. जांच के स्तर पर भी महिलाओं को उत्पीड़ित होना पड़ता है. न्यायिक प्रक्रिया भी महिलाओं के पक्ष में मददगार नज़र नहीं आती है. बावजूद इसके  उच्चतर न्यायपालिका, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, ने इसके लिए स्पष्ट दिशा- निर्देश जारी कर रखे हैं. विसाका मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होने के बाद यौन उत्पीड़न के मामलों में कुछ सकारात्मक प्रगति देखने को मिली. लेकिन, इतने सालों के बाद सरकार इस मसले पर कोई क़ानून बना पाने में नाकाम रही है और सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आज भी दिशा-निर्देश का काम कर रहा है. जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर यह कह रखा है कि सरकार इस मसले पर एक कारगर विधेयक लाएगी, लेकिन सरकार इसमें नाकाम रही. ये तो बस कुछ दृष्टांत भर हैं. क़ानून को लागू करने वाली एजेंसियों के साथ यह प्रतिबद्धता नहीं दिखाई देती है. हाल ही में चर्चित रहा रुचिका-राठौड़ मामला तो बस एक उदाहरण है, जिसमें क़ानून का पालन कराने वाले तंत्र की कमियां उजागर हुईं. इस मामले ने एक बार फिर से यह साबित किया कि महिलाएं हमेशा उत्पीड़न ही झेलती हैं और आरोपी बेख़ौ़फ होकर घूमता रहता है. केवल इतना ही नहीं, रुचिका मामले में एक बेकसूर-मासूम लड़की को आत्महत्या के लिए बाध्य होना पड़ा और आरोपी क़ानून का पालन कराने वाली सबसे सक्षम एजेंसी पुलिस महकमे का आला अधिकारी बना दिया गया. और तो और, उसे राष्ट्रपति पदक तक से नवाजा गया. यह बेहद दुखद और शर्मनाक़ बात थी.

आख़िर ऐसी स्थिति क्यों है? हम सभी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. न्याय दिलाने और क़ानून का पालन कराने वाली यानी दोनों ही एजेंसियां इसके लिए समान रूप से उत्तरदायी हैं. समाज के क़ायदे-क़ानून और सामाजिक व्यवहार के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है. क़ानून तो लागू कर दिया गया है, लेकिन उसका पालन नहीं किया जा रहा है. विधायिका केवल काग़ज़ पर क़ानून लागू करने के बारे में चिंता करती है. वह इस बात की फिक़्र ज़रा भी नहीं करती कि क़ानून का पालन उसकी मूल भावना को ध्यान में रखते हुए सही तरीक़े से किया गया या नहीं. वह इसके पालन में ढिलाई बरतने का सारा दोष क़ानून लागू करने वाली एजेंसी के मत्थे मढ़कर अपना पल्ला झाड़ लेती है. राजनेताओं को तो बस अपने वोटबैंक की फिक़्र रहती है.

जहां तक विधायी सवाल हैं तो पंचायत एवं ज़िला परिषदों में महिलाओं के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू कर महिला सशक्तिकरण की दिशा में सही क़दम उठाए गए हैं, लेकिन महिला आरक्षण बिल का भविष्य राजनीतिक कारणों से अभी भी अधर में लटका हुआ है. कई राजनेता पहले से जारी आरक्षण व्यवस्था में ही महिलाओं को आरक्षण की सुविधा देना चाहते हैं. संविधान महिला और पुरुष दोनों के समान अधिकारों की बात करता है, लेकिन वास्तव में ऐसा शायद ही देखने को मिलता है. हम बड़ी बेसब्री से इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि महिला आरक्षण विधेयक जल्द ही पारित होगा.

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