राष्ट्रमंडल खेल का काउंट डाउन शुरू हो चुका है. खेल गांव से लेकर महंगे होटलों, फ्लाईओवर और सड़क निर्माण पर करोड़ों रुपये फूंके जा चुके हैं. दिल्ली को शंघाई बनाने की कवायद जारी है. कुल मिलाकर कहें तो खेल के पीछे भी एक खेल चल रहा है. लगभग हरेक भारतीय खेल संघ के अध्यक्ष पद की कमान नेताओं के हाथों में है. नतीजतन, राष्ट्रमंडल खेल नेताओं का जमावड़ा ज़्यादा नज़र आने लगा है. लेकिन इन सब के बीच बस एक ही सवाल बार-बार सिर उठा रहा है कि राष्ट्रमंडल खेल से हम कितनी उम्मीद कर सकते हैं? कितने पदक जीत पाएंगे हम? पदक तालिका में क्या हम शीर्ष पर पहुंच पाएंगे? यदि भव्य आयोजनों के नाम पर अरबों रुपये ख़र्च करने से पदक तालिका में नंबर एक स्थान हासिल किया जा सकता तो बात बन सकती थी. लेकिन क्या कभी ऐसा होता है? बिना किसी लागलपेट के कहा जाए तो हम किसी भी हालत में अव्वल नहीं आने वाले. कारण कई हैं. जो खिलाड़ी हमें पदक दिलाते, उनकी तैयारियों को हमने भगवान भरोसे छोड़ दिया है.
खेल संघ राष्ट्रमंडल खेलों के लिए उन्हीं खिलाड़ियों को ज़्यादा एक्सपोज़ कर रहे हैं, जिनके पदक जीतने की उम्मीद कम है. और, जो खेल और खिलाड़ी पदक जीत सकते हैं, उन पर किसी का ध्यान नहीं है. यह हम सभी जानते हैं कि एथलेटिक्स, स्न्वैश और तैराकी में पदक जीतने की हमारी उम्मीद कितनी है? हमें हर तऱफ निराशा ही हाथ लगने वाली है. लेकिन जिन खेलों में हम पदक जीत सकते हैं, उन पर खेल संघों की गाज गिर रही है.
हाल में दक्षिण एशियाई खेलों (सैग) में भारत ने सबसे अधिक स्वर्ण पदक जीते. हम पदक तालिका में भी पहले पायदान पर रहे. लेकिन राष्ट्रमंडल खेल सैग खेलों से कहीं बड़ा आयोजन है. और, सैग खेलों में जैसी हमारी बादशाहत रही है, राष्ट्रमंडल में वह दूर की कौड़ी नज़र आ रही है. सबसे पहले एथलेटिक्स की बात करें. शायद ही किसी को भारतीय एथलीट्स का नाम भी मालूम होगा. शायद ही किसी को मालूम हो कि भारत में एथलेटिक्स की कोई प्रतियोगिता भी होती है. एक व़क्त था, जब इन खेलों में भी भारत की तूती बोलती थी. कहां गए फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह जैसे धावक, जिन्होंने 1958 के एशियाई एवं राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया था? आज भारतीय एथलेटिक्स संघ राष्ट्रमंडल खेल में छह से आठ पदक जीतने का दावा कर रहा है. हम सभी चाहते हैं कि भारत राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे ज़्यादा पदक जीते. लेकिन स़िर्फ चाहने से क्या होता है? आख़िर किन खेलों और खिलाड़ियों के बूते हम पदकों की उम्मीद लगाए बैठे हैं? राष्ट्रमंडल खेल में जिन खेलों को शामिल किया गया है, उनमें चंद खेलों को छोड़ दें तो बाक़ी में हम फिसड्डी ही हैं. जिन खेलों में अव्वल हैं, उनकी राह में विभिन्न भारतीय खेल संघ रोड़ा डाल रहे हैं. खेल संघों के अधिकारी खिलाड़ियों की तैयारियों पर कम उनसे उलझने पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं. कुश्ती, स्न्वैश, तैराकी, तीरंदाजी जैसे खेलों में हमारी क्या हालत है, सभी को मालूम है. दरअसल क्रिकेट जैसे कुछ खेलों के आयोजन ही साल भर होते रहते हैं, जबकि एथलेटिक्स जैसे खेलों का आयोजन कब हुआ और किसने पदक जीता, यह किसी को मालूम नहीं चलता. राष्ट्रीय खेलों में इसका आयोजन होता भी है तो यह भी अक्सर रद्द ही होता रहता है. हाल ही में झारखंड में होने वाले राष्ट्रीय खेलों को पांच द़फा रद्द किया जा चुका है. अब जबकि राष्ट्रमंडल खेल होने हैं तो अधिकारी भी मुस्तैद नज़र आ रहे हैं, कहीं भारत की नाक न कट जाए. इसलिए वह खिलाड़ियों के प्रशिक्षण पर ध्यान दे रहे हैं. पर यहां भी उनकी असलियत किसी से छिपी नहीं है. आपको बता दें कि भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में स्न्वैश टीम के लिए 15 पुरुष और 12 महिला खिलाड़ियों को इस श्रेणी में चुना है. लेकिन अतीत का रिकॉर्ड बताता है कि अभी तक किसी भी भारतीय स्न्वैश खिलाड़ी ने राष्ट्रमंडल खेलों में एक भी पदक नहीं जीता है.
खेल संघ राष्ट्रमंडल खेलों के लिए उन्हीं खिलाड़ियों को ज़्यादा एक्सपोज़ कर रहे हैं, जिनके पदक जीतने की उम्मीद कम है. और, जो खेल और खिलाड़ी पदक जीत सकते हैं, उन पर किसी का ध्यान नहीं है. यह हम सभी जानते हैं कि एथलेटिक्स, स्न्वैश और तैराकी में पदक जीतने की हमारी उम्मीद कितनी है? हमें हर तऱफ निराशा ही हाथ लगने वाली है. लेकिन जिन खेलों में हम पदक जीत सकते हैं, उन पर खेल संघों की गाज गिर रही है. पदक की एकमात्र आशा हमें हॉकी, निशानेबाज़ी और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों से है, लेकिन पिछले कुछ समय से इनके खिलाड़ियों के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया, उससे खेल अधिकारियों की मंशा ज़ाहिर हो जाती है. हॉकी खिलाड़ियों ने वेतन-भत्ता न मिलने की वजह से बग़ावत का झंडा बुलंद कर दिया. पहले पुरुष खिलाड़ियों ने किया, उसके बाद महिलाओं ने. बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा द्वारा नेशनल राइफल एसोसिएशन की हरक़तों से तंग आकर संन्यास लेने की बात भी पुरानी नहीं है. मुमकिन है, वह राष्ट्रमंडल खेलों में भाग भी न ले पाएं. यानी इस तरह एक और पदक जीतने की भारत की उम्मीदों पर पानी फिरता नज़र आ रहा है.
भारोत्तोलन टीम से भी भारत की का़फी उम्मीदें रहती थीं. ख़ासकर महिला भारोत्तोलकों से. पर एक एक करके सारी महिला खिलाड़ी डोप टेस्ट में फंसती जा रही हैं. लेकिन यहां भी खिलाड़ियों का कम अधिकारियों का कसूर ज़्यादा नज़र आ रहा है. ज़रा सोचिए, भारतीय वेट लिफ्टिंग टीम में वैसी महिला खिलाड़ियों को निशाना बनाया जा रहा है, जो ज़्यादातर दूरदराज़ के आदिवासी इलाक़ों से ताल्लुक़ रखती हैं. इन जगहों की सीधी-सादी खिलाड़ियों को तो उन दवाइयों के बारे में मालूम भी नहीं होता. भला कोई खिलाड़ी ऐसे जोख़िम लेकर अपने पूरे करियर को क्यों बर्बाद करना चाहेगी? दरअसल होता यह है कि खेल संघों के अधिकारी अपना उल्लू सीधा करने और अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए खिलाड़ियों को सही प्रशिक्षण नहीं देते. और देते हैं तो ऐसी दवा, जिससे उनकी शारीरिक क्षमता बढ़े और वे पदक जीत सकें. लेकिन पदक के नाम पर वे डोप टेस्ट में फंस जाती हैं और उनका पूरा करियर तबाह हो जाता है.
आख़िर क्या वजह है, हॉकी या क्रिकेट के चंद मैच हारने के बाद कोच से लेकर तमाम अधिकारियों को लानत मलानत के बाद हटा दिया जाता है. पर इन खेलों के अधिकारी अपनी कुर्सी बचाने में सफल हो जाते हैं. क्या हम इसी खेल संस्कृति से पदक की उम्मीद करते हैं? और, क्या ऐसे ही खेल संघों के अधिकारी भारतीय खेल के विकास में अपनी भूमिका निभाएंगे? इसके जवाब के लिए हमें ज़्यादा नहीं, राष्ट्रमंडल खेलों तक इंतज़ार करने की ज़रूरत है.
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