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सर्वोच्च न्यायालय का विभाजन : एक खतरनाक खेल

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कानून मंत्रालय द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक खंड और अपीलीय खंड में बांटने के मुद्दे का बारीक़ी से परीक्षण किए जाने की ख़बर है. यह विधि आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है. विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को विभाजित करने और संविधान संबंधी मामलों एवं इससे जुड़े दूसरे मसलों को देखने के लिए दिल्ली में एक संवैधानिक पीठ और चार अलग-अलग जगहों पर अभिशून्य पीठ स्थापित करने की अनुशंसा की है. इसके अलावा देश के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थापित होने वाली पीठ उत्तर क्षेत्र- दिल्ली में, दक्षिण क्षेत्र-चेन्नई या हैदराबाद में, पूर्व क्षेत्र- कोलकाता में और पश्चिमी क्षेत्र-मुंबई में उन अपीलीय मामलों को देखेंगी, जो उस ख़ास क्षेत्र के उच्च न्यायालयों के निर्णय या आदेशों के बाद दायर किए जाएंगे.

सर्वोच्च न्यायालय मज़बूत केंद्र को प्रतिबिंबित करता है और भारतीय संघवाद में केंद्रीय महत्व रखता है. और, अगर सर्वोच्च न्यायालय को बांटा जाता है तो यह भारतीय संविधान की बुनियाद पर हमला करने जैसा होगा.

विधि आयोग ने अपनी अनुशंसा में कहा है कि उसकी अनुशंसा को लागू कर पाने में अगर संविधान का अनुच्छेद 130 कोई रुकावट बनता है तो संसद को इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संवैधानिक संशोधन की दिशा में समुचित पहल करनी चाहिए. उच्चतर न्यायालयों में लंबित मामलों में कमी लाने और इन अदालतों में न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए सही व्यक्ति तलाश पाने में होने वाली परेशानी को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र सीमा बढ़ाकर 70 वर्ष एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की उम्र सीमा 65 वर्ष करने की अनुशंसा की गई है. बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय को बांटने का मसला आसान नहीं है, क्योंकि विधि आयोग इसे सामने लाया है और उसी ने इसकी अनुशंसा की है. सर्वोच्च न्यायालय न केवल लोकतंत्र का एक प्रमुख स्तंभ है, बल्कि आज के अस्थिर माहौल में यह लोकतंत्र और देश का साथ क़ायम रखने में अहम भूमिका निभा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय न केवल अपील की अंतिम अदालत है, बल्कि संवैधानिक मामलों और संघ एवं राज्य के बीच तथा अंतरराज्यीय विवादों को निपटाने वाला पंच भी है. संघवाद के मामले और देश की संप्रभुता अक्षुण्ण रखने में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, दुर्भाग्यवश विधि आयोग इसके अंदर गया ही नहीं. विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के विभाजन को ऐसे उपकरण के रूप में देखा, जिससे वहां लंबित मामलों में कमी लाई जा सकती है. लेकिन केवल सर्वोच्च न्यायालय ही क्यों? उच्च न्यायालयों और अन्य अधीनस्थ न्यायालयों में मामले ज़्यादा लंबित हैं. अधीनस्थ न्यायालयों में मामले लंबित रहने से ग़रीब लोगों को ज़्यादा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है और सर्वोच्च न्यायालय का बंटवारा न्यायिक व्यवस्था में होने वाली देरी का निदान नहीं है विधि आयोग ने अपनी अनुशंसा में इस मसले को स्वयं ही उठाने का उल्लेख किया है. व्यापक परिणाम वाले मसलों पर

अलग-अलग स्तर पर बहस बेहद ज़रूरी है. इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी संस्था जो अनुशंसा करती है, जैसे विधि आयोग ने जो अनुशंसा की है, इस बात की का़फी आशंका रहती है कि क्षेत्रवाद और प्रांतवाद की तऱफदारी करने वाली शक्तियां व्यक्तिगत लाभ के लिए उसका दोहन करें. मुंबई और महाराष्ट्र में हम यह देख चुके हैं.

ऐसा मुद्दा, जिससे देश की एकता एवं अखंडता प्रभावित होती है और जो हमारे समाज के संघीय ढांचे को कमज़ोर करता है, उस पर नियंत्रण और सावधानी ज़रूरी है. भारतीय संघवाद और लोकतंत्र के लिए केंद्र का मज़बूत होना ज़रूरी है. मज़बूत केंद्र ही देश के अंदर और बाहर सक्रिय अलगाववादी शक्तियों, जो देश को टुकड़ों में बंटा देखना चाहती हैं, का मुक़ाबला करने में सक्षम हो सकता है. सर्वोच्च न्यायालय देश की राजधानी दिल्ली में स्थित है. यह भारतीय संघवाद की ताक़त और मज़बूत केंद्र का परिचायक है. प्रत्येक व्यक्ति इसे अंतिम विधिक प्राधिकार के तौर पर देखता और पहचानता है. इसके काम करने से भारतीय संघ को भरपूर शक्ति मिलती है. सर्वोच्च न्यायालय मज़बूत केंद्र को प्रतिबिंबित करता है और भारतीय संघवाद में केंद्रीय महत्व रखता है. और, अगर सर्वोच्च न्यायालय को बांटा जाता है तो यह भारतीय संविधान की बुनियाद पर हमला करने जैसा होगा.

बहरहाल, संविधान में दिल्ली के अलावा दूसरी जगहों पर भी सर्वोच्च न्यायालय की पीठ या पीठें स्थापित करने का प्रावधान है. संविधान के अनुच्छेद 130 में यह प्रावधान है कि उच्चतम न्यायालय दिल्ली अथवा ऐसे अन्य स्थान या स्थानों में अधिविष्ठ होगा, जिन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति के अनुमोदन से समय-समय पर नियत करें.

भारत संघ बनाम एस पी आनंद मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह विचार व्यक्त किया था कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 130 एक ऐसा प्रावधान है, जो भारत के मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति के अनुमोदन से दिल्ली के अलावा दूसरी जगह या जगहों पर सर्वोच्च न्यायालय की पीठ स्थापित करने की शक्ति प्रदान करता है. अनुच्छेद 130 को भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली के अलावा दूसरे स्थान या स्थानों पर अधिविष्ठ करने की अनिवार्य ज़िम्मेदारी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. कोई भी अदालत भारत के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को अनुच्छेद 130 की शक्तियों को इस्तेमाल करने का निर्देश नहीं दे सकती. विधि आयोग जिस बात को समझ पाने में नाकामयाब रहा, वह यह है कि संविधान का अनुच्छेद 130 केवल इस बारे में है कि सर्वोच्च न्यायालय को दिल्ली के अलावा किसी भी जगह अधिविष्ठ किया जा सकता है. सर्वोच्च न्यायालय को विभाजित करने की बात संविधान के किसी भी अनुच्छेद में नहीं कही गई है. अगर ऐसी बातें होतीं तो संविधान निर्माताओं के स्वर बिल्कुल ही अलग होते. कहने की ज़रूरत नहीं कि अनुच्छेद 130 में बस एक ही प्रावधान का उल्लेख है. सर्वोच्च न्यायालय के बंटवारे की अपनी व्यवहारिक कठिनाइयां हैं. मसलन अगर अलग-अलग पीठ किसी मामले में विरोधाभासी निर्णय देती हैं या राय रखती हैं तो ऐसी परिस्थिति में क्या होगा?

विधि आयोग ने एक अलग संवैधानिक पीठ स्थापित करने की अनुशंसा की है. आयोग के मुताबिक़, संवैधानिक पीठ विशेष तौर पर संवैधानिक और लोकहित याचिका से जुड़े मामलों को ही देखेगी. यह मसला किसी भी तरह भारतीय संघ को कमज़ोर न करे, देश के विधि मामलों के विशेषज्ञों एवं सांसदों को इस पर ग़ौर फरमाना होगा. उन्हें यह देखना होगा कि विधि आयोग ने जो अनुशंसाएं की हैं, उनमें से कौन देश के लिए सही रहेंगी. उन्हें इस बात का फैसला करना होगा. कुछ देशों में ऐसी अदालतें काम कर रही हैं और वहां का क्या अनुभव है, इस पर ग़ौर करना होगा.

यहां तक कि भारत के महान्यायवादी (अटार्नी जनरल) जी ई वाहनवति ने सर्वोच्च न्यायालय को विभाजित करने की कोशिशों की आलोचना की थी. अब भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने भी सर्वोच्च न्यायालय को बांटने के ख़िला़फ आवाज़ बुलंद की है और चेतावनी दी है कि इससे सर्वोच्च न्यायालय के प्रभाव में कमी आएगी. भारत के मुख्य न्यायाधीश के मुताबिक़, मैं सर्वोच्च न्यायालय को बांटने के पक्ष में नहीं हूं. व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय देश के किसी दूसरे हिस्से में नहीं होना चाहिए. यह देश की सर्वोच्च अदालत है और इसे देश की राजधानी में ही होना चाहिए. यह उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार विधि आयोग की अनुशंसा को जब तक पूरी तरह से परख नहीं लेगी, तब तक उस पर कोई निर्णय नहीं लेगी.

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