तस्करों का नया अड्डा

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भारत-नेपाल को विभाजित करने वाली 1850 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा इन दिनों अतिक्रमण का शिकार होकर देश विरोधी तत्वों की शरणस्थली एवं तस्करों का एक प्रमुख अड्डा बन गई है. मालूम हो कि दोनों देशों के मध्य स्थित विभाजक रेखा को आम बोलचाल में नो मेंस लैंड कहा जाता है. लोगों ने यहां इस क़दर अतिक्रमण कर लिया है कि देखने से पता ही नहीं चलता कि यह नो मेंस लैंड एरिया है. आलम यह है कि इस प्रतिबंधित इलाक़े में निवास करने वाले परिवारों की संख्या सैकड़ों में नहीं, हज़ारों में है. नो मेंस लैंड के लिए 1850 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा में छोड़ी गई 20 गज चौड़ी पट्टी पर लोगों ने झोपड़ी से लेकर पक्के मकान तक बना लिए हैं. जगह-जगह घास-फूस समेत खेती-बाड़ी का काम यहां बेरोकटोक किया जा रहा है. दोनों देशों की सेना एवं पुलिस के प्रभाव से मुक्त माने जाने वाले नो मेंस लैंड क्षेत्र में जहां देश विरोधी तत्व आराम फरमाते हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय तस्कर इस क्षेत्र का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं.

भारतीय भू-भाग की तुलना में नेपाली भू-भाग में अतिक्रमण अधिक है. इलाक़े में रहने वाले हज़ारों लोगों की अपनी समस्याएं हैं. उन्हें किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती है. अधिकांश लोगों के फोटो पहचान पत्र तक नहीं बन पाए हैं. क्षेत्र में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सटीक बैठती है.

इस क्षेत्र में अतिक्रमण और 60 फीट चौड़ी पट्टी के सिकुड़ जाने के कारण भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कड़ी चौकसी का उच्चस्तरीय सरकारी आदेश धरातल पर दम तोड़ता नज़र आता है. सीमांचल इलाक़े में व्याप्त भीषण ग़रीबी एवं अत्यंत पिछड़े समाज में आवासीय भूमि का अभाव नो मेंस लैंड में अतिक्रमण का एक प्रमुख कारण माना जाता है. जिन्हें कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता, वे आराम से यहां आशियाना बना लेते हैं. इनमें ग़रीब, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समुदाय के लोग शामिल हैं. नो मेंस लैंड के खंभा संख्या 269/8, जो भारत के अकौन्हा गांव से सटा हुआ है, के पास दर्ज़नों झोप़डीनुमा घर बने हुए हैं. कुछ ऐसा ही हाल खंभा संख्या  270/9 और 268/6 का है. कहीं पचकौड़ी सदाय झोपड़ी बनाकर रहते हैं, तो कहीं मोहम्मद सुलेमान पक्के मकान में. नो मेंस लैंड क्षेत्र में अतिक्रमण दोनों देशों के नागरिकों द्वारा किया गया है. भारतीय भू-भाग की तुलना में नेपाली भू-भाग में अतिक्रमण अधिक है. इलाक़े में रहने वाले हज़ारों लोगों की अपनी समस्याएं हैं. उन्हें किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती है. अधिकांश लोगों के फोटो पहचान पत्र तक नहीं बन पाए हैं. क्षेत्र में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सटीक बैठती है, जो जितना दबंग है, वह उतने ही बड़े भू-भाग पर क़ाबिज़ है. इन्हीं ग़रीब, अनपढ़ एवं पिछड़े लोगों को प्रलोभन देकर देश विरोधी तत्व यहां शरण पाते हैं. जानकारों का मानना है कि दुनिया के किसी भी हिस्से से नेपाल पहुंच कर राष्ट्र विरोधी तत्व नो मेंस लैंड में पहले शरण पाते हैं, फिर चुपके से भारत में प्रवेश कर जाते हैं. सीमा क्षेत्र की बनावट ऐसी है कि लगातार चौकसी बरत रहे एसएसबी के जवानों को इसकी हवा तक नहीं लग पाती. तस्कर इस भूमि का उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं. तस्करी का सामान पहले यहां इकट्ठा किया जाता है, फिर उसे मौका मिलते ही सीमा पार भेज दिया जाता है.

देर से ही सही, मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार का ध्यान इस ओर गया है. नेपाल से सटे बिहार के मधुबनी ज़िले की 74 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा में तैनात अर्द्धसैनिक बल एसएसबी की 14वीं बटालियन के समादेष्टा बंदन सक्सेना ने नो मेंस लैंड में अतिक्रमण की बात स्वीकार करते हुए बताया कि इस बाबत पहचान के लिए सर्वेक्षण का कार्य पूरा कर लिया गया है. बीते दिनों जानकी नगर बीओपी में हुई भारत-नेपाल के अधिकारियों की एक उच्चस्तरीय बैठक में भी नो मेंस लैंड क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए व्यापक विचार-विमर्श किया गया. इस दौरान चिन्हित स्थलों के नक़्शों का आदान-प्रदान भी किया गया. सर्वेक्षण में पाया गया कि कई स्थानों पर नो मेंस लैंड का खंभा आंगन (चाहरदीवारी के भीतर) तक में है. यदि शीघ्र ही इलाक़े को अतिक्रमण मुक्त नहीं कराया गया तो स्थिति और विकट हो सकती है.

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