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उत्तर बिहार : राजनीतिक घरानों में घमासान

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उत्तर बिहार में राजनीतिक घरानों का घमासान शुरू हो गया है. सियासी पुनर्वास की जद्दोज़हद में लगे लोगों में कोई डाल से छूटा पक्षी है तो कोई कटी पतंग. सबका स़िर्फ एक ही मक़सद है कि जिस सीट पर कभी पिता, ससुर एवं पति निर्वाचित हुए, उस पर फिर से परिवार का परचम लहराना है. घरानों के घमासान में इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भी अग्निपरीक्षा होनी है. वर्ष 2009 के विधानसभा उपचुनाव में सांसदों एवं मंत्रियों के बेटों, पत्नी अथवा किसी अन्य उत्तराधिकारी को नीतीश ने प्रत्याशी नहीं बनाया. यूं कहें कि टिकट नहीं दिया, लेकिन अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश वर्ष 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजनेताओं के उत्तराधिकारियों की दावेदारी को कहां तक नकार पाते हैं. मधुबनी से निर्वाचित विधान पार्षद विनोद कुमार सिंह कहते हैं कि कोई भी नेता बेरोज़गार नहीं होना चाहता है. जो पिछले चुनाव में जीते, उन्हें अपनी कुर्सी बचाने की चिंता है. जो हारे, वे फिर से कुर्सी पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं.

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर आहत पूर्व मंत्री वीणा शाही ने जदयू की सदस्यता ग्रहण तो कर ली, लेकिन यहां उनके राजनीतिक पुनर्वास का संकट पैदा हो गया है. जिस वैशाली विधानसभा क्षेत्र का उन्होंने दो बार प्रतिनिधित्व किया और जहां से उनके ससुर एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री एल पी शाही और पति स्वर्गीय हेमंत शाही निर्वाचित हुए थे, उस सीट पर फिलहाल राज्य के ग्रामीण कार्य मंत्री वृषिण पटेल का क़ब्ज़ा है. उनका टिकट काटकर वीणा शाही को प्रत्याशी बनाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. इस कारण परेशान वीणा शाही ने वैशाली प्रवास के दौरान चिंतामणिपुर हाईस्कूल की सभा में नीतीश कुमार को बताया कि अपने मायके एवं सीता माता की जन्मभूमि सीतामढ़ी और ससुराल वैशाली (बुद्ध की कर्मभूमि एवं महावीर की जन्मभूमि) का उनके जीवन में बड़ा महत्व है. ऐसा कहकर वीणा शाही ने मुख्यमंत्री को बताना चाहा कि वैशाली से सीतामढ़ी के बीच उनका आधार है और वह इस बीच के ही किसी क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहेंगी. वैसे वीणा शाही के नाम की चर्चा मुज़फ़़्फरपुर के कांटी विधानसभा क्षेत्र के लिए भी हो रही है, मगर किसी दूसरे क्षेत्र से उनका पुनर्वास आसान नहीं होगा.

नीतीश वर्ष 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजनेताओं के उत्तराधिकारियों की दावेदारी को कहां तक नकार पाते हैं. मधुबनी से निर्वाचित विधान पार्षद विनोद कुमार सिंह कहते हैं कि कोई भी नेता बेरोज़गार नहीं होना चाहता है. जो पिछले चुनाव में जीते, उन्हें अपनी कुर्सी बचाने की चिंता है. जो हारे, वे फिर से कुर्सी पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र धर्मसंकट में हैं. वह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि जदयू में बने रहें या फिर से कांग्रेस का दामन थाम लें. डॉ. मिश्र की नीतीश कुमार से नाराज़गी और उनके पुत्र नीतीश मिश्र के राज्य मंत्रिमंडल से इस्ती़फे के बाद पार्टी से पिता-पुत्र के रिश्ते सामान्य नहीं रहे. हालांकि मधुबनी में हर्ट अस्पताल के उदघाटन के मौक़े पर नीतीश कुमार और डॉ. मिश्र एक मंच पर नज़र आए. नीतीश मिश्र ने झंझारपुर में नीतीश कुमार से पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की प्रतिमाओं का अनावरण कराया, लेकिन डॉ. मिश्र अभी अनिर्णय की स्थिति में हैं. नीतीश मिश्र पिछली बार मधुबनी के झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे. झंझारपुर से पुन: जीतने के लिए उन्हें पिछड़ी जातियों के वोटों की ज़रूरत पड़ेगी. इस समीकरण को मज़बूत करने के लिए उन्होंने ललित-कर्पूरी की प्रतिमाओं का अनावरण कराया. मगर, इस मंच पर डॉ. जगन्नाथ मिश्र की अनुपस्थिति से सवाल उठ रहे हैं.

हालांकि अख़बारों में डॉ. मिश्र ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के पक्ष में बयान देकर नए समीकरणों का संकेत दिया. इससे अनुमान लगाया जाता है कि डॉ. मिश्र पूर्व विधान पार्षद पदमाशा झा के माध्यम से सोनिया गांधी की ड्‌योढ़ी तक पहुंचने की कोशिश में हैं. बाईपास सर्जरी करा चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद को अपनी ढलती उम्र की चिंता सताने लगी है. वह अपने बेटे अजय निषाद को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए बेचैन हैं. वर्ष 2005 में उन्होंने अपने बेटे को साहेबगंज से जदयू प्रत्याशी बनवाया, लेकिन सफलता नहीं मिली. दूसरे चुनाव में अजय निषाद कुढ़नी से राजद प्रत्याशी बने, पर यहां भी वह हार गए. कैप्टन निषाद मीनापुर, कुढ़नी अथवा औराई से बेटे को विधानसभा में पहुंचाना चाहते हैं. मगर, विधानसभा उपचुनाव में राजनेताओं के उत्तराधिकारियों को टिकट न देने वाले नीतीश कुमार के लिए अजय निषाद को टिकट देना आसान नहीं होगा. अगर टिकट मिल भी गया तो जीतने की गारंटी कौन देगा? क्योंकि, कुढ़नी एवं मीनापुर के वर्तमान विधायकों और औराई के दावेदारों का टिकट काटना संभव नहीं है. वहीं अगर अजय निषाद प्रत्याशी न बनाए गए तो कैप्टन निषाद दर्ज़नों सीटों पर संकट खड़ा कर सकते हैं. पूर्व मंत्री रघुनाथ पांडेय ने तीन बार म़ुजफ़्फरपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. उनकी बहू विनीता विजय वर्ष 2005 के लोकसभा चुनाव में मुज़फ़्फरपुर से कांग्रेस प्रत्याशी बनाई गईं. साफ छवि वाली विनीता का शहर में अल्पसंख्यकों एवं अन्य जातियों ने खुलकर समर्थन किया. राज्य में अपने बूते चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस एक बार फिर विनीता को प्रत्याशी बनाना चाहेगी, लेकिन अगर भाजपा ने प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश शर्मा को प्रत्याशी बना दिया तो वोटों के विभाजन का लाभ राजद को मिल सकता है. मुज़फ़्फरपुर में विजेंद्र चौधरी से लोहा लेना किसी प्रत्याशी के लिए आसान नहीं होगा. शहर के हर मुहल्ले में आज भी उनके पास अपने कार्यकर्ताओं की फौज है और समाज के हर वर्ग में उनकी गहरी पैठ है. राजद और लोजपा के लिए विजेंद्र मैच जिताने वाले खिलाड़ी साबित होंगे.

पूर्व मंत्री प्रो. शंभु शरण ठाकुर कांटी से निर्वाचित हुए थे. वह अपनी बेटी नीती सिन्हा को जदयू प्रत्याशी बनाना चाहते हैं. कांटी में जदयू प्रत्याशी बदले जाने की अटकलबाजी के बीच प्रो. ठाकुर सहित कई राजनेता सक्रिय हो गए हैं. पूर्व मंत्री स्व. महंथ राम किशोर दास ने वर्ष 1967 एवं 1971 में मीनापुर का प्रतिनिधित्व किया. वह बी पी मंडल सरकार में मंत्री भी रहे. उनके कनिष्ठ पुत्र विजय किशोर उर्फ पप्पू जी की सक्रियता बढ़ गई है, लेकिन अब मीनापुर के राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं. कुरेदने पर विजय किशोर सांकेतिक भाषा का प्रयोग करते हैं. अगर लालू प्रसाद कांटी, कुढ़नी, साहेबगंज और औराई जैसे क्षेत्रों में भूमिहार प्रत्याशी खड़ा करते हैं तो एनडीए के जनाधार की पोल खुल जाएगी.

सारण स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार विधान पार्षद निर्वाचित हो रहे डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह का सपना है कि वह एक बार फिर विधानसभा में जीत कर पहुंचें. उन्होंने दो बार साहेबगंज से क़िस्मत आजमाई. पिछले चुनाव में अपनी पत्नी उगनतारा देवी को औराई में कांग्रेस प्रत्याशी बनवाया, मगर हर बार असफलता ही हाथ लगी. डॉ. सिंह एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर भाग्य आजमाने के लिए आसान सीट की तलाश में हैं. पारू निर्वाचन क्षेत्र जैतपुर राजघराने की परंपरागत सीट रहा है. यहां से जैतपुर घराने के वीरेंद्र कुमार सिंह एवं उनकी पत्नी उषा सिन्हा भी चुनाव जीत चुकी हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री उषा सिन्हा चाहती हैं कि इस सीट से उनके पुत्र अनुनय सिंह जीतकर जाएं. पुन: चुनावी जंग में कूदने के लिए ताल ठोक रहे अनुनय सिंह इस सीट पर एक बार 29 हज़ार वोट ला चुके हैं. वैसे पारू सीट पर पूर्व राजद विधायक मिथिलेश यादव की भी नज़र है. वह फरवरी 2005 के चुनाव में भी यहां से जीते, लेकिन इसी साल दूसरे चुनाव में हार गए.

कई बार तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीत चुके रामकुमार सिंह पिछले चुनाव में मढ़ौरा से जदयू प्रत्याशी बने, लेकिन हार गए. मिलनसार एवं मृदुभाषी रामकुमार सिंह पूर्व मंत्री रघुनाथ पांडेय के दामाद हैं और मुज़फ़्फरपुर सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं. साधनसंपन्न जदयू विधान पार्षद दिनेश प्रसाद सिंह अपनी पत्नी एवं ज़िला परिषद की उपाध्यक्ष वीणा देवी को विधानसभा में भेजना चाहते हैं. उनकी नज़र गायघाट सीट पर है. फरवरी 2005 के चुनाव में वीणा देवी लालगंज से राजद प्रत्याशी थीं, लेकिन वह कांटे की टक्कर में मुन्ना शुक्ला से चुनाव हार गईं. इसी साल दूसरे चुनाव से ठीक पहले वीणा देवी जदयू में आ गईं. नीतीश कुमार उन्हें गायघाट से प्रत्याशी बनाना चाह रहे थे, मगर जॉर्ज फर्नांडीस के वीटो से टिकट अशोक कुमार सिंह को मिल गया. दिनेश प्रसाद सिंह ने अपने नेटवर्क की बदौलत अशोक सिंह का खेल बिगाड़ दिया. टिकट न मिलने पर पति-पत्नी राजद में लौट गए. लोकसभा चुनाव के बाद दिनेश सिंह एवं वीणा देवी ने एक बार फिर जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली है और गायघाट सीट पर दावा ठोक रहे हैं. गोपालगंज के जदयू सांसद पूर्णमासी राम अपने पुत्र विजय राम को विधानसभा में भेजना चाहते हैं. इस कोशिश में वह पार्टी से निलंबित हो चुके हैं. वर्ष 2007 के विधानसभा उपचुनाव में नीतीश कुमार ने पश्चिमी चंपारण की बगहा (सु.) सीट पर पूर्णमासी राम के बेटे को प्रत्याशी नहीं बनाया तो विजय राजद प्रत्याशी बन गए. हालांकि वह जदयू के शिवजी राय से हार गए. सीताराम सिंह भी लोकसभा चुनाव में रमा देवी से हार गए. सीताराम सिंह अब अपने बेटे के पुनर्वास के लिए सक्रिय हैं. इसी तरह पूर्व मंत्री गणेश प्रसाद यादव औराई से जदयू, रमई राम बोचहां से जदयू, हिंद केसरी यादव मीनापुर से राजद या कांग्रेस, शीतलराम सकरा से राजद, बसावन प्रसाद भगत कुढ़नी या मीनापुर से जदयू या राजद, नवल किशोर शाही रून्नी सैदपुर से राकांपा या जदयू, पूर्व विधायक राज किशोर सिंह वैशाली से राजद और पूर्व विधायक रामकुमार यादव फुलपरास से जदयू के टिकट पर चुनावी जंग लड़ने को तैयार नज़र आ रहे हैं. पिछले तीन चुनावों में लालगंज सीट पर जीत हासिल करने वाले जदयू विधायक विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला धर्मसंकट में हैं. पूर्व मंत्री ब्रज बिहारी प्रसाद की हत्या के मामले में न्यायालय ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई है और वह जेल में हैं. ऐसी स्थिति में उनका चुनाव लड़ना संभव नहीं दिख रहा है. मुन्ना शुक्ला के पोस्टरों और ग्रीटिंग्स में उनकी पत्नी अन्नू शुक्ला की तस्वीर छपने लगी है. अपनी सियासी हैसियत बरक़रार रखने के लिए मुन्ना अन्नू शुक्ला को लालगंज से जदयू प्रत्याशी बनवाना चाहेंगे. अगर नीतीश कुमार ने अन्नू शुक्ला को टिकट देने में आनाकानी की तो वह बागी बन सकती हैं. मुन्ना शुक्ला की तरह फुलपरास में विधायक देवनाथ यादव एवं उनके पुत्र को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने से पिता-पुत्र की उम्मीदवारी ख़तरे में है. देवनाथ फिलहाल राजनीतिक ताक़त बरक़रार रखने के लिए अपनी पत्नी को फुलपरास से प्रत्याशी बनाना चाहते हैं, लेकिन जदयू के कई मज़बूत दावेदार रोड़े खड़े कर सकते हैं. वैसे देवनाथ के परिवार से उम्मीदवारी तय मानी जा रही है और मुक़ाबला रोमांचक होगा. जदयू ने पिछली बार यहां पूर्व राज्यपाल धनिक लाल मंडल के पुत्र भरत मंडल को प्रत्याशी बनाया था. दूसरे स्थान पर रहे भरत मंडल को जदयू एक बार फिर अति पिछड़ा कोटे से आजमाना चाहेगा. मधेपुर क्षेत्र का लखनौर प्रखंड अब झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है. मधेपुर के राजद विधायक जगत नारायण सिंह अब झंझारपुर से चुनाव लड़ना चाहेंगे. पूर्व मंत्री रामावतार चौधरी का निधन हो चुका है. यहां पूर्व राज्यसभा सदस्य रामदेव भंडारी के पुत्र भी राजद के टिकट के बड़े दावेदार हैं. झंझारपुर से उम्मीदवारी तय करने के लिए लालू प्रसाद को ख़ासी माथापच्ची करनी पड़ेगी.

कद्दावर उम्मीदवार

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र एवं उनके पुत्र पूर्व मंत्री नीतीश मिश्र, पूर्व केंद्रीय मंत्री एल पी शाही की बहू वीणा शाही, पूर्व केंद्रीय मंत्री उषा सिन्हा के पुत्र अनुनय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद के पुत्र अजय निषाद, पूर्व मंत्री रघुनाथ पांडेय की बहू विनीता विजय, पूर्व मंत्री महंथ राम किशोर दास के पुत्र विजय किशोर, विधान पार्षद दिनेश प्रसाद सिंह की पत्नी वीणा देवी, पूर्व सांसद सीताराम सिंह के पुत्र रणधीर कुमार, जदयू सांसद पूर्णमासी राम के पुत्र विजय राम, विधायक मुन्ना शुक्ला की पत्नी अन्नू शुक्ला, पूर्व मंत्री प्रो. शंभु शरण ठाकुर की पुत्री नीती सिन्हा, कांग्रेस विधान पार्षद डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह और पूर्व विधान पार्षद रामकुमार सिंह.

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