विशेषज्ञों की परामर्श सेवा पर पौने दो अरब रूपए खर्च

मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग ने तकनीकी विशेषज्ञों की परामर्श सेवा लेने के लिए पौने दो अरब रूपए खर्च करके परामर्श सेवा कंपनियों को तो मालामाल कर दिया, लेकिन इस सेवा से राज्य को कितना लाभ मिला, इस बारे में विभाग कुछ भी बताने को तैयार नहीं है. आरोप है कि मध्य प्रदेश का जल संसाधन विभाग कुछ अफसरों की सनक पर चलता है. चूंकि राजनेता ज़्यादा समझदार और चुस्त नहीं हैं, इसलिए विभाग में अफसरों की ही मनमानी चलती है.

आर्थिक मंदी के दौर में देश की कई बड़ी-बड़ी कंपनियों का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ था, लेकिन कंसलटेंसी कंपनियों ने मध्य प्रदेश से जमकर कमाई की. मामला बड़ा विचित्र है. मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के पुराने जल स्रोतों की मरम्मत के लिए विश्व बैंक से 1900 करोड़ रूपए का क़र्ज़ लेकर जल स्रोत पुनरुद्धार परियोजना पर काम शुरू किया. सरकार ने विश्व बैंक की शर्त के अनुसार ही कंसलटेंसी कंपनियों की सेवाएं ली. जल संसाधन विभाग ने विश्व बैंक व अपने विशेषज्ञों की मदद से चार साल पहले इस काम की लागत क़रीब 76 करोड़ तय की थी, लेकिन जब निविदाएं आमंत्रित की गईं तो लागत अचानक संशोधित होकर 171 करोड़ रुपए हो गए.

तकनीकी ज्ञान और अनुभव की दृष्टि से मध्य प्रदेश में न तो प्रतिभाओं का अभाव है और न ही कुशल इंजीनियरों की कोई कमी है. राज्य में मौलाना आज़ाद तकनीकी महाविद्यालय जैसा राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षा संस्थान है, जिसमें विभिन्न तकनीकी विधाओं के श्रेष्ठ विद्वान कार्यरत हैं. इनके अलावा जबलपुर, ग्वालियर, रीवा, इन्दौर आदि नगरों में प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिनमें विद्वानों की कमी नहीं है. इनके अलावा राज्य में कई सेवानिवृत्त योग्य अनुभवी इंजीनियर भी हैं. इनमें से कई की सेवाएं तो विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं लेती हैं. लेकिन पांच साल तक जलसंसाधन विभाग के प्रमुख सचिव पद पर रहकर आईएएस अरविन्द जोशी ने विभाग पर अपना दबदबा इस क़दर कायम कर लिया था कि वे जो चाहते, वही करते थे. अरविंद जोशी ने ही कंसलटेंसी सर्विस देने वाली कंपनियों की सेवाएं लेना शुरू किया और उन्हें खुले हाथों फीस के नाम पर पैसा लुटाया. विभाग के मंत्रीजी ने भी इस पर कोई आपत्ति नहीं की. अब जब अरविंद जोशी के घर और ठिकानों पर आयकर विभाग का छापा पड़ चुका है और करोड़ों रुपए नकदी तथा जेवरात और पूंजी निवेश के दस्तावेज़ उजागर हो गए हैं, तब विभाग के अधिकारी खुलकर बताने लगे हैं कि जोशी जी ने प्रमुख सचिव रहकर क्या गुल खिलाएं.

आर्थिक मंदी के दौर में देश की कई बड़ी-बड़ी कंपनियों का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ था, लेकिन कंसलटेंसी कंपनियों ने मध्य प्रदेश से जमकर कमाई की. मामला बड़ा विचित्र है. मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के पुराने जल स्रोतों की मरम्मत के लिए विश्व बैंक से 1900 करोड़ रूपए का क़र्ज़ लेकर जल स्रोत पुनरुद्धार परियोजना पर काम शुरू किया. सरकार ने विश्व बैंक की शर्त के अनुसार ही कंसलटेंसी कंपनियों की सेवाएं ली. जल संसाधन विभाग ने विश्व बैंक व अपने विशेषज्ञों की मदद से चार साल पहले इस काम की लागत क़रीब 76 करोड़ तय की थी, लेकिन जब निविदाएं आमंत्रित की गईं तो लागत अचानक संशोधित होकर 171 करोड़ रुपए हो गए. परियोजना के ज़िम्मेदार अधिकारियों का तर्क है कि अब तक तो हम रेत-गिट्‌टी के दामों का आकलन करते रहे, लिहाज़ा इस बात का अहसास नहीं था कि तकनीकी कंसलटेंसी का सेवाशुल्क भी अनुमान से अधिक होगा. बहरहाल जो किया उसके लिए वित्त विभाग की अनुमति नहीं ली, अलबत्ता उच्चस्तरीय साधिकार समिति और विश्व बैंक की अनुमति के बाद बढ़े सेवाशुल्क का अनुबंध संबंधित कंपनियों से किया गया. ग़ौरतलब है कि यह प्रस्ताव विश्व बैंक मिशन की टास्क लीडर टीम व विभाग के विशेषज्ञ इंजीनियरों ने तैयार किए थे. ऐन वक़्त पर प्रस्ताव की लागत दो से ढाई गुना बढ़ने से इनकी योग्यता पर सवालिया निशान लग गए हैं.

प्रदेश के जलाशय किनारे पर्यटन की संभावना तलाशने पर्यटन विभाग को दरकिनार कर एक राष्ट्रीय कंपनी को 5 करोड़ पर सलाह के लिए अनुबंधित किया. इसी तरह कंप्यूटर की बेसिक जानकारी का ज्ञान देने के लिए एक अन्य कंपनी को पांच करोड़ रुपए का ठेका मिला.

यह परियोजना अगले साल समाप्त होने जा रही है और कई मामलों में काम या तो शुरू नहीं हुए या अधूरे हैं. अधिकांश मामलों में तकनीकी सलाह के लिए अनुबंध परियोजना शुरू होने के तीन साल के बाद हुआ. परियोजना प्रबंधन व निगरानी, रिजर्व क्षेत्रों में मछलियों के उत्पादन पर अनुसंधान, पूरक पोषण आहार पर अनुसंधान के लिए अनुबंध प्रस्तावित है.

सूत्रों का दावा है कि गड़बड़ी केवल विभाग मुख्यालय तक सीमित नहीं बल्कि इसके तार विदेश तक जुड़े हैं. बताया जाता है कि विश्व बैंक में भारत से संबंधित परियोजनाओं का कार्य भारतीय मूल के अधिकारियों द्वारा देखा जाता है.

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