अल्‍पसंख्‍यकों की हालत समझना जरूरी

संयुक्त राष्ट्र संघ में लगभग दो सौ सदस्य देश हैं, लेकिन इनमें शायद ही कोई मुल्क ऐसा हो, जिसकी पूरी आबादी एक ही मज़हब, भाषा, नस्ल या फिर संस्कृति की हो. यानी इन सभी मुल्कों में बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ अल्पसंख्यक आबादी भी है. ऐसे कुछ मामले हो सकते हैं कि एक राज्य में किसी एक समूह का बहुमत न हो, लेकिन एक अल्पसंख्यक समूह कई अन्य के साथ मिलकर पूरी आबादी का पचास फ़ीसदी से कम हो सकता है. आमतौर पर हर राज्य के लिए ज़रूरी है कि उसकी कम से कम 10 फ़ीसदी आबादी की पहचान उसके अपने मजहब, नस्ल, भाषा अथवा संस्कृति के आधार पर हो. और, उसकी यह पहचान बहुसंख्यक आबादी से भिन्न हो. एक राज्य को अल्पसंख्यकों की स्थिति समझने-सुधारने के लिए मानवीय और सभ्य तरीक़े अपनाने चाहिए. चीन, भारत, रूस, यूएसए, ब्राजील या नाइजीरिया में तो यह समस्या और भी जटिल है. यहां अल्पसंख्यक समूह तो लाखों में हैं, लेकिन वे पूरे मुल्क में बिखरे हुए हैं. यानी एक देश में उनकी कुल आबादी तो अधिक है, पर किसी क्षेत्र विशेष में उनकी संख्या कम है. इन समूहों को राजनीति, प्रशासन अथवा विकास योजनाओं में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. केंद्रीय व्यवस्था में समस्या और भी पेचीदा हो जाती है. ख़ासकर उस व़क्त, जब फैसला लेने की प्रक्रिया अक्सर कमज़ोर पड़ जाती है. और, लोग इन समस्याओं एवं अल्पसंख्यकों की शिक़ायत को सुलझाने के लिए असंवेदनशील हो जाते हैं. इसकी वजह यह है कि इनकी पहुंच नीति बनाने और उसे लागू करने की प्रक्रिया तक बेहद कम होती है. ऐसे में भारत जैसे संघ या कहें कि अर्द्धसंघीय व्यवस्था का काम बेहद आसान हो जाता है. एक संघीय व्यवस्था का यह लाभ हो सकता है कि बहुसंख्यक आबादी किसी क्षेत्र विशेष में अल्पसंख्यक हो सकती है. मसलन किसी मुल्क की बहुसंख्यक आबादी भी राज्य, ज़िला, उप-ज़िला, नगरपालिका या ग्राम स्तर पर अल्पसंख्यक हो सकती है. ठीक यही बात इसके विपरीत भी हो सकती है. उदाहरण के तौर पर मुसलमान, सिख और ईसाई भारत में तीन महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समूह हैं. उक्त सभी क्रमश: जम्मू-कश्मीर, पंजाब और उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में बहुमत में हैं. यदि गहन विश्लेषण किया जाए तो यह पता चलेगा कि कुछ छोटे जातीय समूहों को छोड़कर बाक़ी दूसरे सामाजिक समूहों की उप-जातियां हैं. इनमें कुछ तो कई ज़िलों, उप-ज़िलों, नगर निगमों या गांवों में बहुसंख्यक हैं.

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के समय जब पूर्वी यूरोप के कई मुल्क रूस या तुर्की साम्राज्य से आज़ाद हुए तो अल्पसंख्यकों के अधिकार की रक्षा एक मुद्दा बन गया. यह मुद्दा स़िर्फ युद्ध के बाद के समझौतों में ही नहीं, बल्कि नए बने राष्ट्र संघ के समझौतों में भी शामिल हुआ. द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र का गठन किया.

इस समस्या का दूसरा पहलू यह है कि जिन मुल्कों में कोई समूह विशेष बहुसंख्यक होता है, वह मुल्क उसी के मुताबिक़ अपना मजहब, भाषा या संस्कृति को जीवन के हर क्षेत्र में हर स्तर पर लागू करना चाहता है. ऐसे हालात में पूरे मुल्क में समरूपता या सजातीयता के प्रति रुझान भी बढ़ता है. उदाहरण के तौर पर अधिकांश स्लाव मुल्कों में सभी ग़ैर ईसाइयों में स्लाव नाम या उपनाम रखने की दिलचस्पी नज़र आती है. ऐतिहासिक तौर पर देखें तो अल्पसंख्यक समूह अक्सर अपनी असलियत को छिपाने की युक्ति अपनाते हैं. भारत में कोई भी आदमी अपने नाम से तुरंत पहचाना जाता है कि वह किस जाति या मजहब का है. एक ही इलाक़े में रहने वाले लोगों की भाषा और संस्कृति का़फी हद तक समान होती है. लेकिन, लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर सामाजिक समूह चाहे वह छोटा ही क्यों न हो, की इच्छा होती है कि वह अपनी पहचान को महफूज़ रखे. इसीलिए अल्पसंख्यक समूह सजातीयता को पूरे मुल्क में लागू नहीं करना चाहते हैं या कम से कम उसका विरोध करते हैं. हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं. कभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि अल्पसंख्यक समूह सजातीयता में ही अपने लिए सुरक्षित रास्ता तलाशने लगते हैं और वे बहुसंख्यक आबादी में घुल-मिल जाते हैं. यह उनके हित में होता है और व्यावहारिक भी. यानी बहुसंख्यक समूह में घुल-मिल जाना उनके  लिए लाभदायक भी हो सकता है. इससे जुड़ी सारी बातें कही और की जा चुकी हैं. अल्पसंख्यक होना और अपनी पहचान बरकरार रखना ज़िंदगी की सच्चाई है. अल्पसंख्यकों का मसला तथ्यात्मक है, न कि क़ानूनी. और, हमें यह तथ्य क़बूल करना चाहिए कि इनका योगदान भी एक मुल्क के विकास के लिए का़फी अधिक होता है.

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के समय जब पूर्वी यूरोप के कई मुल्क रूस या तुर्की साम्राज्य से आज़ाद हुए तो अल्पसंख्यकों के अधिकार की रक्षा एक मुद्दा बन गई. यह मुद्दा स़िर्फ युद्ध के बाद के समझौतों में ही नहीं, बल्कि नए बने राष्ट्र संघ के समझौतों में भी शामिल हुआ. द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र का गठन किया. इस संगठन में एक ख़ास बात पर ध्यान दिया गया. वह यह कि अल्पसंख्यक समूह अपने मुल्क के प्रति अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे. वह मुल्क भी इन समूहों के अधिकारों एवं कर्तव्यों की रक्षा करेगा. वास्तव में यह कट्टरपंथ को ख़त्म करने की दिशा में उठाया गया क़दम था. सैद्धांतिक तौर पर सभी देशों ने यह स्वीकार किया कि अल्पसंख्यक भी क़ानूनी तौर पर बाक़ी नागरिकों की तरह हैं. बुनियादी अधिकार, आज़ादी और राज्य द्वारा मुहैया कराए जा रहे सभी संसाधनों पर उनका समान अधिकार है. इस तरह समरूपता का माहौल बनाया गया. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर या मानवाधिकार की अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं के तहत कोई भी मुल्क किसी भी नागरिक के साथ मजहब, नस्ल, भाषा या संस्कृति के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद औपनिवेशिक काल के ख़त्म होने के बाद नए मुल्कों ने अपने संविधान में बुनियादी अधिकारों को भी जगह दी, लेकिन सभी मानवीय मामलों की तरह यहां भी कथनी और करनी में का़फी अंतर है. यही वजह है कि यूएन या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन भेदभावों, खासकर नस्ली, धार्मिक और भाषाई को अंतरराष्ट्रीय नियमों, परंपराओं, घोषणाओं और प्रस्तावों के ज़रिए धीरे-धीरे दूर करने की प्रक्रिया में प्रयासरत है.

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