आम आदमी पर दादा का डंडा

हालांकि बजट के बारे में जब आप पढ़ रहे होंगे, तब तक दादा के डंडे से आम आदमी की कमर पर अनेक वार हो चुके होंगे और दादा विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब भी दे चुके होंगे. लेकिन, तब तक यह बात सा़फ हो जाएगी कि दादा के जिस बजट से पूरा देश बहुत उम्मीद लगाए बैठा था, उसने कुल मिलाकर आम आदमी को एक बार फिर निराश कर दिया. असल में बीमारी कहीं है और इलाज कहीं और ढूंढा जा रहा है. सच्चाई यह है कि देश के ज़्यादातर राजनीतिक दलों के सामने यही तस्वीर सा़फ नहीं है कि देश का आम आदमी कौन है और ख़ास आदमी कौन.

दादा यानी प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के सबसे वरीय नेता हैं और यदि पार्टी में लोकतंत्र होता तो वह प्रधानमंत्री होते. उनके हुनर के सभी कांग्रेसी कायल हैं. इसके बावजूद बजट बनाते समय उनके सामने देश का आम आदमी क्यों नज़र नहीं आया, यह आश्चर्यजनक है. घूम-फिर कर प्रणब दा भी देश के उन्हीं कॉरपोरेट घरानों और अमीर लोगों को ख़ुश करने वाला बजट लेकर आ गए, जिसके पीछे हमारी तमाम सरकारें चलती रही हैं. पेश है एक विश्लेषण.

इसके लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में, जब आज के प्रधानमंत्री ही वित्तमंत्री थे. तबसे आम आदमी की परिभाषा बदलने का कांग्रेस ने तो जैसे व्रत ही ले लिया. कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ का नारा देकर चुनाव जीतने वाली कांग्रेस इस समय आम आदमी को पूरी तरह भुला चुकी है. दादा यानी आज के वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने पिछले महीने की 26 तारीख़ को आम आदमी के बजट के नाम पर जो डंडा चलाया है, उसे लोग बहुत आसानी से भूल नहीं पाएंगे. लोगों को सबसे ज़्यादा परेशानी तब होती है, जब वे पाते हैं कि 2004 से देश पर जो यूपीए राज कर रही है, उसमें वित्तीय संचालन के मास्टर माने जाने वाले मनमोहन सिंह मुखिया की भूमिका में हैं और उनके दाएं-बाएं खड़े हैं प्रणब मुखर्जी एवं मोंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे दिग्गज. इसके बावजूद आम आदमी की मौलिक ज़रूरतों के प्रति वह कोई उचित रास्ता नहीं बना पा रहे हैं. कम से कम इस बजट से तो यही लगता है.

मैंने अपने बजट में इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि विपक्ष के ज़्यादा शोर मचाने पर कुछ कटौती प्रस्तावों को स्वीकार कर लेंगे. इस हिसाब से मैंने 1991 में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बताई गई खुले बाज़ार और उदारीकरण की लाइन से ज़रा भी इधर-उधर न होने को ही प्रमाणित किया है. 1991 के बाद से जो दूसरी सरकारें भी बनीं, वे चाहे एनडीए की हो या कांग्रेस की, सबने कमोबेश एक जैसी ही लाइन रखी.

दादा ने अपने बजट में इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि विपक्ष के ज़्यादा शोर मचाने पर वह कुछ कटौती प्रस्तावों को स्वीकार कर लेंगे. इस हिसाब से दादा ने 1991 में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बताई गई खुले बाज़ार और उदारीकरण की लाइन से ज़रा भी इधर उधर न होने को ही प्रमाणित किया है. 1991 के बाद से जो दूसरी सरकारें भी बनीं, वे चाहे एनडीए की हो या कांग्रेस की, सबने कमोबेश एक जैसी ही लाइन रखी. पर इस बार आम आदमी को जाने क्यों यह उम्मीद दिखने लगी थी कि शायद दादा कुछ नया करें, क्योंकि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने ऐसा करने के लिए इशारा किया होगा. पर दादा ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिससे आम आदमी कहीं से भी अपने को बोझरहित महसूस कर सके. इस बजट पर चर्चा करने से पहले हमें एक बार आम आदमी के बारे में समझना चाहिए.

देश में अभी भी 71 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं, जिनमें से केवल 10 फीसदी बड़े किसान हैं. जो 29 फीसदी लोग शहरों में रहते हैं, उनमें से लगभग 14 फीसदी मज़दूरी और दूसरे ऐसे काम करते हैं, जिससे उनकी आय बमुश्किल 6000 रुपये प्रतिमाह बनती है. शहरों में रहने वाले बाकी 15 फीसदी लोगों में से दो फीसदी ऐसे हैं, जिनके पास अपार काला धन है. पर बाक़ी लोगों में से 11 फीसदी लोग सरकार को प्रत्यक्ष कर देते हैं और दो फीसदी लोग करों की भरपूर चोरी करते हैं. यानी कुल मिलाकर आम आदमी के दायरे में कम से कम 75 फीसदी लोग आते हैं, यह सरकारी आंकड़े में स्वीकार किया गया है. इसका अर्थ है कि इन 75 फीसदी लोगों में सबसे बड़ी संख्या छोटे और मंझोले किसानों की है और लगभग छह फीसदी नौकरी-पेशा करने वालों की.

ऐसे में दादा के बजट के बाद पहला सवाल उठता है कि उन्होंने इन 75 फीसदी लोगों के लिए क्या दिया है. कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि दादा का बजट खेती के क्षेत्र के लिए बेहद निराशाजनक है. दादा ने अपने बजट में इस क्षेत्र के लिए कोई ठोस कार्ययोजना नहीं दी है. कम ब्याज पर लोन देना कोई राहत की बात नहीं है, क्योंकि लोन देने के बाद अगर किसानों को उनके उत्पादन का लाभप्रद मूल्य नहीं मिला तो बाद में उन्हें लोन चुकाना मुश्किल हो जाता है और सरकार को अंतत: उसे माफ करने की मजबूरी बन जाती है. इससे बैंकिंग क्षेत्र को भी नुक़सान उठाना पड़ता है. पिछले साल सरकार ने किसानों के 60 हज़ार करोड़ रुपये के लोन माफ किए. उससे क्या किसानों की दशा में सुधार हो गया! दादा को खेती के लिए कम से कम चार फीसदी की विकास दर के लिए रास्ता बताना चाहिए था. दलहन और तिलहन के मद में 300 करोड़ रुपये और 60 हज़ार दलहन-तेल बीजग्राम की बात पूरी कैसे होगी, इसके बारे में सा़फ बताया नहीं गया है. अब यह बात छुपी नहीं है कि हरित क्रांति के नाम पर जो तकनीक अपनाई गई, उसके कारण पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के खेतों की उर्वरा शक्ति समाप्त हो गई है. इस पर दादा का ध्यान नहीं गया.

सरकार अपने आधारभूत ढांचे के ख़र्च में दी गई राशि में से 25 फीसदी हिस्सा गांवों को देने की बात कह रही है, पर ऐसे में सड़कों या दूसरी ज़रूरी चीज़ों के लिए जो कमी होगी, वह कैसे पूरी की जाएगी, इसके बारे में कोई बात नहीं कही गई है. यूपीए सरकार पहली बार 2004 में सत्ता पर क़ाबिज़ हुई थी. उसके तुरंत बाद से महंगाई ने अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया था. पर यूपीए-1 ने आम आदमी को बार-बार यह कहकर भरमाने की कोशिश की कि एनडीए ने जो कुछ उसे दिया है, उसे रास्ते पर लाने में थोड़ा समय लगेगा. लोगों ने धैर्य से यूपीए को देखना जारी रखा, पर महंगाई बेलगाम होती गई. लोग पिस रहे थे, तो भी सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के इस आश्वासन पर भरोसा करके कि दूसरी बार सत्ता में आने के 100 दिनों के अंदर यूपीए सरकार महंगाई पर न केवल नियंत्रण करेगी, बल्कि उसे कम करेगी, जनता ने उसे वोट दिया. पर सरकार का झूठ सबके सामने है. महंगाई ने कैसे आम आदमी और पूरे मध्य वर्ग को पानी-पानी करके छोड़ दिया है, कहने की ज़रूरत नहीं है. पर दादा के बजट से लोग तब भी आस लगाए बैठे थे.

दादा ने बजट में महंगाई को लेकर ऐसी चुप्पी साधी कि पूरे विपक्ष को, भाजपा, लालू यादव एवं मुलायम सिंह और यहां तक कि वामपंथियों को भी एकजुट होकर लोकसभा में कार्य स्थगन प्रस्ताव लाना पड़ा. और, बेशर्मी तो यह कि शरद पवार यह कहने लगे कि महंगाई कम हो रही है. बाद में दादा ने बात संभालते हुए कहा कि महंगाई कुछ महीनों में कम होगी. मज़ेदार बात यह कि उसी दिन से दिल्ली में पेट्रोल एवं डीजल के दाम प्रति लीटर 2.50 रुपये से ज़्यादा बढ़ गए और उसके कारण दाल एवं सब्जी तुरंत और महंगी हो गई. दादा ने कहा कि मध्य वर्ग को वह राहत दे रहे हैं, इसलिए आयकर की सीमा एक लाख रुपये से बढ़ाकर 1.60 लाख रुपये की जा रही है. पर यह जानना ज़रूरी है कि आयकर की छूट का लाभ उठाने वाले कितने लोग हैं-केवल 11 फीसदी. इनमें वे भी हैं, जिनकी सालाना आय सालाना पांच लाख रुपये से आठ लाख रुपये के बीच है.

दादा से यह भी उम्मीद की जा रही थी कि वह अप्रत्यक्ष करों में राहत देंगे, पर वह यहां भी वह कन्नी काट गए. सीमा शुल्क में बढ़ोत्तरी करके उसका तुरंत असर बाज़ार को दिखा दिया गया. असल में दादा के बजट ने काग़ज़ी जाल फेंकने के सिवा और कुछ भी नहीं किया है. इसकी ओर इशारा 25 फरवरी को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में पहले ही कर दिया गया था. सरकार कहती है कि ग्रोथ रेट 7.2 फीसदी है, जो पिछले साल की 6.7 फीसदी की तुलना में का़फी उत्साहजनक है. इसके अलावा जीडीपी की दर भी बढ़कर 8.5 फीसदी हो गई है. कारखानों की उत्पादन क्षमता भी 3.2 फीसदी से बढ़कर 8.9 फीसदी तक पहुंच गई है. यहां तक कि प्रति व्यक्ति आय भी 3.7 फीसदी से बढ़कर 5.3 फीसदी हो गई है.

सरकार के ये काग़ज़ी आंकड़े सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन व्यवहार में वे कहां हैं? जब एक आम आदमी बाज़ार में दाल और चीनी ख़रीदने जाता है तो उसे 42 रुपये प्रति किलो की जगह 90 रुपये दाल के लिए और 22 रुपये प्रति किलो की जगह 42 रुपये देने पड़ते हैं. ऐसे में उसे सरकार के झूठ से गुस्सा आता है. अभी हाल ही में उड़ीसा से ख़बर आई कि वहां 50 से ज़्यादा मौतें भूख से हुई हैं. क्या आपको पता है कि विश्व के स्तर पर एक भूख सूचकांक बना है. इसे देखकर दादा को दुखी होना चाहिए, क्योंकि इसमें भारत को इथियोपिया से भी नीचे रखा गया है. यानी भारत में सबसे ज़्यादा लोग भूख से मर रहे हैं. और, मानव विकास सूचकांक में तो भारत का स्थान 134वां हो गया है. 1996 से लेकर 2007 तक देश में दो लाख से भी ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या की, जो आज भी बदस्तूर जारी है. अगर 63 बरसों की आज़ादी के बाद हम इस हालत में हैं तो क्या देश पर सबसे ज़्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी के लिए यह कम शर्म की बात है!

दादा ने बेरोज़गारों को भी एक बार फिर ठगा है. उनका दावा है कि इस बजट के बाद क़रीब दो लाख युवकों को रोज़गार मिलेगा. लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मंदी के दौर में कम से कम 55 लाख लोगों का रोज़गार गया था. इस बार जो नौकरियां आ रही हैं, वे सेवा क्षेत्र में हैं. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अभी तक रोज़गार का रास्ता नहीं खुल रहा है. बजट में इसके लिए कोई रास्ता नहीं दिखाया गया है. अपने यहां अप्रत्यक्ष करों की संख्या पहले से ही कितनी ज़्यादा है. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि देश में एक करीय व्यवस्था लागू हो जाए? इसके अलावा सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए ज़्यादा राशि रखनी चाहिए थी. दादा ने पहले से केवल 4000 करोड़ रुपये बढ़ाए. अब आप स्वास्थ्य परीक्षण कराने जाएंगे तो भी आपको सेवा कर देना होगा. इसके अलावा मकान को किराए पर देने पर भी आपको कर देना होगा. ज़ाहिर है, इसका असर आम आदमी पर ही पड़ने वाला है.

जहां तक निवेश की बात है, यह पिछले साल के 37 फीसदी से घटकर केवल 34 फीसदी रह गया है. इसके अलावा कृषि क्षेत्र में अनाज और मोटे अनाज के उत्पादन में 20 फीसदी की गिरावट आई है. छोटे और असंगठित क्षेत्र में भी गिरावट आई है. ऐसे में 60,000 गांवों के लिए केवल 300 करोड़ रुपये का प्रावधान सरकार की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है. दादा के बजट में एक ही अच्छी बात है. उन्होंने शिक्षा के लिए राशि बढ़ाई है और ग्रामीण विकास के नाम पर 66,000 करोड़ रुपये रखे हैं. पर इन्हें लागू करने वाली भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था पर दादा लगाम कैसे कसेंगे, इसके बारे में बजट में कोई सुझाव नहीं है. राहुल गांधी भी कहने लगे हैं कि केंद्र से चला रुपया गांव तक आते-आते 15 से 20 पैसे भर रह जाता है. उनके पिता राजीव गांधी भी ऐसा ही कहते थे. पर बिचौलियों के पेट में जाने वाली इस 80-85 फीसदी राशि को कैसे आम आदमी तक पहुंचाने का रास्ता बनाया जाएगा, इसे कौन बताएगा और कब बताएगा!

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