भारत-बांग्‍लादेश संबंध और पूर्वोत्‍तर का मुद्दा

काफी उम्मीदों और ढेर सारी संभावनाओं के बावजूद भारत और बांग्लादेश के संबंधों में अपेक्षित सुधार नहीं आ सका है. भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से दोनों देश एक-दूसरे के का़फी नज़दीक रहे हैं. इसके बावजूद अविश्वास और संदेह की खाई दोनों देशों के बीच हमेशा मौजूद रही. शेख हसीना वाजिद पहले भी सत्ता में थीं. तब भी उन्हें और उनकी पार्टी को लगातार पाकिस्तान समर्थित धार्मिक कट्टरपंथी ताक़तों से जूझना पड़ा था. उन ताक़तों से, जो  भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों को बिगाड़ने की कोशिश करती रही हैं.

हाल में भारत दौरे पर आईं शेख हसीना वाजिद ने वादा किया कि वह अपने देश में धार्मिक कट्टरता एवं आतंकवाद को ख़त्म करेंगी और शांति एवं न्याय पर आधारित लोकतांत्रिक परिवर्तन के नए युग की शुरुआत करेंगी. हसीना का यह बयान सकारात्मक है और हाल के कुछ महीनों में उन्होंने बांग्लादेश के बदले हुए रुझान के संकेत भी दे दिए हैं. शेख हसीना बांग्लादेश की घरेलू और विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन कर रही हैं. उन्होंने वादा किया कि वह भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्तों को नई बुलंदियों तक पहुंचाने में विश्वास रखती हैं. दोनों देशों के बीच पांच महत्वपूर्ण समझौते हुए. इसे द्विपक्षीय संबंधों के नए युग की शुरुआत माना जा रहा है. शेख हसीना के रवैये से संकेत मिल रहा है कि अब बांग्लादेश सरकार शांति और विकास को प्राथमिकता दे रही है. वर्तमान शासन के तहत उग्रवाद के पनपने के लिए उपयुक्त वातावरण नहीं रह गया है.

हाल में भारत दौरे पर आईं शेख हसीना वाजिद ने वादा किया कि वह अपने देश में धार्मिक कट्टरता एवं आतंकवाद को ख़त्म करेंगी और शांति एवं न्याय पर आधारित लोकतांत्रिक परिवर्तन के नए युग की शुरुआत करेंगी. हसीना का यह बयान सकारात्मक है और हाल के कुछ महीनों में उन्होंने बांग्लादेश के बदले हुए रुझान के संकेत भी दे दिए हैं. शेख हसीना बांग्लादेश की घरेलू और विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन कर रही हैं.

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह स्थिति ख़ास मायने रखती है. शेख हसीना ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी बातचीत की. चूंकि बांग्लादेश की नीति का सबसे गहरा प्रभाव इन्हीं राज्यों पर पड़ता है. पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ज़मीनी सच्चाइयों की अधिक जानकारी है और उन्होंने खुलकर अपना पक्ष रखने का प्रयास भी किया. मुख्यमंत्रियों ने बांग्लादेश के प्रमुख शहरों के साथ वायु, रेल एवं बस संपर्क बहाल करने पर जोर दिया. पूर्वोत्तर राज्य बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान और चीन से घिरे हैं. इन देशों के साथ भारत का एकमात्र संपर्क असम से होकर ही संभव हो सकता है. यह क्षेत्र दुर्गम है, जहां पहाड़ियां और जंगल हैं. बांग्लादेश के वाणिज्य मंत्री फारुख खान ने हाल में कहा है कि अगर भारत एवं अन्य पड़ोसी देश चटगांव बंदरगाह का उपयोग करना चाहते हैं तो इसके लिए उनकी सरकार सहर्ष अनुमति देने के लिए तैयार है. दक्षिणी त्रिपुरा से चटगांव बंदरगाह की दूरी स़िर्फ 75 किलोमीटर है. भारत एवं अन्य दक्षिण एशियाई देश परिवहन ख़र्च और समय बचाने के लिए इस बंदरगाह का इस्तेमाल करना चाहते हैं. भारत-बांग्लादेश के बीच जल परिवहन संबंधी संधि की अवधि 31 मार्च 2011 तक बढ़ा दी गई है. इस संधि के अनुसार, चार जल परिवहन मार्गों पर दोनों देश अपने मालवाहक जहाजों का परिचालन कर सकते हैं. उक्त चार मार्ग हैं कोलकाता-पांडु, कोलकाता-करीमगंज, राजशाही-धुलियान और करीमगंज-पांडु. बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख शहरों के बीच औसत दूरी 30 किमी से 200 किमी है. शेख हसीना के साथ बातचीत के दौरान असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों के ख़िला़फ बांग्लादेश सरकार के सख्त रवैये की सराहना की और कहा कि इस तरह बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत में शांति बहाली करने में मदद मिलेगी.

बांग्लादेश में हुए आम चुनावों में अवामी लीग के नेतृत्व वाले गठबंधन ने बीएनपी के नेतृत्व वाले चार दलों के गठबंधन को जिस तरह भारी मतों से पराजित किया, उससे बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक परिवर्तन हुआ. यह परिवर्तन भारत के पक्ष में माना जा रहा है. आम चुनाव में स्पष्ट हो गया कि बांग्लादेश की जनता ने स्थिर, विकसित और जवाबदेह बांग्लादेश के पक्ष में अपने मताधिकार का प्रयोग किया. जनता ने जमात को ख़ारिज़ कर दिया और उसके तमाम उम्मीदवार बुरी तरह पराजित हुए. जनता ने धार्मिक राजनीति और कट्टरपंथ को ठुकराते हुए लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया.

शेख हसीना की जीत भारत के नज़रिए से सकारात्मक घटना मानी गई. इसके बावजूद बांग्लादेश सरकार की चुनौतियां ख़त्म नहीं हो गई हैं और दोनों देशों के बीच रिश्ते को पटरी पर लाना इतना आसान नहीं होगा. जहां तक बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति का सवाल है, भारत के साथ संबंध बनाना हमेशा एक संवेदनशील मसला रहा है. शेख हसीना के भारत दौरे के ठीक पहले विपक्षी दल बीएनपी की नेता खालिदा जिया ने उन्हें चेतावनी दी कि वह बांग्लादेश के हितों के साथ किसी तरह का समझौता न करें, वरना बीएनपी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हो जाएगी. खालिदा जिया ने पार्टी कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे शेख हसीना की सरकार के ख़िला़फ जनांदोलन छेड़ने के लिए तैयार हो जाएं, क्योंकि सरकार देश के हितों के साथ समझौता कर रही है. जिया और बांग्लादेश के प्रचार माध्यम जनता को बता रहे हैं कि भारत दौरे से हसीना ने कुछ भी हासिल नहीं किया. शेख हसीना के लिए कई चुनौतियां हैं. उन्हें जनता को विश्वास में लेकर द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने की दिशा में ठोस क़दम बढ़ाना होगा.

सक्रिय आतंकी और उग्रवादी संगठन

बांग्लादेश में कई ऐसे आतंकी एवं उग्रवादी संगठन हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत के ख़िला़फ कार्रवाइयों को अंजाम देते हैं. आतंकी वारदातों में कई बार उनकी सीधी भागीदारी होती है. कई बार वे सहयोगी की भूमिका में रहते हैं. इन संगठनों के संबंध भारत एवं बांग्लादेश में सक्रिय कई अन्य आतंकी संगठनों से भी हैं, जिनमें अलक़ायदा, तालिबान, जैश-ए-मोहम्मद, लश्करे तैयबा एवं उल्फा आदि प्रमुख हैं.

हूजी : इस संगठन की स्थापना 1992 में हुई थी. बांग्लादेश के अलावा पाकिस्तान और भारत में सक्रिय हूजी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से कई आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम दे चुका है. 2002 में कोलकाता के अमेरिकन सेंटर पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी इसने ली थी. इसके अलावा लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) से भी इसके नज़दीकी रिश्ते हैं. सूत्रों के मुताबिक़, हूजी उल्फा के लिए ट्रेनिंग कैंप का संचालन भी करता है. हाल के दिनों में इस संगठन ने इस साल भारत में होने वाले हॉकी वर्ल्ड कप, राष्ट्रमंडल खेलों और आईपीएल में खिलाड़ियों को निशाना बनाने की धमकी दी है.

जमातुल मुजाहिदीन बांग्लादेश: इसकी स्थापना 1998 में हुई थी. ग़ैर सरकारी संगठनों पर लगातार हमलों के बाद सरकार ने फरवरी 2005 में इसे प्रतिबंधित कर दिया था, लेकिन इसी साल अगस्त में देश के विभिन्न इलाक़ों में 500 बम विस्फोट करके इसने अपनी ताक़त का एहसास करा दिया.

द जाग्रत मुस्लिम जनता बांग्लादेश (जेएमजेबी): इस संगठन की स्थापना भी 1998 में हुई थी. इसके संबंध जमातुल मुजाहिदीन बांग्लादेश से रहे हैं. जेएमजेबी को उल्फा का सहयोगी संगठन भी माना जाता है. हालांकि अब तक इसका कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिल पाया है. बांग्लादेश सरकार द्वारा इसे 2004 में प्रतिबंधित कर दिया गया था. हालांकि, प्रमुख राजनीतिक दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कई महत्वपूर्ण नेताओं के साथ इसके नज़दीकी रिश्ते हैं.

पूर्व बांग्ला कम्युनिस्ट पार्टी (पीबीसीपी): पूर्व बांग्ला कम्युनिस्ट पार्टी बांग्लादेश में सक्रिय माओवादी संगठनों में से एक है. इसका गठन 1968 में बांग्लादेश कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद हुआ था. जिया-उर-रहमान के सैन्य शासन के दिनों में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था. लेकिन हाल के दिनों में, ख़ासकर 2002 के बाद इसकी गतिविधियों में एक बार फिर तेज़ी दिखाई दी है.

इस्लामी छात्र शिविर (आईसीएस): इस्लामी छात्र शिविर को जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश का छात्र संगठन माना जाता है. इसका गठन 1941 में हुआ था. यह देश में इस्लामिक शिक्षा पद्धति के प्रचार-प्रसार के लिए संघर्षरत है.

2 thoughts on “भारत-बांग्‍लादेश संबंध और पूर्वोत्‍तर का मुद्दा

  • March 12, 2010 at 1:53 AM
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    क्या बकवास सा लेख है, न कोई सुर, न ताल…

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  • March 7, 2010 at 11:13 PM
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    ये इन्फ़ोर्मटिक नहीं थी

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