भ्रष्टाचार के महासागर की छोटी मछलियों का शिकार

मध्य प्रदेश सरकार ने भ्रष्टाचार से हो रही बदनामी से त्रस्त होकर प्रशासन को सा़फ-सुथरी छवि देने का अभियान चला रखा है. पिछले दिनों राज्य भर में साठ से अधिक छोटे कर्मचारी दंडित किए जा चुके हैं. अब तक पुलिस आरक्षक, पटवारी, कार्यालयों के बाबू एवं वनरक्षक जैसे छोटे कर्मचारी रिश्वत लेते या जबरन उगाही करते पकड़े गए और उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया गया. इनकी संख्या लगभग साठ है, लेकिन राज्य में भ्रष्टाचार के महासागर की बड़ी मछलियां और मगरमच्छ अभी भी निर्भय होकर अपने काम को अंजाम दे रहे हैं.

जिन अफसरों के खिला़फ लोकायुक्त में भ्रष्टाचार की शिकायतें आती हैं या जांच जारी है, न्यायहित में उन्हें तुरंत उनके पद से हटा दिया जाना चाहिए, लेकिन कई मामलों में ऐसा नहीं हुआ है. जिन अफसरों की जांच चल रही है, वे उसी विभाग में उसी पद पर जमे हुए हैं. इससे सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है और गवाही के लिए अधीनस्थ कर्मचारियों पर दबाव और प्रभाव पड़ता है.

राज्य के लोकायुक्त पी पी नावलेकर ने हाल में कहा कि मुख्यमंत्री सहित आठ मंत्रियों और कई आला अफसरों के खिला़फ शिकायतें प्राप्त हुई हैं, जिनमें विभिन्न स्तरों पर जांच कार्य चल रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि आय से अधिक संपत्ति के दो दर्ज़न मामलों में रिपोर्ट देने के बाद भी जब सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की तो लोकायुक्त को कार्यवाही के लिए सरकार को एक मार्च तक की मोहलत देनी पड़ी. लोकायुक्त ने जनता से भ्रष्टाचार के खिला़फ जागरूक होने और बेहिचक शिकायत करने की अपील करते हुए कहा कि शिकायतें तथ्यपरक दस्तावेज़ों और हल़फनामे के साथ दी जानी चाहिए. उन्होंने बताया कि भ्रष्टाचार के मामले में अदालत में अभियोगपत्र पेश करने के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेना ज़रूरी नहीं है. लेकिन जहां ज़रूरी है, उन मामलों में अनुमति ली जाती है. नावलेकर ने अपने सात माह के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि अब तक राज्य में छापे की 22 कार्यवाहियां हुई हैं. 33 मामलों में जाल बिछाकर पकड़ा गया और पद के दुरुपयोग से जुड़ी 21 शिकायतें दर्ज़ की गईं. उन्होंने कहा कि जिन अफसरों के खिला़फ लोकायुक्त में भ्रष्टाचार की शिकायतें आती हैं या जांच जारी है, न्यायहित में उन्हें तुरंत उनके पद से हटा दिया जाना चाहिए, लेकिन कई मामलों में ऐसा नहीं हुआ है. जिन अफसरों की जांच चल रही है, वे उसी विभाग में उसी पद पर जमे हुए हैं. इससे सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है और गवाही के लिए अधीनस्थ कर्मचारियों पर दबाव और प्रभाव पड़ता है.

गृह निर्माण मंडल भ्रष्टाचारियों का अभयारण्य

आज जब पूरे राज्य में सरकारी भ्रष्टाचार, घपलों, घोटालों की चर्चा हो रही है, तब मध्य प्रदेश गृह निर्माण मंडल पर किसी की नज़र नहीं हैं. जबकि यह संस्था सर्वाधिक बदनाम रही है. गृह निर्माण मंडल तो एक तरह से भ्रष्टाचारियों का अभयारण्य बना हुआ है. यहां के अतिरिक्त आयुक्त स्तर के एक अति वरिष्ठ अधिकारी के घर और ठिकानों पर आयकर विभाग का छापा पड़ा. उन्हें सरकार ने निलंबित किया, लेकिन उन पर आगे कोई कार्यवाही नहीं की गई. आरोप है कि वह अपनी पत्नी के नाम से राजधानी में आवासीय कॉलोनी और बहुमंजिला भवन बनाने की बड़ी कंपनी खोलकर करोड़ों-अरबों रुपये का हर साल कारोबार कर रहे हैं. इसी तरह मंडल के कई और इंजीनियर हैं, जो विभिन्न घपलों-घोटालों में फंसे तो हैं, लेकिन उनके खिला़फ कोई कार्यवाही नहीं की गई. एक वर्ष पूर्व अयोध्या नगर में कार्यपालन मंत्री सुशील ठाकुर और लेखाधिकारी मालवीय को 56 लाख रुपये के गबन के मामले में निलंबित तो किया गया, लेकिन आज तक पुलिस में रिपोर्ट नहीं कराई गई. इसी तरह कुछ इंजीनियरों के विरुद्ध तीन करोड़ रुपये की गड़बड़ी के एक मामले में कोई आरोपपत्र तैयार नहीं किया गया. गृह निर्माण मंडल की भोपाल में दो दर्ज़न से ज़्यादा आवासीय कॉलोनियां और कई बहुमंजिला भवन हैं, जिनके निर्माण में अनेक प्रमाणित शिकायतें हैं. उनकी जांच भी हुई है और निर्माण में गुणवत्ता का ध्यान न रखने, घटिया सामग्री का इस्तेमाल करने जैसी शिकायतें जांच में सही भी पाई गई हैं, लेकिन आज तक किसी के खिला़फ कोई कार्यवाही नहीं हुई.

सरकार में भ्रष्ट कमाई का रिवाज़

मध्य प्रदेश सरकार में भ्रष्ट कमाई का रिवाज़ बदसतूर जारी है. इस कारण किसी भी सरकारी कर्मचारी को अपने या दूसरे विभाग में काम कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है. ट्रेजरी विभाग में कर्मचारियों को टीए बिल, मेडिकल बिल, सरकारी ऋृण, भविष्य निधि से अग्रिम एवं स्थानांतरण व्यय आदि के भुगतान के लिए अपने कार्यालय के लेखा विभाग और ट्रेजरी के बाबू को चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है. सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों और महाविद्यालयों के शिक्षकों को किसी सरकारी स्कूल और कॉलेज के माध्यम से ही वेतन कोषागार से मिलता है और सीधे उनके बैंक खातों में जमा होता है. लेकिन, यहां भी रिश्वत के चलन के कारण इन शिक्षकों को अपना वेतन बिल पास कराने और उसका भुगतान पाने के लिए स्कूल या कॉलेज और कोषागार में रिश्वत देनी पड़ती है, वरना नाराज़ बाबू वेतन जारी नहीं होने देता. राजधानी भोपाल में कई अनुदान प्राप्त महाविद्यालयों में दो से तीन माह विलंब से वेतन का भुगतान होता है और यह विलंब रिश्वत़खोरी के कारण ही हो रहा है, लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं है.

मिठाई के लालच में सरकारी खज़ाना लुटवा दिया

सरकारी कर्मचारियों में मुफ़्त़खोरी की आदत कितनी बड़ी मुसीबत ला सकती है, इसका उदाहरण हाल में विदिशा ज़िला मुख्यालय में सरकारी खज़ाने की लूट की घटना है. हुआ यह कि विदिशा ज़िला कलेक्टर कार्यालय परिसर में स्थित सरकारी खज़ाने पर रात में पहरा दे रहे तीन सिपाहियों को अज्ञात लुटेरों ने मिठाइयां खिलाईं. मिठाई खाते ही सिपाही बेहोश हो गए. इसके बाद लुटेरों ने आराम से पहले खज़ाने का ताला तोड़ा. फिर वहां रखे 13 बक्सों के ताले तोड़े और लगभग 8 लाख रुपये लेकर चंपत हो गए. प्रात: चार बजे जब बद्री सिंह नामक संतरी खज़ाने की ड्यूटी पर आया तो उसने हुकुम सिंह, कुबेर सिंह और रामनरेश नामक तीनों सिपाहियों को बेहोश पाया. उसने घटना की सूचना तत्काल पुलिस को दी. जब पुलिस वहां पहुंची तो लुटे हुए खज़ाने को देख हैरान हो गई. पास पड़े मिठाई के खाली डिब्बे की प्रारंभिक जांच से पुलिस को पता लगा कि मिठाई में बेहोशी की दवा मिलाई गई थी. बेहोश सिपाहियों को इलाज के लिए तत्काल भोपाल भेजा गया, जहां 12 घंटे बाद भी उन्हें होश नहीं आया.

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