चौथा शाही स्नान जनता के अधिकारों पर डाका है

हरिद्वार में चल रहे महाकुंभ को लेकर एक ताज़ा समझौता साधु-संतों के तेरह अखाड़ों की परिषद् तथा कुंभ प्रशासन के बीच हुआ है. इस समझौते के मुताबिक़ सभी तेरहों अखाड़े 15 मार्च के सोमवती अमावस्या और 14 अप्रैल के मुख्य कुंभ स्नान के बीच में 30 मार्च को एक और स्नान करेंगे और प्रशासन इस स्नान को भी शाही स्नान का दर्ज़ा देगा.

सामान्यतया हरिद्वार आकर कोई भी साधु-संन्यासी अथवा कोई भी गृहस्थी कितनी ही बार अकेले या समूह में आकर गंगास्नान कर सकता है. उस पर कोई पाबंदी नहीं है. गंगास्नान, व्यक्ति का नितांत निजी मामला है. उसे पूरा अधिकार है कि वह चाहे जितनी बार गंगा नहाए. जिस सार्वजनिक घाट पर नहाना चाहे वहां नहाए. अगर उसके गंगा नहाने से किसी और के अधिकारों का हनन नहीं होता है, तो वह गंगा नहाता रहे. पर अगर उसके नहाने से किसी और के अधिकारों का हनन होता है तो फिर यह बात चिंता के घेरे में आ जाती है. अखाड़ों और प्रशासन के इस ताज़े फैसले से कुछ ऐसा ही हुआ है जिस पर चिंता, चिंतन और पुनर्विचार की आवश्यकता है. दोनों पक्षों ने मिलकर यह एक ऐसा फैसला ले लिया है जो परंपरा-सम्मत तो है ही नहीं, परंपराभंजन और जनाधिकार विरोधी भी है.

हरिद्वार के संदर्भ में देखें तो शाही स्नान की यह परंपरा केवल तीन शाही स्नानों की है. ये तीन शाही स्नान महाशिवरात्रि, चैत्र अमावस्या और मुख्य कुंभपर्व पर संपन्न होते हैं. महाशिवरात्रि का पहला शाही स्नान केवल संन्यासी अखाड़ों का ही होता है. तब बैरागी वैष्णव अखाड़े वृंदावन में एकत्र होते हैं. चैत्र अमावस्या से पहले अलबत्ता बैरागी हरिद्वार पहुंच चुके होते हैं, अतएव बाद के दोनों स्नानों पर तेरहों अखाड़े अपने अपने क्रम से गंगास्नान करते हैं.

कुंभ कहीं भी आयोजित हो वह परंपराओं के दायरे में रहकर आयोजित किया जाता है. हमारा पूजनीय साधु समाज भी परंपरागत रीति-रिवाज़ों की दुहाई देते हुए ही कुंभ के सारे कार्य संपन्न करता और करवाता है. कुंभ के संदर्भ में शासन और प्रशासन भी हिंदुओं के इस महापर्व की पारंपरिकता के रक्षण के लिए हमेशा से वचनबद्ध रहता आया है. मुसलमानों, मुगलों और अंग्रेजों तक ने हमारी इस परंपरा का निर्वाह किया है. इसमें कोई आपत्तिजनक बात है भी नहीं और आज भी सामान्यजन इस परंपरा निर्वाह के साथ बड़ी श्रद्धा से जुड़ते चले आते हैं.

हरिद्वार के संदर्भ में देखें तो शाही स्नान की यह परंपरा केवल तीन शाही स्नानों की है. ये तीन शाही स्नान महाशिवरात्रि, चैत्र अमावस्या और मुख्य कुंभपर्व पर संपन्न होते हैं. महाशिवरात्रि का पहला शाही स्नान केवल संन्यासी अखाड़ों का ही होता है. तब बैरागी वैष्णव अखाड़े वृंदावन में एकत्र होते हैं. चैत्र अमावस्या से पहले अलबत्ता बैरागी हरिद्वार पहुंच चुके होते हैं, अतएव बाद के दोनों स्नानों पर तेरहों अखाड़े अपने अपने क्रम से गंगास्नान करते हैं. सैकड़ों बरसों से यहां इन्हीं तीन शाही स्नानों की परंपरा चलती आ रही है. इसके अलावा कुंभ स्नान के बाद वैशाखी पूर्णिमा के दिन बैरागियों की जमात के द्वारा अलग से गंगास्नान करने की परंपरा भी रही है, पर यह स्नान शाही स्नान की कोटि में नहीं माना जाता है.

शाही स्नान के दिन हरिद्वार के मुख्य और अमृत-पावन माने जाने वाले स्नान स्थल हरकी पौड़ी पर साधु-संतों के तेरहों अखाड़े बाजेगाजे, हाथी-घोड़े, रथ-पालकियों सहित शोभायात्रा के साथ आकर अपने अपने अखाड़े के देवताओं, भालों, आचार्यों, महामण्डलेश्वरों और नागा तथा वस्त्रधारी साधुओं के साथ गंगास्नान करते हैं. ऐसे शाही स्नान दिवस पर लगभग आठ-दस घंटों के लिए हरकी पौड़ी ब्रह्मकुण्ड पर सामान्य श्रद्धालु तीर्थयात्री को न जाने दिया जाता है और न नहाने दिया जाता है. जो व्यक्ति हज़ारों मील चलकर और हज़ारों रुपए ख़र्च करके, यात्रा के सारे कष्ट और असुविधाएं झेलता हुआ हरिद्वार आता है वह सदियों से चली आ रही इस परंपरा के चलते हरकी पौड़ी पर स्नान करने से वंचित रह जाता है. पर उसे परंपरा और श्रद्धा के चलते कोई शिक़ायत नहीं होती.

लेकिन इस बरस हरिद्वार कुंभ में कुछ नया ही हो रहा है. कुंभ के शाही स्नानों में एक और शाही स्नान की बढ़ोत्री करके सामान्य श्रद्धालुओं का हरकी पौड़ी ब्रह्मकुण्ड पर नहाने का अधिकार उनसे छीना जा रहा है. अनेक ज्येष्ठ-श्रेष्ठ संत और बड़ी संख्या में साधु समाज भी इस निर्णय से व्यथित हैं. कई अखाड़ों अनेक महामण्डलेश्वर भी इस अपरंपारिक स्नान में शामिल नहीं होंगे क्योंकि वे इसे सरासर परंपराभंजन ही मानते हैं. लोगों का मानना है कि अखाड़ा परिषद् और कुंभ प्रशासन का यह निर्णय जनता को ध्यान में रखकर नहीं लिया गया है. यदि यह निर्णय लेने से पहले आम जनता की हरकी पौड़ी स्नान की इच्छा-आकांक्षा और भावनाओं का ख़याल रखा होता तो यह परंपरा विरोधी निर्णय न लिया जाता.

कुछ लोग इस निर्णय को नवयुग की नई परंपरा का बीजारोपण कह रहे हैं. ऐसे लोगों को वे कहते हैं कि नई परंपराएं डालने में क्या हर्ज़ है. बहुत अच्छी बात है. नई और स्वस्थ और समयानुकूल परंपराएं डालने में कोई हर्ज़ा नहीं है. पर उन्हें इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि सैकड़ों करोड़ रुपए ख़र्च करके तथा हज़ारों शासकीय कर्मचारियों के कार्य दिवस पर ख़र्च करके की जाने वाली व्यवस्थाएं क्या केवल तीस चालीस हज़ार साधुओं के लिए ही होती हैं. ऐसा नहीं है. बल्कि सच यह है कि कुंभपर्व लाखों करोड़ों श्रद्धालुओं का भी उतना ही है जितना चंद साधु संतों का. सरकारी पैसा और सरकारी समय ख़र्च करके सारी व्यवस्थाएं आम आदमी के लिए की जाती हैं. यह अलग बात है कि हमारे आदरणीय संतगण अधिकांश सुविधाएं और व्यवस्थाएं स़िर्फ साधु समाज के लिए ही मान बैठे हैं और व़क्त की नज़ाकत के चलते प्रशासन भी केवल उन्हीं की मांगों, व्यवस्थाओं और सुविधाओं पर अधिक ध्यान दे रहा है. चौथे शाही स्नान का निर्णय भी संतसमाज की इसी दबाव की नीति और 3शासन-प्रशासन की उनके आगे निरीहता का नतीजा है.

अखाड़ा परिषद् को अगर नई परंपरा शुरू करनी ही थी तो वह उस गृहस्थ समाज की भावनाओं को देखते हुए करती जिनके दान-पुण्य और श्रद्धा पर साधु समाज टिका हुआ है. अखाड़ा परिषद् को सोमवती अमावस्या का शाही स्नान आम जनता को समर्पित करके कुंभ का वास्तविक पुण्यार्जन करना चाहिए था. नई परंपरा ही शुरू करनी ही थी तो इक्कीसवीं सदी में भी विवस्त्र नागाओं के गंगास्नान पर चिंतन किया जाना चाहिए था. आज जब सामान्य परिवारों में भी तीन साल के बच्चों तक को नग्न नहीं रहने दिया जाता,  समाज में लोग इसे असभ्यता मानते हैं तब युवा वृद्ध नागा संन्यासियों को खुले आम सड़कों पर शोभायात्रा में ले जाना और उनका सार्वजनिक स्थल पर नग्न होकर स्नान करना चिंतन का विषय हो सकता था. इस परंपरा पर पुनर्विचार करना चाहिए था. अगर कुंभ को नया रूप ही देना था तो उसे जनोन्मुखी बनाने की सोचते. शाहों-शहंशाहों के बीते युग के शाही स्नान की जगह नए फ़कीरी स्नान की परंपरा डालते. पर ऐसा सब कुछ करने में अगर परंपराएं बाधा बन रही थीं तो फिर यह चौथे स्नान की नई परंपरा डालने का भला क्या मतलब था? यह जनविरोधी निर्णय लेकर अखाड़ा परिषद् के हमारे पूज्य संतों ने आम जनता से चैत्र पूर्णिमा के दिन हरकी पौड़ी पर स्नान करने का पुण्य अवसर छीन लिया है. क्या यही अच्छा होता कि कुंभ प्रशासन और अखाड़ा परिषद् मिलकर निर्णय लेते कि 30 मार्च को चैत्र पूर्णिमा का स्नान साधु समाज आम जनता के साथ करेगा. यूं भी तो अखाड़े अपने शाही जुलूसों में साधुओं से ज़्यादा गृहस्थियों को ले ही जाते हैं. अंतर केवल यह है कि वे गृहस्थ उनके अपने  दान-दक्षिणा देने वाले चेले चपाटे और उनके परिवार होते हैं. असल में बेचारे आम स्नानार्थी के बारे में न तो प्रशासन सोच रहा है और न ही साधु समाज.

2 thoughts on “चौथा शाही स्नान जनता के अधिकारों पर डाका है

  • May 15, 2014 at 12:00 AM
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    अखाड़ा परिषद् को अगर नई परंपरा शुरू करनी ही थी तो वह उस गृहस्थ समाज की भावनाओं को देखते हुए करती जिनके दान-पुण्य और श्रद्धा पर साधु समाज टिका हुआ है. अखाड़ा परिषद् को सोमवती अमावस्या का शाही स्नान आम जनता को समर्पित करके कुंभ का वास्तविक पुण्यार्जन करना चाहिए था. नई परंपरा ही शुरू करनी ही थी तो इक्कीसवीं सदी में भी विवस्त्र नागाओं के गंगास्नान पर चिंतन किया जाना चाहिए था. आज जब सामान्य परिवारों में भी तीन साल के बच्चों तक को नग्न नहीं रहने दिया जाता – See more at: http://www.chauthiduniya.com/2010/03/chautha-shahi-asnan-janta-ke-adhikaron-par-daka-he.html/comment-page-1#comment-9735

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  • May 14, 2014 at 1:45 AM
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    नीस शेयरिंग इनफार्मेशन, वेरी लव रीडिंग थिस. थैंक यू

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