जनसंख्‍या के आधार पर आदिवासी आरक्षण की मांग

छत्तीसगढ़ राज्य में जनसंख्या के अनुपात में आदिवासियों को 32 प्रतिशत आरक्षण देने का मुद्दा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए मुसीबत बन गया है.

अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के झण्डे तले राज्य के 18 आदिवासी संगठनों ने हाल ही रायपुर में अपनी 15 सूत्रीय मांगों को लेकर जनमत जागृत करने की जो मुहिम छेड़ी, उसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी के कई नेता आदिवासी एकता का राग अलापने लगे थे और वे भी राज्य में आदिवासियों को 32 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग के पक्ष में खड़े हो गए.

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कांग्रेस ने अजीत जोगी को आदिवासी प्रतिनिधि के रूप में मुख्यमंत्री बनाया था, लेकिन कांग्रेस सहित अन्य दलों के आदिवासी नेताओं ने जोगी के आदिवासी होने पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया.

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कांग्रेस ने अजीत जोगी को आदिवासी प्रतिनिधि के रूप में मुख्यमंत्री बनाया था, लेकिन कांग्रेस सहित अन्य दलों के आदिवासी नेताओं ने जोगी के आदिवासी होने पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया. फिर भी अजीत जोगी ने अपनी राजनीति के लिए हमेशा आदिवासी कार्ड खेला और ऊपरी तौर पर ही सही, हमेशा आदिवासियों के विकास और कल्याण के कार्यक्रमों पर जोर देते रहे. विधानसभा चुनाव हारने के बाद जोगी ने भाजपा में भी आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठाने में उत्प्रेरक की भूमिका अदा की. लेकिन डॉ. रमनसिंह अपनी लोकप्रियता और शीर्ष भाजपा नेताओं की स्वीकृति के बल पर दुबारा मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे. इससे भाजपा के अन्य नेता शिवप्रताप सिंह, नंदकुमार शाह, ननकीराम कवर आदि भीतर ही भीतर असंतुष्ट रहकर आदिवासियों की एकता के लिए प्रयास करते रहे. इस एकता का ही नतीजा है कि राज्य के 18 आदिवासी संगठन, अपने दलीय लगाव को भूलकर एकजुट हुए हैं. इनका सवाल है कि झारखण्ड में भाजपा ने आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया और हाल ही शिबु सोरेन को सरकार बनाने में सहयोग दिया, तब छत्तीसगढ़ में भाजपा आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का क्यों विरोध कर रही है, जबकि छत्तीसगढ़ में 32 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है.

आदिवासी विकास परिषद में भाजपा सरकार की खुलकर आलोचना भी की गई है. मुख्यमंत्री रमन सिंह के कामकाज के बारे में साफ शब्दों में कहा गया है कि वे सरकार के सभी महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रखे हुए हैं और सरकार और भाजपा पर पूरा नियंत्रण रखकर राज्य में वन मैन शो कर रहे हैं. सरकार के कई आदिवासी मंत्री केवल शोभा के पात्र बनकर रहे गए हैं, क्योंकि सरकार के आला अफसर उनके आदेशों और सुझावों पर ध्यान नहीं देते हैं. कहने को तो ननकीराम कवर गृहमंत्री हैं, लेकिन राज्य के पुलिस महानिदेशक न तो उनकी सुनते हैं और न ही उन्हें गृहमंत्री का सम्मान देते हैं.

यह भी कहा गया कि नगरीय और ग्रामीण संस्थाओं के चुनाव में आदिवासियों को उचित प्रतिनिधित्व न मिल सकें, इसके लिए सरकार ने सभी कानूनी और प्रशासनिक उपाय किए थे. नक्सलवाद की समस्या से जूझने के नाम पर बस्तर और दूसरे कई स्थानों पर निर्दोष आदिवासियों की पुलिस द्वारा हत्या करने और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में आदिवासी नेताओं ने विस्तार से चर्चा करते हुए सरकार और पुलिस के रवैये को आदिवासी विरोधी करार दिया है. आदिवासी नेताओं ने एकजुट होकर भाजपा के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी से मुलाकात करने और अपनी तमाम मांगों पर बातचीत करना तय किया है. लेकिन जानकारों का कहना है कि आदिवासी नेता वास्तव में भाजपा पर राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री नियुक्त करने का दबाव बनाना चाहते हैं और इसी उद्देश्य को लेकर वे गडकरी से मुलाकात करना चाहते हैं.