यह साल का वह समय है, जबकि लोग होली की तैयारियों में व्यस्त हैं. कुछ लोग इस त्योहार के लिए विभिन्न प्रकार के रंग एकत्र करने में लगे हैं तो कई लोग रंगों से बचने के लिए शहर से दूर जाने की योजना बना रहे हैं. कुछ लोग तो अपने घरों के अंदर ही कैद रहकर रंगों से बचने की सोच रहे हैं. हालांकि, सच यह है कि लोग रंगों से उतना नहीं डरते, जितना रंग के नाम पर चेहरे पर लगाई जाने वाली ख़तरनाक चीज़ों से, जिनकाहोली के मौक़े पर इस्तेमाल किया जाता है और कई बार नुक़सानदायक साबित होता है.
जैसे हमारे पूर्वज वसंत की प्राकृतिक ख़ूबसूरती से इतने प्रभावित हो गए कि उसे उन्होंने होली के रूप में अपने जीवन में उतार लिया. लेकिन उन दिनों होली में उन रंगों का इस्तेमाल होता था, जो इस मौसम में खिलने वाले फूलों से बने होते थे. इन रंगों से नुक़सान की बात तो दूर, स्वास्थ्य और चिकित्सा के लिहाज़ से ये का़फी फायदेमंद होते थे. इनमें मौजूद गुण त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद होते थे.
हम यदि अपने आसपास देखें तो यह समझते देर नहीं लगती कि यह साल का वह समय होता है, जब रंगीनियां अपने शबाब पर होती हैं. पतझड़ के बाद पेड़-पौधे नए फूल-पत्तों से लदे होते हैं. ठंड के कुहासे की जगह सा़फ आसमान से सूरज की किरणों की लालिमा देखने लायक़ होती है. ठंडी और हाड़ कंपा देने वाली हवा की जगह वसंती हवा हमारा मन मोह लेती है. कुल मिलाकर पूरा वातावरण ख़ुशगवार लगता है. यह वसंत का महीना है. ठंड की विदाई के बाद गर्मियों की आमद और उसकी तैयारी का समय.
इस नज़रिए से देखें तो होली का त्योहार प्रकृति के पटल पर विविध रंगों के फूलों की आमद से पूरी तरह मेल खाता है. यह प्रकृति की रंग-बिरंगी ख़ूबसूरती को हमारे जीवन में परिलक्षित करता है. ऐसा लगता है, जैसे हमारे पूर्वज वसंत की प्राकृतिक ख़ूबसूरती से इतने प्रभावित हो गए कि उसे उन्होंने होली के रूप में अपने जीवन में उतार लिया. लेकिन उन दिनों होली में उन रंगों का इस्तेमाल होता था, जो इस मौसम में खिलने वाले फूलों से बने होते थे. इन रंगों से नुक़सान की बात तो दूर, स्वास्थ्य और चिकित्सा के लिहाज़ से ये का़फी फायदेमंद होते थे. इनमें मौजूद गुण त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद होते थे.
लेकिन समय के साथ प्राकृतिक रंगों की जगह कृत्रिम डाई ने ले ली है. आजकल बाज़ारों में ऐसे रंगों की भरमार नज़र आती है, जो आंखों को तो सुहावने दिखते हैं, लेकिन ख़ासा नुक़सान पहुंचा सकते हैं. रंगों के तीन अलग-अलग रूप बाज़ारों में मिलते हैं सूखे, पानी मिले और पेस्ट. इन सभी में एक कलरेंट होता है, जिसे किसी आधारभूत तत्व (बेस मैटीरियल) के साथ मिलाया जाता है. कलरेंट में तांबा, सीसा, पारा और एल्युमिनियम जैसे कई रासायनिक तत्व मिले होते हैं, जो हमारी त्वचा के लिए का़फी ख़तरनाक हो सकते हैं. इनके इस्तेमाल से कई तरह की परेशानियां जैसे त्वचा में ख़ुरदरापन, खुजलाहट और श्वास संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
इतना ही नहीं, इन रासायनिक तत्वों को जिस आधारभूत तत्व (बेस मैटीरियल) में मिलाया जाता है, वे भी सुरक्षित नहीं होते. अधिकांश पाउडर या सूखे रंगों में आधारभूत तत्व के रूप में एस्बेस्टस, चॉक पाउडर या सिलिका का उपयोग होता है. हम सभी जानते हैं कि एस्बेस्टस मानव शरीर में कैंसर का कारण होता है. शरीर में जमा इसकी छोटी मात्रा भी कैंसर के विकास का कारण बन सकती है. सिलिका त्वचा को शुष्क और कमज़ोर बनाता है. रंगों में दिखने वाली चमक की वजह इसमें मिला हुआ शीशे का चूर्ण या माइका होता है. कई वाटर कलर्स में मिले आधारभूत तत्व अल्कलाइन या क्षारीय होते हैं, जो वास्तव में ख़तरनाक होते हैं. यदि यह आंखों में प्रवेश कर जाएं तो नज़र संबंधी कई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं. पेस्ट के रूप में तैयार किए गए रंगों में कई बार इंजन ऑयल या अन्य घटिया क्वॉलिटी के तैलीय पदार्थों के साथ विषाक्त यौगिक मिले होते हैं, जिनसे एलर्जी या तात्कालिक अंधेपन जैसी परेशानियां खड़ी हो सकती हैं.
(स्रोत: टॉक्सिक लिंक्स एंड वातावरण)
केवल रंग ही नहीं, आजकल होली खेलने का तरीक़ा भी असुरक्षित हो चुका है. रंग भरे गुब्बारे और अंडे फेंकने का चलन का़फी आम है, जो आंखों और कानों के लिए नुक़सानदायक हो सकता है. होली के दौरान छेड़खानी और अन्य असामाजिक गतिविधियां भी का़फी आम हो चुकी हैं. एक समय था, जब होलिका दहन में आसपास के सभी लोग एक साथ जमा होते थे, लेकिन आधुनिक दौर में यह एक व्यक्तिगत जलसे में तब्दील होता जा रहा है. इन सब चीज़ों से न केवल स्वास्थ्य और सुंदरता पर बुरा असर पड़ता है, बल्कि वातावरण भी बुरी तरह प्रभावित होता है. सफाई के बाद रंग और गुब्बारों के टुकड़े हमारे जल स्रोतों में प्रवेश कर उसे प्रदूषित और विषाक्त बनाते हैं. जबकि जगह-जगह होलिका दहन के आयोजन से वायु प्रदूषण में वृद्धि होती है.
होली ऐसा त्योहार है, जो लोगों को आपस में जोड़ने की क्षमता रखता है. किसी भी इंसान के चेहरे पर रंग लगाने से उसकी सभी व्यक्तिगत पहचान जैसे धर्म, जाति, सामाजिक हैसियत आदि गौण होकर रह जाते हैं. वह तो केवल प्यार और आत्मीयता के रंग में रंगा होता है. ऐसी सभी सीमाएं, जो उसे दूसरे इंसान से अलग करती हैं, गुम हो जाती हैं. इन सीमाओं से दूर हर कोई एक जैसा ही दिखता है. एकता की यह भावना सारी दूरियां ख़त्म कर देती है और प्रकृति की ख़ूबसूरती का आनंद लेने के लिए सभी एक साथ होते हैं. लेकिन हालत यह है कि आजकल अधिकतर लोग रंगों के इस त्योहार से अलग रहना ही ज़्यादा पसंद करते हैं. ऐसे लोगों को दोबारा होली के साथ जोड़ने की ज़रूरत है. इसके लिए आवश्यक है कि हम होली के प्राकृतिक स्वरूप को अपनाएं, जिससे लोग डरें नहीं. हमें ऐसे रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए, जो ख़ुद हमारे और वातावरण के लिए सुरक्षित हों. ऐसे रंग हम अपने घरों में भी आसानी से बना सकते हैं. आइए, जानते हैं इसके कुछ तरीक़ों के बारे में:
हरा
- सूखा हरा रंग तैयार करने के लिए हिना या मेहंदी में आटा मिलाएं. ध्यान रहे कि इसे धोने के लिए पानी का इस्तेमाल न करें. इसके लिए ब्रश का उपयोग करें.
- गुलमोहर के पत्तों को सुखाकर उसका पाउडर बनाने से भी हरा रंग तैयार होता है.
- पालक के पत्तों का पेस्ट बनाकर उसे पानी में मिलाने से गीला हरा रंग तैयार किया जा सकता है.
लाल
- लाल चाइना रोज फ्लावर को सुखाकर उसका चूरा तैयार करें और उसे आटे में मिलाने से सूखा लाल रंग बनता है.
- लाल चंदन को भी सूखे लाल रंग के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
- रतन ज्योत को पहले पानी में उबालें. फिर उसे ठंडा कर उसमें पानी मिलाने से गीला लाल रंग तैयार होता है.
- अनार के छिलके को पानी के साथ उबाल कर उसे लाल रंग के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
- जब हल्दी के ऊपर नींबू का रस गिराया जाता है तो वह लाल हो जाता है. इसे पानी के साथ मिलाकर गीले लाल रंग के रूप में उपयोग किया जा सकता है.
- टमाटर या गाजर के पेस्ट को पानी के साथ मिलाकर भी लाल रंग तैयार किया जा सकता है.
पीला
- हल्दी पाउडर में बेसन मिलाने से सूखा पीला रंग बनता है.
- अमलतास के फूलों को छाया में सुखाकर उसका पाउडर बनाएं. फिर उसमें बेसन या आटा मिलाकर उसे पीले रंग के रूप में प्रयोग किया जा सकता है.
- बेल के ऊपरी छिलके को सुखाकर उसका चूरा बनाएं. इससे पीले रंग का पाउडर तैयार होता है.
- गीले पीले रंग के लिए अमलतास के फूलों को पानी में डालकर उबालें और उसे रात भर ऐसे ही छोड़ दें. सुबह तक रंग तैयार हो जाएगा.
- हल्दी को पानी में मिलाकर भी पीला रंग तैयार किया जा सकता है. यदि इसे उबाल दें तो रंग और भी गहरा होता है.
मैजेंटा (लाल और बैंगनी का मिश्रण)
- चुकंदर के पेड़ की जड़ को टुकड़ों में काट लें और उसे पानी में डालकर छोड़ दें. इसे उबाल कर रात भर ऐसे ही छोड़ देने से रंग और भी गहरा होता है.
- 10-15 गुलाबी प्याज के छिलकों को आधा लीटर पानी में उबालने से गुलाबी रंग तैयार होता है. इस्तेमाल से पहले इन छिलकों को हटा देने से प्याज की गंध भी नहीं रहती.
- गुलाबी कचनार के फूलों को पानी में डालकर उबालने या रात भर ऐसे ही छोड़ देने से भी गुलाबी रंग तैयार होता है.
केसरिया
- टेसू, पलाश या ढाक के फूलों को छाया में सुखाकर उसका चूरा तैयार करें.
- इन फूलों को पानी के साथ उबाल कर रात भर ऐसे ही छोड़ देने से केसरिया रंग का पानी तैयार होता है.
- केसर के कुछ टुकड़ों को दो चम्मच पानी में डालकर कुछ घंटों के लिए छोड़ दें. फिर उसे पीसकर पेस्ट तैयार कर लें. अपनी पसंद के हिसाब से इसमें पानी मिला दें. हालांकि यह महंगा होता है, लेकिन हमारी त्वचा के लिए फायदेमंद होता है.
भूरा
- पान के साथ खाए जाने वाले कत्थे में पानी मिलाने से भूरा रंग तैयार होता है.
- चाय या कॉफी के पत्ते को पानी में उबालें. फिर इसे ठंडा कर भूरे रंग के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
काला
- सूखे आंवले को किसी लोहे के बर्तन में उबाल कर उसे रात भर वैसे ही छोड़ दें. सुबह उसमें उचित मात्रा में पानी मिलाकर उसे काले रंग के रूप में प्रयोग किया जा सकता है.
- काले अंगूर का जूस निकाल कर उसमें पानी मिलाने से भी काला रंग तैयार होता है. (स्रोत: क्लीनइंडिया.ओआरजी)
हालांकि यह सारे रंग ख़रीदे भी जा सकते हैं. होली के लिए प्राकृतिक कलर्स बाज़ारों में आसानी से उपलब्ध होते हैं. आप यह रंग अपने घर में तैयार करें या बाज़ार से ख़रीदें, लेकिन यह सुनिश्चित करें किइस बार हम होली अपने स्वास्थ्य या वातावरण की क़ीमत पर नहीं खेलेंगे. होली का त्योहार, जो असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है, जो गेहूं की नई फसल के उपलक्ष्य और वसंत ऋृतु के स्वागत में मनाया जाता है, को एक बार फिर से ख़ूबसूरत बनाने की ज़रूरत है. आइए, हम सब मिलकर होली के वास्तविक स्वरूप और इसके पुराने उत्साह को दोबारा लाने के लिए कोशिश करें.
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