कचरे के चलते रोजी-रोटी का संकट

नई परियोजनाओं पर आठ महीने के लिए रोक लगना धनबाद में गर्त में जाते उद्योग जगत के लिए एक और चुनौती है. खासकर रोजगार के दृष्टिकोण से यह निर्णय विकट स्थिति पैदा करने के लिए का़फी है. धनबाद ज़िला प्रशासन, कोल कंपनियों के प्रबंधन और राज्य सरकार की अदूरदर्शी सोच के कारण यह विकट स्थिति उत्पन्न हुई है. अगर तीनों में से किसी ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई होती तो आज इस स्थिति का सामना न करना पड़ता. इतना ही नहीं, अगर अगले आठ महीनों में भी कोई परिवर्तन न हुआ तो निश्चित रूप से लोगों के सामने और भी विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी.

इन सभी समस्याओं का इलाज ठोस कचरा प्रबंधन के माध्यम से ही संभव है. सामान्य तौर पर कचरा दो प्रकार का होता है. एक ठोस और दूसरा द्रव्य कचरा. उद्योगों से निकलने वाले कचरे रासायनिक नामों से जाने जाते हैं. घरों से निकलने वाले ठोस कचरे को अलग कर रिसाइकिल करने का प्रबंध किया जाता है.

मंदी के दौर से गुज़र रहे देश में बेरोज़गारी बड़ी समस्याओं में शुमार है. ऐसे में धनबाद जैसे शहरों में नई परियोजनाओं पर रोक से बेरोज़गारी और ब़ढेगी. हालात ऐसे हो चुके थे कि मंत्रालय को विवश होकर यह निर्णय लेना पड़ा. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 43 औद्योगिक केंद्रों में बढ़ते प्रदूषण के कारण नई परियोजनाएं शुरू करने पर आठ माह की रोक लगा दी है. केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड ने हाल में इन औद्योगिक केंद्रों को गंभीर रूप से प्रदूषण उत्पन्न करने वाला क़रार दिया है. यह प्रतिबंध तत्काल प्रभावी हो गया है और अगस्त 2010 तक लागू रहेगा. दरअसल, धनबाद समेत देश के 43 शहरों में प्रदूषण का स्तर का़फी ब़ढ गया है और यह घातक रूप ले चुका है. धनबाद में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और मिट्टी जनित प्रदूषण के सबसे बड़े कारक कोयले के कण हैं. प्रबंधन ठीक से न होने के कारण घरों से निकलने वाले कचरे से जल पर भी बुरा असर पड़ रहा है. कोयले के कारण कृषि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. जल प्रदूषण के करण कई क्षेत्रों में लोगों को गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है. वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष दमा से पीड़ित लोगों की संख्या त़ेजी से बढ़ती जा रही है. ध्वनि प्रदूषण के कुप्रभाव से लोग ठीक से सुन नहीं पा रहे हैं. इन सभी समस्याओं का कारण शहर में ठोस कचरा प्रबंधन न होना है. विडंबना देखिए कि आज से चार साल पहले धनबाद को नगरपालिका से नगर निगम बना दिया गया, मगर कर्मचारियों की संख्या जस की तस है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, दस हज़ार की आबादी पर 28 स़फाई कर्मचारी होने चाहिए. इस प्रकार स़िर्फ सफाईकर्मियों की संख्या 2800 होनी चाहिए, लेकिन यह संख्या 650 से 750 के बीच है. कुछ मज़दूरों को दैनिक भुगतान के आधार पर रखा जाता है, मगर यह उपाय कारगर नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्देश में स्पष्ट किया है कि एक स़फाईकर्मी के ज़िम्मे 250 से 300 वर्ग क्षेत्रफल ही आता है. इस अनुपात का पालन धनबाद जैसे शहर में संभव नहीं है. कुल मिलाकर जब तक सरकार स़फाईकर्मियों को बहाल नहीं करती, तब तक स़फाई के दृष्टिकोण से धनबाद में सुधार होने की संभावना नहीं दिखती है. इन सभी समस्याओं का इलाज ठोस कचरा प्रबंधन के माध्यम से ही संभव है. सामान्य तौर पर कचरा दो प्रकार का होता है. एक ठोस और दूसरा द्रव्य कचरा. उद्योगों से निकलने वाले कचरे रासायनिक नामों से जाने जाते हैं. घरों से निकलने वाले ठोस कचरे को अलग कर रिसाइकिल करने का प्रबंध किया जाता है.

इसके लिए मशीनें लगाई जाती हैं, जो कचरे के ढेर को अलग कर इसे फिर प्रयोग में लाने लायक बना देती हैं. लेकिन, ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर न तो सरकारी स्तर से प्रयास किया गया और न ही कभी तंत्र पर दबाव डाला गया. राजनीतिज्ञों ने तो इस दिशा में कभी सोचा ही नहीं. अभी भी समय है कि सरकार, प्रशासन और धनबाद की जनता सतर्क हो जाए, अन्यथा देश में औद्योगिक नगरी के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके ज़िले के लिए आने वाले दिन कठिनाइयों से भरे होंगे. एक तो पहले से ही उद्योगों की स्थिति मरणासन्न है, जिससे हज़ारों लोगों पर रोज़गार का खतरा मंडरा रहा है.

समस्या का समाधान कैसे हो

धनबाद नगर निगम में जवाहर लाल नेहरू शहरी पुनरुद्धार मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत ठोस कचरा प्रबंधन के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इसके लिए मशीनें लगेंगी. नई जगह की तलाश की जा रही है, लेकिन इन परियोजनाओं को ज़मीन पर उतारने के लिए प्रदूषण विभाग से एनओसी लेने की ज़रूरत पड़ेगी. अब जबकि केंद्र सरकार ने नई परियोजनाओं पर रोक लगाने का निर्देश दिया है तो निश्चित रूप से इस परियोजना के लिए भी एनओसी लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. धनबाद को कचरे के ढेर से निजात दिलाने के लिए ठोस प्रबंधन की शुरुआत बहुत ज़रूरी है. इसके लिए केंद्र सरकार पैसा भी उपलब्ध कराएगी. इस कार्य के लिए परामर्शी का चयन कर टेंडर प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है, लेकिन मशीनें लगाने के लिए पर्यावरण विभाग की एनओसी राह में बाधा बनकर खड़ी है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इस संदर्भ में फिलहाल कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है.

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