कोरकू बोली का शब्‍दकोष और व्‍याकरण तैयार

मध्य प्रदेश के आदिवासियों की भाषा और बोली का़फी समृद्ध और सक्षम मानी जाती है. इस अलिखित भाषा और आदिवासी बोलियों में ज्ञान-विज्ञान और कथा साहित्य का अनंत और अति प्राचीन भंडार मौजूद है. लेकिन आधुनिकता की आंधी में इन भाषाओं और बोलियों पर दूसरी भाषाओं और बोलियों का ज़ोरदार प्रभाव आक्रमण की तरह घातक सिद्ध हो रहा है. अनेक आदिवासी बोलियां विलुप्ति की कगार पर हैं और कई बोलियों में अन्य भाषाओं के शब्दों, मुहावरों का इतना ज़्यादा मिश्रण हो गया है कि वे अपनी मौलिकता खोती जा रही हैं.

मध्य प्रदेश में कोरकू ,गोंडी, हलवा, भील, बैगा आदि कई आदिवासी भाषाएं और बोलियां प्रचलन में हैं और इनका प्रयोग करने वाली जनसंख्या भी एक करोड़ के लगभग है, लेकिन इन जनभाषाओं के संरक्षण और इनके साहित्य को प्रोत्साहन देने के लिए सरकारी या ग़ैर सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है.

कुछ वर्ष पहले मध्य प्रदेश सरकार ने आदिवासी जनसंख्या बहुल क्षेत्रों में आदिवासी बच्चों को उनकी भाषा में शिक्षा देने की प्रक्रिया शुरू की थी, इसी प्रक्रिया में आदिवासियों की भाषाओं को लिपिबद्ध करना प्रारंभ हुआ. लेकिन आदिवासियों की समृद्ध भाषा और बोलियों का अब तक कहीं कोई व्याकरण या लिखित साहित्य नहीं है. श्रुति, स्मृति परंपरा से ही आदिवासियों की विभिन्न भाषाएं अज्ञात काल से प्रचलन में है. आधुनिक शिक्षा पद्धति और सूचना क्रांति के दौर में आदिवासियों की बोलियों पर भी नष्ट हो जाने का खतरा मंडराने लगा है, इसलिए मध्य प्रदेश सरकार ने आदिवासियों की बोलियों को लिपिबद्ध करने और व्याकरण तैयार करने का काम शुरू किया है. मध्य प्रदेश आदिम जाति अनुसंधान संस्थान के सहायक संपादक एलएन पयौधि के अनुसार कोरकू जनजाति, स्वयं को दुनिया की पहली इंसान प्रजाति मानती है. कोरकू शब्द का अर्थ ही मानव है. लेकिन अनादिकाल से प्रचलन में रही कोरकू बोली का अब तक कोई व्याकरण नहीं था. हाल ही में आदिम जाति अनुसंधान संस्था ने कोरकुओं की बोली का व्याकरण तैयार किया है. दुनिया के जनजाति इतिहास में मध्य प्रदेश के कोरकू ही थे, जिन्होंने हज़ारों-हज़ार वर्ष पूर्व स्वयं को मानव के रूप में संबोधित किया था. कोरकू जनजाति की बोली का एक सुविकसित इतिहास भी रहा है. मौजूदा समय में पारंपरिक बोलियों और भाषाओं पर लुप्त होने का संकट मंडरा रहा है. इन आदिम भाषाओं पर दूसरी प्रचलन वाली भाषाओं और बोलियों का आक्रमण हो रहा है. ऐसे समय में कोरकू बोली के संरक्षण का बीड़ा उठाया गया है. वैसे इस बोली के कई शब्द और मुहावरें अब प्रचलन में नहीं हैं, फिर भी उनकी खोज की जा रही है. कोरकू बोली का शब्दकोष और व्याकरण तैयार करने में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर के पूर्व उपनिदेशक जेसी शर्मा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. जल्दी ही कोरकू  बोली के शब्दकोष और व्याकरण के बारे में पुस्तक प्रकाशित कर ली जाएगी.

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One thought on “कोरकू बोली का शब्‍दकोष और व्‍याकरण तैयार

  • April 11, 2017 at 1:10 AM
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    मध्य प्रदेश में कोरकू ,गोंडी, हलवा, भील, बैगा आदि कई आदिवासी भाषाएं और बोलियां प्रचलन में हैं और इनका प्रयोग करने वाली जनसंख्या भी एक करोड़ के लगभग है, लेकिन इन जनभाषाओं के संरक्षण और इनके साहित्य को प्रोत्साहन देने के लिए सरकारी या ग़ैर सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है………..

    This can be done in India’s simplest very easy to learn Gujanagari(Gujarati) script.
    Don’t let Sanskrit pundits create new scripts for these Aadivaasii languages and divide India further in complex scripts as they have done in past under different rulers.

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