मध्य प्रदेश: एड्‌स के ब़ढते मामले

मध्य प्रदेश में इस समय एड्‌स की बीमारी का क़हर बढता जा रहा है. सरकार का स्वास्थ्य विभाग राज्य में एड्‌स रोगियों की संख्या लगातार बढ़ने से चिंतित है. इसके अलावा राज्य में सरकार और सरकारी सहायता प्राप्त ग़ैर सरकारी संगठनों द्वारा हर साल करोड़ों रूपया एड्‌स की रोकथाम के प्रचार अभियान पर खर्च किया जाता है, फिर भी इस प्रचार का जनता पर कोई असर नहीं हो रहा है. स्वास्थ्य विभाग के पास एड्‌स बीमारी की जांच के लिए न तो पर्याप्त साधन है और न ही अमला है. ज़िला स्तर के और छोटे अस्पतालों में तो हालात और भी बदतर हैं. सरकारी डॉक्टर एड्‌स रोगियों के उपचार में न तो कोई रुचि नहीं लेते हैं और न ही उन्हें इस बात का अंदाज़ा है कि यह बीमारी पूरे प्रदेश में अपने पांव पसार रही है. इसके अलावा इनके पास एड्‌स सुरक्षा किट भी नहीं है.

राज्य में सरकार और सरकारी सहायता प्राप्त ग़ैर सरकारी संगठनों द्वारा हर साल करोड़ों रूपया एड्‌स की रोकथाम के प्रचार अभियान पर खर्च किया जाता है.

मध्यप्रदेश एड्‌स कंट्रोल सोसाइटी से प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य में एड्‌स की जांच के लिए राज्य के पांच मेडिकल कॉलेजों और 40 ज़िला अस्पतालों में 103 जांच केंद्र है, बाद में सोसाइटी ने 40 नए जांच केंद्र खोलने का फैसला लिया है. मध्य प्रदेश में 1995 तक एड्‌स प्रभावित मरीज़ों की संख्या 225 थी जो 2009 तक बढ़कर 16 हज़ार से ज़्यादा हो गई है. सोसाइटी ने चिंता व्यक्त की है कि राज्य में हर माह 50 से अधिक एड्‌स के नए मरीज़ अस्पतालों में जांच और उपचार के लिए आ रहे है. एड्‌स की रोकथाम के प्रचार अभियान में लगे एक ग़ैर सरकारी स्वयं सेवी संगठन के अध्ययन के अनुसार राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में अब एड्‌स रोगियों की संख्या बढ़ने लगी है. प्रवासी मज़दूरों के असुरक्षित यौन संबंधों के कारण यह बीमारी ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों को अपनी चपेट में लेने लगी है.

मरीज़ों से डॉक्टर भी डरते हैं

जानलेवा यौन रोग एड्‌स से पीड़ित मरीज़ों से वे डॉक्टर भी भय खाते है, जो आम जनता को यह संदेश देते है कि एड्‌स रोगी को छूने से एड्‌स रोग नहीं होता है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में वास्तविक स्थिति यह है कि यदि भूले भटके कोई एड्‌स पीड़ित इलाज के लिए आ जाता है, तो डॉक्टर इसे छूने और इसका इलाज करने से कतराते है.

हाल ही सिवनी के सरकारी ज़िला अस्पताल में एक गर्भवती महिला प्रसव के लिए भर्ती कराई गई. प्रसव पीड़ा होते ही डॉक्टरों ने इस महिला को लेबर रूम में पहुंचा दिया, लेकिन जब डॉक्टर को मालूम पड़ा कि वह महिला एड्‌स रोग से पीड़ित है, तो प्रसव वेदना से कराह रही महिला को लेबर रूम में अकेला छोड़कर डॉक्टर और सहायक चिकित्साकर्मी भाग खड़े हुए. इस घटना की सूचना एड्‌स नियंत्रण समिति के अधिकारी तक पहुंची और उन्होंने तत्काल ज़िले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर एस आर चौहान से पूछताछ की. डॉक्टर चौहान ने मजबूरी बताते हुए कहा कि एड्‌स सुरक्षा किट न होने के कारण डॉक्टर इस महिला का प्रसव नहीं करा पा रहे है क्योंकि प्रसव के दौरान खून भी निकलता है और ऐसे में एड्‌स मरीज़ के खून से डॉक्टरों और चिकित्साकर्मियों का सीधा संपर्क होता है. कुछ देर बाद एड्‌स सुरक्षा किट डॉक्टरों को उपलब्ध करा दिए गये और इस महिला का प्रसव भी सुरक्षित रूप से करा दिया गया. महिला और इसका बच्चा दोनों सुरक्षित है. बाद में बच्चे की जांच से पता चला है कि वह बच्चा एड्‌स प्रभावित नहीं हुआ है.

सिवनी के डॉक्टर ने बताया कि ज़िला अस्पतालों में एड्‌स मरीज़ों के इलाज के लिए आवश्यक एड्‌स सुरक्षा किट डॉक्टरों को उपलब्ध नहीं कराये जाते. ग्रामीण क्षेत्रों में तो ऐसी सुरक्षा किटों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है. प्रसव जैसे मामलों में मरीज़ों की ब्लड रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं होती है. एड्‌स सुरक्षा किट की क़ीमत 500 रूपये होती है और ये किट राज्य के कुछ बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध है.

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