मृत्यु दंड : अमानवीय या ज़रूरत

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कैपिटल पनिशमेंट, जिसे मृत्यु दंड या फांसी के नाम से भी जाना जाता है, का मुद्दा उसके समर्थकों और विरोधियों के बीच अक्सर गर्मागर्म बहस का कारण बनता रहा है. मृत्यु दंड के ख़िला़फ तर्क देते हुए एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है, मृत्यु दंड मानवाधिकारों के उल्लंघन की पराकाष्ठा है. वास्तव में यह न्याय के नाम पर व्यवस्था द्वारा किसी इंसान की सुनियोजित हत्या का एक तरीक़ा है. यह जीने के अधिकार के विरुद्ध है… यह न्याय का सबसे क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक तरीक़ा है. यातना या क्रूरता को किसी लिहाज़ से न्यायोचित नहीं माना जा सकता.

वर्ष 1983 में बच्चन सिंह मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि मृत्यु दंड की सजा को संगीनतम अपराधों तक ही सीमित रखना चाहिए और इसे एक अपवाद की तरह ही देखा जाना चाहिए. अर्थात संगीन अपराधों की अति विशेष परिस्थितियों में ही इसका इस्तेमाल होना चाहिए. हत्या, सामूहिक डकैती के साथ हत्या, किसी बच्चे या मानसिक रूप से कमज़ोर इंसान को आत्महत्या के लिए प्रेरित करना, सरकार के ख़िला़फ युद्ध छेड़ना और किसी सैन्य विद्रोह में शामिल होने जैसे अपराध संगीनतम अपराधों की श्रेणी में आते हैं.

मृत्यु दंड के समर्थकों का तर्क है कि मानव जीवन बड़ा ही महत्वपूर्ण है और निर्दोषों की रक्षा करना समाज का अधिकार ही नहीं, उसका कर्तव्य भी है. निर्दोषों की रक्षा का एक तरीक़ा यह है कि जघन्य अपराध के आरोपियों को ऐसी सजा मिले, जो दूसरों के लिए एक उदाहरण हो, उन्हें ऐसे अपराध करने से रोकने का काम करे. पूरे देश में फिरौती के लिए अपहरण की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए कुछ दिनों पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों को अपहरणकर्ताओं को कड़ी से कड़ी सजा देने की सलाह दी थी. न्यायालय ने कहा था कि क़ानून फिरौती के लिए अपहरण की कुछ ख़ास स्थितियों में मृत्यु दंड तक की इजाज़त देता है और इसके लिए अपहृत व्यक्ति की हत्या कोई आवश्यक शर्त नहीं है. न्यायमूर्तिद्वय एच एस बेदी एवं जे एम पांचाल की खंडपीठ ने कहा था, आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि फिरौती के लिए अपहरण सारे देश में एक लाभदायक उद्योग का रूप लेता जा रहा है और इसके ख़िला़फ कड़े से कड़े क़दम उठाने की ज़रूरत है तथा इसकी कुछ ज़िम्मेदारी अदालतों के ऊपर भी है. सर्वोच्च न्यायालय की इस सलाह के बाद अपहरणकर्ताओं के ख़िला़फ कड़े दंड के प्रावधानों की शुरुआत हो सकती है, क्योंकि न्यायालय ने दो ऐसे अपराधियों की मृत्यु दंड की सजा बरक़रार रखी, जिन्होंने होशियारपुर में एक 16 वर्षीय छात्र का फिरौती के लिए अपहरण करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी.

न जाने कब से मृत्यु दंड राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विवाद का विषय रहा है, लेकिन इसके बावजूद अब तक इसका कोई आख़िरी परिणाम नहीं निकल पाया है. विचारक, न्यायाधीश, न्यायविद और समाज का बुद्धिजीवी वर्ग इस मुद्दे पर एकमत नहीं है. वह भी तब, जबकि सदियों से मृत्यु दंड का प्रावधान कई देशों की न्याय व्यवस्था का एक अभिन्न अंग रहा है. हालांकि भौगोलिक और ऐतिहासिक वजहों से इसके स्वरूप में भिन्नता देखने को मिलती है. भारतीय न्याय व्यवस्था न्याय के सुधारक और निवारक सिद्धांतों का मिश्रण है. दंड विधान का एक लक्ष्य जहां अपराधियों को अपराध करने से रोकना है, वहीं इसका दूसरा लक्ष्य उन्हें सुधरने का मौक़ा देना भी है. इन्हीं मूलभूत उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए विधायिका ने अपराध दंड संहिता में धारा 354(3) को जगह दी है. यह उपधारा वास्तव में मृत्यु दंड की सजा सुनाने की हालत में न्यायालय द्वारा इसकी ख़ास वजहों को स्पष्ट करने की एक आवश्यक शर्त बताती है. इस तरह 1973 के बाद से दंड संहिता में संगीन अपराधों की हालत में आजीवन कारावास का प्रावधान है, जबकि विशेष परिस्थितियों में मृत्यु दंड की सजा भी दी जा सकती है.

वर्ष 1983 में बच्चन सिंह मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि मृत्यु दंड की सजा को संगीनतम अपराधों तक ही सीमित रखना चाहिए और इसे एक अपवाद की तरह ही देखा जाना चाहिए. अर्थात संगीन अपराधों की अति विशेष परिस्थितियों में ही इसका इस्तेमाल होना चाहिए. हत्या, सामूहिक डकैती के साथ हत्या, किसी बच्चे या मानसिक रूप से कमज़ोर इंसान को आत्महत्या के लिए प्रेरित करना, सरकार के ख़िला़फ युद्ध छेड़ना और किसी सैन्य विद्रोह में शामिल होने जैसे अपराध संगीनतम अपराधों की श्रेणी में आते हैं. सच यह है कि भारत में कुछेक जघन्य और राजनीतिक अहमियत वाले मामलों में ही मृत्यु दंड की सजा अपराधियों को दी गई है. पिछले 60 सालों के इतिहास पर नज़र डालें तो महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी देने के मामले हमारी नज़रों के सामने आते हैं.

हाल के वर्षों में आतंकवाद के ख़िला़फ क़ानून के तहत आतंकी गतिविधियों में लिप्त आरोपियों को फांसी की सजा देने का चलन ब़ढा है. स्वामी श्रद्धानंद बनाम कर्नाटक राज्य मामले में निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्यु दंड के प्रावधान को और कड़ा कर दिया. अपने फैसले में न्यायालय ने माना कि बच्चन सिंह मामले में मृत्यु दंड को अपवाद मानने का प्रावधान मच्छी सिंह मामले में कमज़ोर पड़ गया. निर्णय में यह भी कहा गया कि अपवाद या अपराध की संगीनता को मानने का पैमाना केवल गुणात्मक ही न हो, बल्कि संख्यात्मक भी होना चाहिए. इस तरह जहां मच्छी सिंह मामले में फैसले के बाद एक ओर अपराधों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है, वहीं संगीनतम अपराधों के दायरे में भी बदलाव अपेक्षित है. इस निर्णय के बाद यह देखना रोचक होगा कि ऐसे अपराधों के मामलों में न्यायालयों का क्या रुख़ रहता है.

भारत में मृत्यु दंड की सजा पर विवाद तब और गहरा हो गया, जब स्वामी श्रद्धानंद मामले में सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीश फांसी की सजा की हालत में अपनाए जाने वाले मानकों पर एकमत नहीं हो पाए और मामले को एक बड़ी खंडपीठ के सामने रखना पड़ा. इस मामले में तीन सदस्यीय खंडपीठ के फैसले को मृत्यु दंड की सजा समाप्त करने की दिशा में न्याय व्यवस्था की एक बड़ी पहल माना जा सकता है. इसके ठीक बाद संतोष कुमार बरियार के मामले में न्यायमूर्ति सिन्हा के फैसले से इस पहल को और मज़बूती मिली. इन मामलों के अध्ययन से जो बात उभर कर सामने आती है, वह यह है कि अलग-अलग मामलों में समान तथ्यों को अलग-अलग अंदाज़ में देखा जाता है. और, फांसी दी जाए या नहीं, यह अक्सर ही न्यायाधीशों की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद पर निर्भर होकर रह जाता है. यह परिस्थिति, ख़ासकर मृत्यु दंड जैसे अहम फैसलों के लिहाज़ से उचित नहीं है और संवैधानिक प्रावधानों के ख़िला़फ भी है. बरियार ने इस मुद्दे पर ख़ासा ज़ोर दिया था और फैसले से पहले सुनवाई के प्रावधान की वकालत भी की थी, जिससे यह साबित किया जा सके कि आरोपी में सुधार की कोई संभावना नहीं है.

भारतीय संसद पर हमले के आरोपी आतंकी मोहम्मद अफजल गुरु की क्षमा प्रार्थना अर्जी को मीडिया में का़फी सुर्खियां मिलीं. जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कुछ अन्य नेताओं ने उसकी इस अर्जी का समर्थन किया. कश्मीर घाटी में इस मुद्दे पर लोगों ने ज़ोरदार प्रदर्शन किए और हालत यह हो गई कि पूरा देश दो धड़ों में बंटा हुआ नज़र आने लगा. एक ओर कश्मीरी जनता थी तो दूसरी ओर बाक़ी देश. इस विवाद ने मृत्यु दंड के फैसले से संबंधित मुद्दों को फिर से सतह पर ला दिया. जैसे, क्या मृत्यु दंड की सजा ख़त्म कर देनी चाहिए? क्या अफजल गुरुका मामला मृत्यु दंड के मानकों और इससे संबंधित अन्य न्यायिक फैसलों पर खरा उतरता है? धारा 302 के तहत हत्या के मामलों में फांसी की सजा लोकहित में है या नहीं? क्या धारा 302 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 14 के ख़िला़फ तो नहीं है? आदि.

मृत्यु दंड की सजा समाप्त करने के लिए विधायिका के सभी प्रयास अब तक असफल रहे हैं. इस दिशा में स्वतंत्रता से पहले ही 1931 में संसद के सामने एक प्राइवेट बिल पेश किया गया था, लेकिन इंग्लैंड के तत्कालीन गृहमंत्री ने इसे मानने से इंकार कर दिया. स्वतंत्रता के बाद पहली लोकसभा के कार्यकाल में भारत सरकार ने भी ऐसे ही एक बिल को नामंजूर कर दिया था. फांसी की सजा समाप्त करने के लिए राज्यसभा में भी 1958 और 1962 में प्रयास किए गए, लेकिन थोड़ी-बहुत चर्चा के बाद इसे वापस ले लिया गया. विधि आयोग ने भी 1967 में सरकार और 1971 में लोकसभा में पेश अपनी रिपोर्टों में मृत्यु दंड के प्रावधान को बनाए रखने की अनुशंसा की. और, यह भी कहा कि कार्यपालिका (राष्ट्रपति) के पास मा़फी का अधिकार बरक़रार रहना चाहिए.

सर्वोच्च न्यायालय ने जगमोहन बनाम उत्तर प्रदेश मामले में धारा 302 की वैधानिकता पर विचार किया. उसने भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों सहित अन्य देशों में मौजूद परिस्थितियों, भारतीय अपराध क़ानून की संरचना, न्यायिक विवेक के इस्तेमाल की सीमा जैसे मुद्दों पर सभी संबंधित पक्षों पर जमकर विचार-विमर्श किया. आख़िर में शीर्ष न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मृत्यु दंड का प्रावधान न केवल जघन्य अपराधों को रोकने में निवारक का काम करता है, बल्कि समाज द्वारा ऐसे अपराधों की तीव्र मु़खाल़फत का सूचक भी है. एक ऐसे समाज में, जहां हत्या जैसे अपराधों को पाशविक और क्रूर माना जाता है. पश्चिमी देशों में मौजूद प्रावधानों को भारत में लागू करने की संभावना को इस आधार पर नकार दिया गया कि दोनों की सामाजिक हालत और लोगों की समझ के स्तर में ज़मीन-आसमान का फर्क़ है. अदालत ने विधि आयोग की 25वीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत फांसी की सजा ख़त्म करने का ख़तरा उठाने की हालत में नहीं है. निचली अदालतों से ऐसे फैसले सुनाने में हुई चूक को उच्चस्तरीय अदालतों में अपील कर सुधारा जा सकता है, सर्वोच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर भी अपना भरोसा बनाए रखा.

फांसी की सजा सुनाने के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का रवैया सावधानी भरा और प्रतिबंधात्मक रहा है, जो आधुनिक न्याय व्यवस्था के उदारवादी रवैये से मेल खाता है. शीर्ष अदालत द्वारा संगीनतम अपराधों और अपवाद की विचारधारा न्याय व्यवस्था के मानवीय पहलू को उजागर करती है. ऐसे कई मामले हैं, जिनमें अदालत ने इस श्रेणी में आने वाले अपराधों की हालत में भी आरोपी को मृत्यु दंड देने से इंकार कर दिया है.

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