नर्मदा घाटी में कभी उड़ते थे डायनासोर

धरती का सबसे प्राचीन अतिविशालकाय जीव डायनासोर, जीव विज्ञानियों और धरती के इतिहासकारों के लिए रहस्यमय प्रजाति बना हुआ है. लगभग 6 से साढ़े 6 करोड़ साल पहले धरती पर विचरण करने वाले इन जीवों को लेकर सदियों से जीव विज्ञानी और प्राणी शास्त्री अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन यह अध्ययन आज तक पूरा नहीं हुआ है, क्योंकि दुनिया में जब तब डायनासोर के जीवाश्म मिलने से इस जीव के बारे में नये रहस्यों का खुलासा होने लगता है.

अब तक उड़ने वाले डायनासोर केवल कल्पना में ही रहे हैं, लेकिन हाल ही मध्य प्रदेश में नर्मदा घाटी के मध्य क्षेत्र में उड़ने वाले डायनासोर के जीवाश्म मिलने से यह कल्पना साकार रूप लेने लगी है कि कभी धरती और आकाश पर विशालकाय डायनासोर का एकछत्र साम्राज्य था.

अब तक उड़ने वाले डायनासोर केवल कल्पना में ही रहे हैं, लेकिन हाल ही मध्य प्रदेश में नर्मदा घाटी के मध्य क्षेत्र में उड़ने वाले डायनासोर के जीवाश्म मिलने से यह कल्पना साकार रूप लेने लगी है कि कभी धरती और आकाश पर विशालकाय डायनासोर का एकछत्र साम्राज्य था. डायनासोर के जीवाश्मों की खोज के इतिहास में मध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. मध्य प्रदेश में अंग्रेजों का शासन स्थापित होने के बाद पश्चिमी वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के खोज अभियान चलाए. इन अभियानों में स्थानीय जनता के अलावा भारतीय वैज्ञानिकों ने भी गहरी रूचि ली और पश्चिमी वैज्ञानिकों की भरपूर सहायता की. इन्हीं अभियानों के तहत 20वीं सदी के प्रारंभ में मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले में लमेटा चट्‌टानों के बीच प्राप्त एक संपूर्ण डायनासोर के अस्थियों के ढांचे की खोज ने डायनासोर अध्ययन को एक नई दिशा दी है.

जानकारों का कहना है कि बालाघाट में प्राप्त डायनासोर के ढांचे को पश्चिमी विद्बानों ने इंगलैंड भेज दिया और आज इंगलैंड के राष्ट्रीय संग्रहालय में डायनासोर का जो ढांचा हैं, वह मध्य प्रदेश की ही अनमोल देन है.

1930 में प्रो. लीडेकर ने मध्य भारत के क्षेत्र में अनेक स्थानों पर डायनासोर के अवशेषों की खोज करने के बाद दुनिया को यह बताने का प्रयास किया कि विश्व का प्राचीनतम प्राकृतिक जुरासिक पार्क मध्यभारत में ही था. इसके बाद यह क्षेत्र अमेरिका और यूरोप के जीव वैज्ञानिकों की खोज का मुख्य केंद्र बन गया. कई खोजकर्ताओं को समय-समय पर मध्य भारत के नर्मदा घाटी क्षेत्र से डायनासोर के विभिन्न अंगों की हडि्‌डयां मिलीं, जबड़े मिले, तो अंडे भी बड़ी मात्रा में मिले. पिछले वर्ष धार ज़िले में स्थानीय खोजकर्ताओं को सैकड़ों की संख्या में डायनासोर के अंडे मिलने से एक बार फिर यह क्षेत्र चर्चा में आ गया.

सदियों से चल रहे डायनासोर खोज अभियान की कड़ी में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के खोजकर्ताओं ने प्राप्त की है.

हाल ही में मध्य प्रदेश के मध्य नर्मदाघाटी क्षेत्र में विशालकाय उड़ने वाले डायनासोर प्राणियों के जीवाश्म खोजने का दावा पुरातत्ववेत्ताओं और वनस्पतिशास्त्र के विद्वानों ने किया है. पुरातत्वविद् वसीम खान, नर्मदा महाविद्यालय होशंगाबाद के वनस्पति विभाग के अध्यक्ष डॉ. केडब्ल्यू शाह और रवि उपाध्याय ने इस बारे में बताया कि होशंगाबाद से उत्तर में रायसेन ज़िले की देवरी तहसील के ग्राम पतई के पास नर्मदा के सिद्ध घाट के किनारे दो किलोमीटर लंबे क्षेत्र में जुरासिककाल के जीवाश्म बड़ी मात्रा में पाए गए हैं. इन जीवाश्मों में बड़ी-बड़ी हडि्‌डयां, अंडों के छिलके, डायनासोर के पंख, पंजे और ना़खून आदि मिले हैं, जो अब पत्थर के रूप में तब्दील हो चुके हैं.

नर्मदा घाटी में प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज में जुटी सिदरा आर्कियोलाजी इन्वॉयरमेन्ट रिसर्च, ट्रायव वेलफेयर सोसाइटी के पुरातत्वविद् एवं वनस्पति शास्त्रियों ने मिलकर करोड़ों वर्ष पुराने ये जीवाश्म खोज निकाले हैं. सोसाइटी के पुरातत्वविद् मुहम्मद वसीम ़खान का मानना है कि नर्मदा घाटी का यह स्थान डायनासोर की विभिन्न प्रजातियों का पसंदीदा स्थान रहा होगा. यहां का़फी मात्रा में अंडों के शल्क, हडि्‌डयों के जीवाश्मों के समूह मिले हैं. पुरातत्वविद् वसीम ़खान, नर्मदा कॉलेज के वनस्पतिशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. के डब्ल्यू शाह व प्रो. डॉ. रवि उपाध्याय के मुताबिक़ यहां जुरासिक काल के जीवाश्म होने की पुष्टि इससे होती है कि इन जीवाश्मों के पास ही उस समय की सायकास समूह के वृक्षों के तने व कोन के जीवाश्म भी मिले हैं. अगर इन सभी अवशेषों पर विधिवत रिसर्च की जाए तो इस प्रजाति से जु़डे कई रहस्यों से पर्दा खुल सकता है.

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