चुनावी साल होने के कारण रोहतास ज़िले के सासाराम विधानसभा क्षेत्र में का़फी चहलपहल दिख रही है. इसका कारण परिसीमन है. नए परिसीमन से कुशवाहा बहुल इस विधानसभा क्षेत्र की तस्वीर बदलने लगी है. बात चाहे जातीय समीकरणों की हो या मुद्दों की, धीरे-धीरे स्थितियां बदल रही हैं. नए परिसीमन से ग़ैर कुशवाहा उम्मीदवारों को भी उम्मीद की किरणें दिखाई दे रही हैं. ज़िला मुख्यालय सासाराम के सभी 40 नगर परिषद क्षेत्रों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, यह कहना मुश्किल है. फिलहाल परिदृश्य चाहे जो भी हो, लेकिन वर्तमान विधायक, पूर्व विधायक एवं नए दावेदारों की बेचैनी इस नए विधानसभा क्षेत्र में कुछ ज़्यादा ही दिख रही है.
बात बसपा की करें तो सासाराम के पूर्व प्रखंड प्रमुख के के सिंह ताल ठोककर कहते हैं कि किसी भी क़ीमत पर बसपा के बैनर तले उन्हें सासाराम से चुनाव लड़ना है, क्योंकि क्षेत्र के दलितों के लिए वह अपना का़फी समय गुज़ार चुके हैं और समीकरण के लिहाज़ से राजपूतों के मतों का ध्रुवीकरण उनकी तऱफ हो सकता है.
बात सत्ताधारी गठबंधन के घटक दल भाजपा से शुरू करना न्यायोचित है, जिसका पिछले कई चुनावों से इस सीट पर क़ब्ज़ा रहा है और वर्तमान में भी यहां भाजपा विधायक के रूप में जवाहर प्रसाद अपनी लोकप्रियता बढ़ाने में जुटे हैं. खासकर, परिसीमन के बाद सासाराम प्रखंड के उत्तरी हिस्से से जुड़े दर्ज़नों गांवों में तो उनका दौरा काफी त़ेज हो गया है. पूछने पर वह बताते हैं कि नए परिसीमन ने उनकी राहें और भी आसान कर दी हैं, क्योंकि पूर्व में यह गांव नोखा विधानसभा क्षेत्र का अंग था, जो भाजपा का गढ़ था. वैसे प्रसाद की बातों में कुछ दम भी दिखता है, लेकिन उन्हीं के गांव के मतदाताओं का हवाला देकर राजद के पूर्व विधायक एवं संभावित उम्मीदवार डॉ. अशोक कहते हैं कि इस गांव में रहने वाले मतदाता अगड़ी जाति से आते हैं, जिनका मोह वर्तमान राज्य सरकार एवं राजग गठबंधन से भंग हो चुका है. उनका दावा है कि नोखा से अलग हुए और सासाराम में जुड़े उत्तरी क्षेत्र के मतदाता राजद के जनाधार को ब़ढाएंगे, क्योंकि इन गांवों के ज़्यादातर मतदाता राजग गठबंधन के विरोधी हैं. यह कहना अतिशयोक्ति भी नहीं है कि कुशवाहा बहुल इस विधानसभा क्षेत्र में परिसीमन के बाद जुड़े गांवों में अगड़ी जाति के राजपूत एवं ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या बढ़ी है, जिनका समर्थन पूर्व में एक हद तक नोखा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को मिलता रहा है. अगर यह आधार सत्य है तो आने वाले दिनों में भी पूर्व की कहानी दोहराई जाएगी, लेकिन कांग्रेस द्वारा यहां सशक्त उम्मीदवार देने की तैयारी राजग गठबंधन को मुश्किल में डाल सकती है. हालांकि अभी चर्चा लोकसभा अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय सांसद मीरा कुमार के देवर राज शेखर के नाम पर ज़्यादा चल रही है, लेकिन आने वाले दिनों में ऐन वक्त पर गैर कुशवाहा समीकरणों का ख्याल रखकर पार्टी ने अगर किसी अल्पसंख्यक, राजपूत या ब्राह्मण को अपना उम्मीदवार बना दिया तो हैरानी भी नहीं होगी. यह देखते हुए कई दावेदार सामने आ सकते हैं, जिनमें ज़िला परिषद के उपाध्यक्ष सलामत अंसारी से लेकर अन्य कई नाम चर्चा में हैं. बताते चलें कि सलामत अंसारी ने फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में लोजपा उम्मीदवार के रूप में सासाराम विधानसभा क्षेत्र से लगभग 22 हज़ार मत प्राप्त किए थे. सासाराम से पूर्व ज़िलाध्यक्ष शीला सिंह भी कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चर्चा पा रही हैं, जो गत विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के रूप में डेहरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुकी हैं. लोजपा खेमे से भी कभी-कभी यह बात राजनीतिक हलके में छनकर आती है कि यहां से राजद के बदले लोजपा के उम्मीदवार को चुनाव लड़ाया जाएगा, जिसमें अब्दुल सत्तार सहित कई उम्मीदवार अभी से हाथ-पांव मार रहे हैं. बात बसपा की करें तो सासाराम के पूर्व प्रखंड प्रमुख के के सिंह ताल ठोककर कहते हैं कि किसी भी क़ीमत पर बसपा के बैनर तले उन्हें सासाराम से चुनाव लड़ना है, क्योंकि क्षेत्र के दलितों के लिए वह अपना का़फी समय गुज़ार चुके हैं और समीकरण के लिहाज़ से राजपूतों के मतों का ध्रुवीकरण उनकी तऱफ हो सकता है. इधर चेनारी के युवा नेता गुलाम सरवर भी हाथी की सवारी करने की तैयारी में हैं. वह अपनी पैठ मायावती के सबसे क़रीबी खेमे में बताते हुए कहते हैं कि उन्हें टिकट मिलना लगभग तय है, क्योंकि बसपा उम्मीदवार के रूप में सासाराम सीट ही अल्पसंख्यकों के कोटे में है.
बसपा के उम्मीदवारों की फेहरिस्त और भी लंबी होती जा रही है, जबकि कांग्रेस में भी कई नामों पर चर्चा बढ़ी है. सपा के ज़िलाध्यक्ष मदन मोहन श्रीवास्तव भी सासाराम से ही उम्मीदवारी जताने में जुटे हैं. वह कहते हैं कि अगर गठबंधन भंग हुआ तो इस बार पार्टी सासाराम से एक सशक्त उम्मीदवार देगी. हालांकि उनके समर्थकों ने उन्हीं के नाम की चर्चा बतौर उम्मीदवार शुरू की है. सासाराम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव कौन लड़ेगा, जीत किसकी होगी, यह तो बाद में पता चलेगा. फिलहाल यहां के संभावित उम्मीदवारों पर नज़र दौड़ाएं तो यह कहा जा सकता है कि यहां चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संख्या दो दर्ज़न तक पहुंच गई है. नए परिसीमन में सत्ताधारी गठबंधन की राहें कठिन भी हैं, क्योंकि अगड़ी जाति के मतदाताओं की संख्या में कम से कम 15 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो चुकी है.
नए परिसीमन से किसको फायदा और किसको घटा होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा. फिलहाल सभी उम्मीदवार फायदा उठाने के चक्कर में जी-जान से जुटे हैं. वे अभी से ही अपनी ज़मीन तैयार कर रहे हैं, क्षेत्र में घूम रहे हैं और लोगों को अपनी तऱफ आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का रुझान उनकी तऱफ हो.
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