सांप्रदायिक हिंसा विधेयक रोग से बदतर इसका इलाज है


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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकार को संसद के बजट सत्र में सांप्रदायिक हिंसा विधेयक प्रस्तुत करने की मंज़ूरी दे दी है. इस विधेयक का मूल प्रारूप सन्‌ 2005 में तैयार हुआ था. सन्‌ 2002 के गुजरात क़त्लेआम में भाजपा सरकार व नरेंद्र मोदी की भूमिका से नाराज़ मुसलमानों ने 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस को बड़े पैमाने पर अपना समर्थन दिया, जिसके कारण एन.डी.ए गठबंधन को धूल चाटनी पड़ी.

विमर्श के प्रतिभागियों को तो बिल में दी गई सांप्रदायिक हिंसा की परिभाषा भी अपूर्ण व ग़लत लगी. विमर्श ने यह स़िफारिश भी की कि सांप्रदायिक हिंसा की परिभाषा क्या होनी चाहिए. विमर्श ने किसी ख़ास इलाक़े को सांप्रदायिक गड़बड़ी वाला क्षेत्र घोषित करने संबंधी प्रावधान पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाए.

कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणापत्र में वायदा किया था कि अपनी सरकार बनने पर गुजरात में हुए अल्पसंख्यकों के क़त्लेआम जैसी घटनाओं को रोकने के लिए वह एक नया क़ानून बनाएगी. इस क़ानून का मसौदा भी सरकार ने तैयार किया. इस मसौदे का हमारे सेंटर सहित कई ग़ैर-सरकारी संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और क़ानून विशेषज्ञों ने अध्ययन किया था और इसमें कई कमियां पाई थीं. हमने बिल के मसौदे पर कई चर्चाएं और संगोष्ठियां भी आयोजित की थीं और मसौदे में कई ऐसे संशोधन सुझाए थे, जिनसे वह इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल हो सकता था, जिनके लिए इसे बनाने की चर्चा है. तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने भी इस विधेयक पर कई शहरों में विचार-विमर्श किया था और यह आश्वासन दिया था कि ग़ैर सरकारी संगठनों व अन्य संस्थाओं द्वारा विधेयक में संशोधन के लिए दिए गए सुझावों पर विचार किया जाएगा. परंतु इस विधेयक का अंतिम मसौदा तैयार करते समय हमारे  सुझावों को कोई महत्व नहीं दिया गया.

विधेयक का वर्तमान मसौदा, जिसे संसद की स्थायी समिति व कैबिनेट ने स्वीकृति दे दी है, मूल प्रारूप से ज़रा भी बेहतर नहीं है. सरकार की असली मंशा क्या है, यह हमारी समझ से परे है. इसीलिए हमने कहा कि इलाज, रोग से बदतर ही हो गया है.

सबसे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि वर्तमान विधेयक पुलिस को और अधिक शक्तियां देता है. जहां तक सांप्रदायिक हिंसा का सवाल है, अपने यहां की पुलिस, समस्या ज़्यादा है और समाधान कम. अगर हमारे देश की पुलिस निष्पक्ष होती तो शायद ही कोई सांप्रदायिक दंगा 24 घंटे से अधिक अवधि तक चल पाता. जो सरकारें दंगों को सचमुच रोकना चाहती हैं, उन्हें पुलिस के शीर्ष नेतृत्व से इतना भर कहना होता है कि अगर 24 घंटे में दंगे बंद नहीं हुए तो संबंधित पुलिसवालों के ख़िला़फ सख्त कार्यवाही की जाएगी, और दंगे रुक जाते हैं.

जिन लोगों ने भी सांप्रदायिक दंगों का अध्ययन किया है, वह यह अच्छी तरह से जानते हैं कि दंगों के दौरान पुलिस की क्या भूमिका रहती है. वह मूकदर्शक बनी रहती है या दंगों में भाग लेती है. गुजरात व कंधमाल, दो ऐसे हालिया उदाहरण हैं जबकि पुलिस चाहती तो जल्दी ही हिंसा बंद हो सकती थी. सभी बड़े दंगों में पुलिस की भूमिका पक्षपातपूर्ण रही है. कई मामलों में तो पुलिस ने दंगाईयों का नेतृत्व तक किया है. अगर पुलिस को और ताक़तवर बनाया गया- जैसा कि वर्तमान विधेयक करने जा रहा है- तो इसके नतीजे भयावह होंगे. असल में पुलिस नहीं, दंगा पीड़ितों को और शक्तियां दिए जाने की ज़रूरत है. नई दिल्ली में अनहद, सीएसएसएस और कई अन्य संगठनों के संयुक्त तत्वाधान में 12-13 फरवरी 2010 को इस विधेयक पर आयोजित वृहत विमर्श में विधेयक के वर्तमान प्रारूप को सिरे से ख़ारिज कर दिया गया.

इस विधेयक में प्रावधान है कि अगर किसी क्षेत्र में दंगे नियंत्रित नहीं होते तो उसे अशांत क्षेत्र घोषित किया जा सकेगा. यह तो पुलिस को असीमित शक्तियां देने जैसा ऐसा देखा गया है कि कर्फ्यू के दौरान भी उसे अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्रों में अधिक कड़ाई से लागू किया जाता है जबकि बहुसंख्यक मोहल्लों में यह नाममात्र के लिए लागू किया जाता है. उत्तर प्रदेश के एक पूर्व शीर्ष पुलिस अधिकारी विभूति नारायण सिंह का उपन्यास शहर में कर्फ्यू और उनकी अन्य कई रचनाएं इस स्थिति को अत्यंत सारगर्भित तरीक़े से सामने लाती हैं.

किसी क्षेत्र को उपद्रवग्रस्त या अशांत क्षेत्र घोषित करने के बाद, पुलिस को इस क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को गोली मारने का अधिकार होगा. कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में उपद्रवग्रस्त क्षेत्र अधिनियम को रद्द करने की मांग समय-समय पर उठती रही है. किसी क्षेत्र को अशांत घोषित करने से हिंसा पीड़ितों को कोई राहत तो मिलती नहीं है, उल्टे वे स्वयं को असहाय अनुभव करने लगते हैं. जिन लोगों को मानवाधिकारों की रक्षा की तनिक भी चिंता है, वे पुलिस को और अधिक अधिकार देने का समर्थन तब तक नहीं कर सकते जब तक कि पुलिस को उसकी कार्यवाहियों के लिए ज़िम्मेदार न बनाया जाए.

समस्या यह है कि अन्य कई क़ानूनों की तरह, इस प्रस्तावित क़ानून में भी प्रशासन, पुलिस या राजनेताओं को, दंगों पर नियंत्रण करने में असफलता के लिए, ज़िम्मेदार ठहराने का कोई प्रावधान नहीं है. मानवाधिकार कार्यकर्ता लगातार यह कहते रहे हैं कि वर्तमान क़ानूनों को ही यदि ईमानदारी और निष्पक्षता से लागू किया जाए तो वे किसी भी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त हैं. किसी नए क़ानून की ज़रूरत ही नहीं है. उनका कहना शायद सही भी है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार और बिहार की आर.जे.डी. सरकार ने वर्तमान क़ानूनों के बल पर ही अपने-अपने राज्यों में क्रमश: तीस साल और पंद्रह साल तक सांप्रदायिक हिंसा नहीं होने दी, जबकि सांप्रदायिक हिंसा के मामले में इन दोनों राज्यों का इतिहास बेदाग नहीं रहा है.

अगर राज्य सरकारें मात्र इतना करें कि घृणा फैलाने वाले या उत्तेजक भाषण देने वाले नेताओं के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए के अंतर्गत त्वरित कार्यवाही कर ऐसे तत्वों को सीखचों के पीछे डाल दें तो इस एक क़दम से ही सांप्रदायिक हिंसा रुक जाएगी. कोई राजनेता तीन साल के लिए जेल जाना नहीं चाहेगा. लेकिन हमारे देश में ऐसा कम ही होता है. मेरा अनुभव यह है कि सन्‌ 1961 के जबलपुर दंगों से लेकर 2008 के कंधमाल दंगों तक, एक भी राजनीतिज्ञ को सांप्रदायिक घृणा फैलाने के लिए गिरफ़्तार नहीं किया गया.

इसके अलावा, दंगा पीड़ितों को राहत व पुनर्वास तथा इन्हें मुआवज़ा देने के बारे में कोई मानक या नियम नहीं है. सब कुछ मुख्यमंत्रियों की मर्जी पर निर्भर करता है. नरेंद्र मोदी सरकार ने पूरी तरह से और आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मकानों के लिए क्रमश: रुपये 500 व रुपये 300 के हास्यास्पद मुआवज़े की घोषणा की थी और सभी अनुरोधों को दरकिनार करते हुए, राहत शिविरों को बहुत जल्दी बंद कर दिया था. तब तक, पीड़ितों के स्थायी पुनर्वास का कोई प्रबंध नहीं हो सका था. बाद में कुछ निजी संस्थाओं ने आगे आकर राहत शिविरों को चलाने की ज़िम्मेदारी ली.

वर्तमान विधेयक में यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रावधान नहीं है कि दंगों के दौरान हुई हिंसा की ठीक से जांच हो, एफ.आई.आर दर्ज़ किया जाए और दोषियों के ख़िला़फ मुक़दमे चलाकर उन्हें सजा दिलाई जा सके. यह शिक़ायत आम है कि पुलिस या तो एफ.आई.आर. दर्ज़ ही नहीं करती या इसमें असली दोषियों को आरोपी नहीं बनाती. जांच प्रक्रिया इतनी ढीली होती है और इतने कमज़ोर मुक़दमे दायर किए जाते हैं कि अदालतों के पास आरोपियों को बरी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.

अधिकांश मामले पुलिस इस बहाने से बंद कर देती है कि आरोपियों के ख़िला़फ पर्याप्त सबूत नहीं हैं. गुजरात पुलिस ने इसी आधार पर सैकड़ों मामले बंद कर दिए थे जिन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर फिर से खोला गया. यद्यपि इस नए क़ानून का घोषित उद्देश्य दंगा पीड़ितों की मदद करना है, तथापि इसमें दंगों के दोषियों को सजा दिलवाने के लिए कोई प्रावधान नहीं है.

स्पष्टत: संसद में प्रस्तुत किए जाने के पूर्व, इस विधेयक में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है. अगर सरकार ये परिवर्तन स्वयं नहीं करती तो संसद सदस्यों को चाहिए कि वे बिल का सावधानीपूर्वक गहन अध्ययन करें और सरकार को बिल में ज़रूरी संशोधन करने पर मजबूर करें. बिल पर दिल्ली में आयोजित विमर्श में भाग लेने वालों ने यह महसूस किया कि सरकार द्वारा प्रस्तावित सभी 59 संशोधन अत्यंत सतही हैं.

विमर्श के प्रतिभागियों की स्पष्ट राय थी कि प्रस्तावित संशोधनों से बिल के मूल ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं आएगा. और यह भी कि सरकार ने इन सुझावों में से एक को भी संशोधनों में शामिल नहीं किया है.

विमर्श के प्रतिभागियों को तो बिल में दी गई सांप्रदायिक हिंसा की परिभाषा भी अपूर्ण व ग़लत लगी. विमर्श ने यह स़िफारिश भी की कि सांप्रदायिक हिंसा की परिभाषा क्या होनी चाहिए. विमर्श ने किसी ख़ास इलाक़े को सांप्रदायिक गड़बड़ी वाला क्षेत्र घोषित करने संबंधी प्रावधान पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाए. कई अन्य संशोधनों के साथ विमर्श इस नतीजे पर पहुंचा कि अपराधों और गड़बड़ी वाले क्षेत्र के बीच कोई संबंध होने की बात ग़लत, ख़तरनाक और अस्वीकार्य है.

विमर्श में आम राय थी कि विभिन्न अपराधों के लिए सज़ा की अवधि को दो गुना करने के प्रावधान का न्यायालय कम ही इस्तेमाल करेंगे और इसकी जगह अन्य प्रकार की सजाओं का प्रावधान किया जाना चाहिए. इनमें चुनाव लड़ने व किसी सार्वजनिक पद पर नियुक्ति पर प्रतिबंध शामिल हो सकता है. हमें यह बात ध्यान में रखना होगा कि दंगे कहीं भी हों, राजनीतिक दलों के नेताओं या कार्यकर्ताओं की उसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संलिप्तता होती है. इस तरह की सजाओं के प्रावधान से उन लोगों पर वांछित प्रभाव पड़ेगा जो सार्वजनिक  पदों पर आसीन रहते हुए सांप्रदायिक हिंसा रोकने के अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं.

इस तरह की सजा के प्रभावी होने का एक अच्छा उदाहरण है सन्‌ 1990 के दशक के अंत में मुंबई हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सुरेश द्वारा दिया गया एक निर्णय. हाई कोर्ट ने शिवसेना नेता बाल ठाकरे को विले पार्ले क्षेत्र के शिवसेना उम्मीदवार को जिताने के लिए उत्तेजक भाषण देने का दोषी पाया था और उन्हें छ: साल तक चुनाव लड़ने, वोट देने व अपनी पार्टी का प्रचार करने के अधिकार से वंचित कर दिया था.

इस निर्णय का ठाकरे पर असर पड़ा. इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर राजनेताओं को इस तरह की सजाएं दी जाएं, तो वे सांप्रदायिक हिंसा भड़काकर चुनाव जीतने की कोशिश नहीं करेंगे. अधिकांश राजनेता विचारधारात्मक कारणों से सांप्रदायिक हिंसा नहीं भड़काते. वे तो हिंसा इसीलिए भड़काते हैं ताकि मतदाताओं का धु्रवीकरण कर चुनाव जीत सकें.

यहां हमारे देश में चुनाव सुधारों की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करना प्रासंगिक होगा. भारत जैसे धार्मिक, भाषाई व सांस्कृतिक विविधताओं वाले देश के लिए वर्तमान चुनाव पद्धति, जिसे हमने इंग्लैंड की नक़ल में अपना लिया है, कतई उपयुक्त नहीं है. वर्तमान में जिस भी उम्मीदवार को सबसे अधिक मत मिलते हैं वह विजयी घोषित कर दिया जाता है, फिर चाहे उसे कुल मतदाताओं के मात्र दस या पंद्रह प्रतिशत का सर्मथन ही क्यों न मिला हो. इसके स्थान पर हमें या तो समानुपातिक प्रणाली अपनानी चाहिए या यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि विजय के लिए किसी उम्मीदवार को कम से कम 51 प्रतिशत मत प्राप्त करने होंगे. इससे राजनेताओं के लिए किसी वर्ग विशेष को अलग या नज़रअंदाज करके चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा.

इस विधेयक में व्यापक संशोधन किए बग़ैर यह दंगा पीड़ितों को राहत देने के अपने उद्देश्य में सफल भी नहीं होगा.

(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्‍युलरिज्‍म के संयोजक हैं)


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