क़र्ज़ न मिलने से उद्योग ठप्प
मध्य प्रदेश सरकार की इंडस्ट्री फे्रंडली नीति कितनी बोगस है, इसका पता इसी से चलता है कि लघु और मध्यम उद्योगों को बैंकों से ऋण उपलब्ध कराने में राज्य सरकार का वित्त निगम सफल नहीं हो पा रहा है. जानकारी के अनुसार, राज्य में वित्त निगम द्वारा 337 उद्योगों के लिए 230 करोड़ रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया था, लेकिन उद्योगों को केवल 161 करोड़ रुपये ही मिल सके. राष्ट्रीयकृत बैंकों ने वित्त निगम की स़िफारिश और पहल के बावजूद उद्योगों को ऋण नहीं दिया. इस कारण 50 प्रतिशत उद्योग स्थापना से पहले ही ठप्प हो गए. यह स्थिति अचानक निर्मित नहीं हुई है. वर्ष 2007-08 में 168 करोड़ रुपये के ऋण की तुलना में उद्योगों को केवल 97 करोड़ रुपये और वर्ष 2008-09 में 230 करोड़ रुपये के स्वीकृत ऋृण की तुलना में केवल 168 करोड़ रुपये ही मिले. उद्योगपतियों ने इस बारे में राज्य सरकार के उच्चाधिकारियों से भी बात की है, लेकिन राष्ट्रीयकृत बैंकों पर राज्य सरकार का कोई असर नहीं पड़ा है.
सबसे ज़्यादा महंगी ज़मीन भोपाल में
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आवासीय और व्यवसायिक भूमि की क़ीमतें मुंबई, दिल्ली, चेन्नई एवं कोलकाता जैसे महानगरों की तुलना में कहीं ज़्यादा हैं. भूमि की क़ीमत बढ़ाने में भूमाफिया और संपत्ति के कारोबारी सटोरिए ही सक्रिय नहीं हैं, बल्कि सरकार भी बिना सोचे- समझे भोपाल के विभिन्न क्षेत्रों में भूमि की क़ीमत अनाप-शनाप तरीक़े से तय कर रही है. वर्ष 2008-09 में भोपाल के न्यू मार्केट, मालवीय नगर क्षेत्र में व्यवसायिक उपयोग की भूमि की क़ीमत सरकार ने 67500 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय की थी. सरकार भूमि की क़ीमत पंजीयन शुल्क पाने के लिए तय करती है. इसके पीछे उसकी मंशा यह है कि अक़्सर भूमि के क्रेता-विक्रेता बाज़ार मूल्य से कम दाम पर सौदा करके काली कमाई करते हैं और काले धन के कारोबार को बढ़ाते हैं. इसके अलावा सरकारी पंजीयन शुल्क की भी चोरी करते हैं. अत: सरकार भूमि के दाम तय करके उसी दाम पर पंजीयन करती है, लेकिन इससे भूमि के बाज़ार मूल्य तेजी से बढ़ने लगे हैं और अब भोपाल में आम आदमी के लिए मकान खरीदना असंभव होने लगा है. जानकारों का कहना है कि न्यू मार्केट मालवीय नगर और उसके आसपास के क्षेत्रों में अब एक वर्ग मीटर भूमि की कीमत 72000 रुपये तक हो जाएगी और व्यवसायिक भूमि के दाम एक लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर हो जाएंगे. मजे की बात यह है कि जब ज़िला कलेक्टर एवं ज़िला पंजीयक भूमि के दाम तय कर रहे थे, तब जनप्रतिनिधियों ने कोई आपत्ति नहीं की. अब जनता से आपत्तियां मांगी जा रही हैं.
पूर्व गृहमंत्री की दादागिरी
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राज्य के पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी अपात्र होते हुए भी पिछले एक वर्ष से सरकारी निवास पर क़ब्ज़ा किए हुए हैं. उन्हें जब क़ब्ज़ा छोड़ने के लिए कहा गया तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया. अंत में सरकार को उनके बंगले पर ताला लगाना पड़ा. हिम्मत कोठारी पिछली सरकार में मंत्रिमंडल के सदस्य थे और गृहमंत्री के नाते उन्हें नए भोपाल के 74 बंगला क्षेत्र में बी-28 नंबर का बंगला आवंटित था. मंत्री के रूप में वह पूरे समय इस बंगले में सपरिवार रहे, लेकिन दिसंबर 2008 में विधानसभा चुनाव में पराजित हो जाने के बाद कोठारी न तो विधानसभा सदस्य रहे और न ही मंत्री. इस कारण उनकी इस सरकारी निवास में रहने की पात्रता समाप्त हो गई थी. राज्य के लोक निर्माण विभाग ने हिम्मत कोठारी को बंगला खाली करने के लिए कई बार नोटिस दिया, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया. अंत में गृहमंत्री के बंगले पर सरकार ने ताला लगाकर उसे सील कर दिया है. इसके बाद हिम्मत कोठारी इस बंगले में घुसने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे. बताते हैं कि कोठारी ने मौखिक रूप से सरकार के कुछ मंत्रियों से कहा था कि उनका अपना मकान बन रहा है और जब वह रहने योग्य हो जाएगा तो वह खुद यह सरकारी बंगला खाली कर देंगे, लेकिन इस तर्क को सरकारी अफसरों ने नहीं सुना और बंगला सील करके अ़खबारों में खबर भी छपवा दी.
कमी के बावजूद बिजली बेची
मध्य प्रदेश पिछले कई वर्षों से बिजली संकट झेल रहा है. मुख्यमंत्री और सरकार के तमाम नेता जब-तब बिजली संकट के नाम पर आंसू बहाते रहते हैं, लेकिन बिजली की कमी होते हुए भी सरकार ने दूसरे राज्यों को बिजली बेचकर कमाई की. इसका खुलासा राज्य सरकार ने ही किया है. विधानसभा में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि वर्ष 2007-08 में मध्य प्रदेश ने 20520 मिलियन यूनिट बिजली अन्य राज्यों को बेची और उसके बाद के वर्ष में बिजली बेचने के कारोबार में 2.1 प्रतिशत का इज़ाफा किया. इसी आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि बिजली की कमी के कारण राज्य में कृषि क्षेत्र को दिक्कतें हुईं. विशेषकर गन्ने का फसल क्षेत्र घटकर 80170 हेक्टेयर रह गया.
फर्ज़ी सरकारी कर्मचारी
मध्य प्रदेश सरकार में चल रही प्रशासनिक लापरवाही का एक शानदार नमूना टीकमगढ़ में तब देखने को मिला, जब एक फर्ज़ी कर्मचारी तीन माह तक एक सरकारी विभाग में काम करता रहा और वेतन लेता रहा, लेकिन कोई उसे पकड़ नहीं पाया. जानकारी के अनुसार, सतना से सुनील कुमार पाल नामक कर्मचारी ट्रांसफर होकर टीकमगढ़ के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में हेल्पर के रूप में आया था. वह तीन माह तक हेल्पर पद पर काम करता रहा और लगभग 7000 रुपये मासिक वेतन लेता रहा. सतना से टीकमगढ़ ट्रांसफर से संबंधित सभी ज़रूरी सरकारी दस्तावेज़ उसने ज़िले के कार्यपालन यंत्री कार्यालय में जमा कराए थे और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उसे काम पर रख लिया गया तथा उसका वेतन भी निकाला जाने लगा. तीन माह तक सब कुछ आराम से चलता रहा. अचानक एक दिन दतिया से किसी ने टेलीफोन पर बताया कि टीकमगढ़ में काम कर रहा सुनील कुमार पाल सरकारी कर्मचारी नहीं है, क्योंकि सतना में हेल्पर पद पर विभाग में इस नाम का कोई कर्मचारी न तो काम करता था और न ही काम करता है. फोन करने वाले ने यह भी बताया कि सुनील के सभी दस्तावेज़ फर्ज़ी हैं. इसकी जानकारी कार्यपालन यंत्री एम एल गौड़िया को दी गई, तब उनकी आंख खुली और उन्होंने सुनील कुमार पाल के दस्तावेज़ों की गहराई से जांच-परख की तो मालूम हुआ कि ये सब फर्ज़ी हैं. इसके बाद उन्होंने मामला पुलिस के सुपुर्द कर दिया.
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