गोरखा जन मुक्ति मोर्चे के मुखिया विमल गुरुंग अपने आंदोलन को गांधीवादी करार देते हैं, पर ज़रूरत पड़ने पर वह सुभाषपंथी होने में देर नहीं करते. ऐसा एक बार नहीं, बार-बार दिखा है. पहाड़ पर चलने वाले वाहनों में गोरखालैंड की नंबर प्लेट लगाने, अपने इलाक़े में समानांतर पुलिस व्यवस्था बहाल करने और हाल में दार्जिलिंग में डीएम एवं तीन अनुमंडल अधिकारियों को उनके कमरों में बंद करने की हरक़तों में उनका गांधीवाद लाठीतंत्र में बदलता प्रतीत होता है. आठ फरवरी को कालिंपोंग के पास डेलो में एक जनसभा में गुरुंग ने ऐलान किया कि अगले दौर की त्रिपक्षीय वार्ता में वह ख़ुद तभी शामिल होंगे, जब केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम और राज्य सरकार की ओर से मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य शिरकत करेंगे. मालूम हो कि अब तक किसी भी त्रिपक्षीय वार्ता में गुरुंग नहीं शामिल हुए हैं. इस रैली में ही गुरुंग ने केंद्र को भेजे गए गोपनीय प्रस्ताव के बारे में खुलासा किया. त्रिपक्षीय वार्ता के एक दिन पहले वह इसकी घोषणा करेंगे. मिली जानकारी के मुताबिक़, नई परिषद का नाम गोरखालैंड स्वायत्त परिषद हो सकता है और इसमें पर्वतीय इलाक़े के विकास की कई योजनाओं का खाका रखा जाएगा. गोरखा नेताओं के मुताबिक़, यह व्यवस्था भी कुछ महीनों के लिए होगी, क्योंकि गुरुंग 2011 के विधानसभा चुनावों के पहले गोरखालैंड का गठन चाहते हैं. राज्य के नगर विकास मंत्री एवं उत्तर बंगाल के मुख्यमंत्री कहे जाने वाले अशोक भट्टाचार्य गुरुंग को फूटी आंख भी नहीं सुहाते. जनसभा में गुरुंग ने यह भी कहा कि वह उन लोगों से बात नहीं करना चाहते, ज
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