अभी भी चुनौती है डंपर कांड

मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों द्वारा विधानसभा के पटल पर रखी गई, संपत्ति संबंधी जानकारी में राज्य के वित्तीय विशेषज्ञों को असमंजस में डाल दिया है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में शिवराज सिंह चौहान और उनकी पत्नी समेत सात व्यक्तियों के ख़िला़फ जनहित याचिका ख़ारिज़ कर दी है. इसके बावजूद स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लग चुका है. प्रस्तुत किए गए उन दस्तावेजों में कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाए जाने की आशंका है.मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों द्वारा विधानसभा के पटल पर रखी गई संपत्ति संबंधी जानकारी ने राज्य के वित्तीय विशेषज्ञों को असमंजस में डाल रखा है. विधानसभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी निजी संपत्ति का ब्यौरा क्या रखा, प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई. उन्होंने बीती 23 फरवरी को स्वयं एवं पत्नी श्रीमती साधना सिंह के पास मौजूद धन, संपत्ति एवं संसाधनों का ब्यौरा प्रस्तुत किया था. उक्त घोषणा के बाद शिवराज सिंह पर डंपर कांड को लेकर लग रहे आरोप और गहरे हो गए हैं. मुख्यमंत्री के संपत्ति विवरण को कांग्रेस  संदिग्ध और अविश्वसनीय मानती है. उसने एक पृथक एजेंसी के माध्यम से जांच कराने की मांग की है.

राज्य में भुखमरी और आर्थिक तंगी छाई हुई है. मुख्यमंत्री जनता को दरकिनार कर अपना धंधा पानी जमाने में लगे हुए हैं. संपत्ति का व्यौरा और उनकी पत्नी द्वारा चलाए जा रहे ट्रेवल बिज़नेस के पीछे की कहानी सा़फ बताती है कि उन्हें प्रदेश की कितनी फिक्र है.

मुख्यमंत्री के विरुद्ध लोकायुक्त संगठन में एक निजी कंपनी जेपी सीमेंट में लगाए गए डंपरों को लेकर प्रकरण क्रमांक सीआर 41/7 दर्ज़ है. उपरोक्त प्रकरण दर्ज़ होने के बाद नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी पत्नी साधना सिंह ने मई 2006 में कर्ज़ लेकर 72 लाख रुपये में डंपर खरीदे थे, जिन्हें एक साल बाद निजी कारणों से जेपी सीमेंट रीवा को बेच दिया गया.

एक साक्षात्कार में उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनकी पत्नी कई सालों से ट्रैवल्स का बिज़नेस संचालित कर रही हैं. शिवराज ने इसी साक्षात्कार में कहा था कि आजीविका चलाने के लिए व्यवसाय करना कोई ज़ुर्म नहीं है.

उन्होंने स्वीकार किया कि व्यवसायिक तौर पर साधना सिंह को डंपर कारोबार से 16 लाख रुपये की कमाई हुई. यह बात अलग है कि साधना सिंह की कंपनी को जेपी सीमेंट ने प्रति डंपर 75 हज़ार रुपये मासिक किराया दिया, जिसमें बाद में 10 हज़ार रुपये की वृद्धि कर दी गई थी. मुख्यमंत्री द्वारा घोषित संपत्ति के विवरण में कुछ तथ्य संदिग्ध हैं. जैसे डंपर खरीद में साधना सिंह ने शिवराज सिंह चौहान के नाम को एसआर सिंह क्यों बताया, आरटीओ के पंजीयन में जेपी नगर प्लांट में निवास का ग़लत पता क्यों दिया गया, डंपर खरीद के लिए कितनी मार्ज़िन मनी दी गई और किस्तों में भुगतान कैसे किया गया?

उक्त घोषणा के बाद डंपर प्रकरण में मुख्यमंत्रीद्वारा घोषित संपत्ति में साधना सिंह द्वारा संचालित व्यवसाय में ट्रेवल्स से संबंधित आय-व्यय का ब्यौरा नहीं दिया गया है. आरटीओ की साइट से डंपर संबंधी जानकारी पूर्व में ही हटा दी गई थी. यह भी ज्ञात नहीं है कि डंपर किसे और कितने में बेचे गए. इन डंपरों को बेचने से हुई आय और डंपरों से प्रतिमाह होने वाली आय का विवरण भी संपत्ति की घोषणा से ग़ायब है. बैंक ऋृण के संदर्भ में यह जानकारी भी अज्ञात है कि विक्रय के बाद कितना ऋृण चुकाया गया और आयकर विवरणी में इसका उल्लेख किया गया है या नहीं.

नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी ने मुख्यमंत्री से वर्ष 2007 में संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने की मांग की थी. उक्त मांग के पौने तीन साल बाद मुख्यमंत्री ने संपत्ति को सार्वजनिक किया है. घोषित की गई संपत्ति में डंपर से हुई आय से संबंधित तथ्यों को छिपाए जाने का आरोप कांग्रेस प्रवक्ता के के मिश्रा पहले ही लगा चुके हैं. उनके अनुसार, लोक सेवक होने के नाते संपत्ति की  घोषणा के समय हुई इस चूक की जांच एक पृथक एजेंसी के माध्यम से किया जाना चाहिए. वर्तमान में यह प्रकरण लोकायुक्त के पास है, जिसकी विवेचना का काम जारी है. ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना कार्य से जनआस्था पर संकट पैदा होता है.

उल्लेखनीय है कि 14 मार्च 2008 को शिवराज सिंह चौहान ने पत्नी साधना सिंह के नाम पर एक एंबेसडर कार का होना बताया था. 26 मई 2006 को साधना सिंह के नाम पर चार डंपरों की खरीद का मामला सामने आया. 17 अगस्त 2007 को शिवराज सिंह ने स्वीकार किया कि साधना सिंह के नाम पर चार डंपर हैं और वह ट्रैवल व्यवसाय से जुड़ी हैं. इसके लिए 77 लाख रुपये का ऋण लेना भी उन्होंने स्वीकार किया. विधानसभा के बजट सत्र 2009-10 में घोषित आय के विवरण में डंपरों का ज़िक्र न होना ही विवाद का प्रमुख कारण बना.

मुख्यमंत्री की इस भूल को कांग्रेस एक मुद्दा बनाकर प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस के प्रवक्ता आज भी डंपर कांड और मुख्यमंत्री के आर्थिक निजी तंत्र की जांच कराए जाने की मांग कर रहे हैं, जिस पर सरकार पूरी तरह मौन है. आश्चर्य इस बात का है कि मुख्यमंत्री पर होने वाले हमलों से बचाव के लिए भाजपा का कोई भी नेता उनके पक्ष में बयान देने के लिए आगे नहीं आ रहा है.

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