बांग्‍लादेश ग्‍लोबल वार्मिंग से निबटने की तैयारी

बांग्लादेशी समाज का तक़रीबन हर तबका सरकारी तंत्र, नागरिक संस्थाएं और देश के प्रमुख विश्वविद्यालय, पर्यावरण पर मची हलचल को लेकर कौतूहल में हैं. सबकी निगाहें इसी पर टिकी हैं कि अब आगे क्या होने वाला है. इस साल की शुरुआत से ही देश भर में इस विषय पर सभा-सेमिनारों की संख्या लगातार ब़ढ रही है. हाल ही में गठित क्लाइमेट चेंज ट्रस्ट फंड से जुड़े नियम-क़ानूनों को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है जिससे इस मोर्चे पर बांग्लादेश सरकार की गंभीरता का पता चलता है.

जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली चुनौतियों के लिए तैयारी को लेकर बांग्लादेश ने भी पहल शुरू कर दी है. अचानक आई आपदाओं से निबटने के लिए सौ मिलियन डॉलर की राशि अलग रख दी गई है. इसके साथ ही, बांग्लादेश ने युनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) की प्रक्रियाओं में भी ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया है ताकि उत्सर्जन और इसे कम करने के लिए उठाए गए क़दमों से अल्पविकसित राष्ट्रों की समस्याओं को ज़्यादा मुखरता के साथ उठाया जा सके.

बांग्लादेश में अचानक ब़ढी इस जिज्ञासा और चिंता के पीछे दरअसल यह छुपा अहसास भी है कि आने वाले दिनों में पर्यावरण की रक्षा देश के भविष्य और विकास के लिए सबसे गंभीर चुनौती हो सकती है. अच्छी बात यह है कि राजनीतिक धरातल पर भिन्नताओं के बावजूद सभी दल इस बात से सहमत हैं कि मौसम प्रक्रिया में बदलाव तय है और इसके परिणाम इतने गंभीर होंगे कि बांग्लादेश इससे अछूता नहीं रह सकता. पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहे इस ग़रीब देश के लिए इलाक़ों का जलप्लावन, पानी के खारेपन में वृद्धि, नदियों के जलस्तर में लगातार अस्थिरता और विस्थापन जैसी नई समस्याओं की संभावना भी एक डरावनी सिहरन पैदा करती है. दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन में आयोजित 15वें सीओपी से मिली निराशा के बाद अब लोग 2010 में मेक्सिको में आयोजित होने वाले 16वें सीओपी की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं. उन्हें लगता है कि इस बैठक में सदस्य राष्ट्र ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर किसी ऐसे समझौते तक पहुंच सकते हैं, जो क़ानूनी रूप से बाध्यकारी हो.

इस बीच, जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली चुनौतियों के लिए तैयारी को लेकर बांग्लादेश ने भी पहल शुरू कर दी है. अचानक आई आपदाओं से निबटने के लिए सौ मिलियन डॉलर की राशि अलग रख दी गई है. इसके साथ ही, बांग्लादेश ने युनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) की प्रक्रियाओं में भी ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया है ताकि उत्सर्जन और इसे कम करने के लिए उठाए गए क़दमों से अल्पविकसित राष्ट्रों की समस्याओं को ज़्यादा मुखरता के साथ उठाया जा सके. सबसे ज़्यादा ध्यान जल प्रबंधन की ओर दिया जा रहा है. देश में बहने वाली अधिकतर नदियां पड़ोसी मुल्कों से होकर आती हैं, इस सच्चाई से सरकार पूरी तरह वाक़ि़फ है इसीलिए बांग्लादेश ने क्षेत्रीय स्तर पर इसके लिए पहल की है. भारत, चीन, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश में फैले गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना के इलाक़े में जल संसाधनों के बेसिन आधारित विकास और प्रबंधन की ज़रूरत महसूस करते हुए इसके लिए बातचीत शुरू कर दी गई है. इसका उद्देश्य केवल साझा नदियों के जल का सामंजस्यपूर्ण इस्तेमाल ही नहीं है, बल्कि निचले इलाक़ों में बसे बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों के लिए जल प्रदूषण की गंभीर चुनौती से निबटना भी है. सरकार के साथ-साथ पर्यावरण क्षेत्र में सक्रिय नागरिक संस्थाएं भी इस संबंध में जागरूकता ब़ढाने की कोशिश कर रही हैं. जल प्रबंधन से जुड़े लोगों के बीच एक और नई चीज देखने को मिल रही है. उन्हें आख़िरकार यह अहसास होने लगा है कि बांग्लादेशी समाज के तक़रीबन हर तबके प्रभावित इलाक़ों के चारों ओर बांध बनाकर उन्हें नदियों से दूर करने की कोशिश अब तक विफल रही है. सच तो यह है कि इससे बा़ढ, जल निकासी, खारापन, ताजे जल के रखरखाव, मत्स्य पालन, जलमार्गों की उचित व्यवस्था आदि से संबंधित समस्याओं में इज़ा़फा ही हुआ है. अब वहां की सरकार ज़्यादा खुले और ऐसा नज़रिया अपनाने की कोशिश कर रही है जो वर्तमान परिस्थिति के अनुसार प्रशासनिक तंत्र से मेल खाता हो. हम यही उम्मीद करते हैं कि आने वाले सालों में इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे.

पर्यावरण को बचाने के मुद्दे पर आम सहमति बनी तो बांग्लादेश ने जंगलों, पौधों एवं जानवरों की अनेक प्रजातियों की रक्षा के लिए भी क्षेत्रीय सहयोग ब़ढाने की दिशा में क़दम आगे किए हैं. अच्छी बात यह है कि पड़ोसी देशों के साथ दक्षिण अफ्रीकी देशों की तर्ज पर साझा जंगलों की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जो राजनीतिक सीमाओं से परे हों. ये संभावनाएं हक़ीक़त में बदलें तो वनों और जंगली जानवरों की प्रजातियों के साथ-साथ जैव विविधता के संरक्षण की भी उम्मीद की जा सकती है. इस क्षेत्र में सक्रिय ग़ैर सरकारी और नागरिक संस्थाएं सरकार के साथ मिलकर प्रयास करें तो यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. देश के अर्थशास्त्री भी यह मान चुके हैं कि पर्यावरण से जुड़े मुद्दे सामाजिक एवं आर्थिक विकास का केवल अभिन्न अंग ही नहीं हैं, बल्कि यह भी स्वीकार करते हैं कि प्रदूषण वास्तव में उत्पादन प्रक्रिया का ही एक नतीजा है. उन्होंने कई बार स्पष्ट किया है कि प्रदूषण निजी उपभोग का एक पहलू है और इसको कम करने का एक तरीक़ा यह हो सकता है कि हम निजी के बजाय सामाजिक या सामूहिक उपभोग को अपनाएं. यह सही है कि इससे संसाधनों के इस्तेमाल में कमी आएगी जिससे वातावरण पर कम बुरा असर पड़ेगा. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सलाह अच्छी है, लेकिन बांग्लादेश के लिए बिल्कुल नई है और इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसके लिए ज़रूरी सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव को कैसे अंजाम दिए जाते हैं. मेरे विचार में ऐसे बदलाव तभी संभव हो सकते हैं जब पर्यावरण सुरक्षा को विकास के विस्तृत लक्ष्यों के साथ जगह दी जाए, पर्यावरण के प्रति चिंताओं को विकास के लिए बनी योजनाओं के साथ जोड़ा जाए और उपभोग की ऐसी प्रणाली को प्रोत्साहित किया जाए जिससे पर्यावरण पर बुरा असर न पड़े. प्रदूषण से जुड़े एक और पहलू, जिसे टीवी चैनलों और अख़बारों-पत्रिकाओं ने उठाया है, को देश भर में खासी तवज्जो मिल रही है. यह मामला है औद्योगिक कचरे से जल और ज़मीन पर फैलने वाले प्रदूषण से मुक़ाबला. इसके लिए सरकार और ख़ुद प्रधानमंत्री ने भी अनेक क़ानूनी प्रावधानों के कड़े अनूपालन की ज़रूरत पर भी बल दिया है, लेकिन इसके बावजूद औद्योगिक प्रतिष्ठान नियमों की खुलेआम अनदेखी कर रहे हैं. लेकिन अब शायद आंखें मूंदें रहने का समय बीत चुका है. यह बेहद ज़रूरी है कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर नज़र रखने वाले लोग इन प्रावधानों के अनुपालन को पूरी तरह सुनिश्चित करें. कृषि कार्यों, खासकर खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल में प्रदूषण नियंत्रित करने वाले कार्यक्रमों और पर्यावरण प्रबंधन परियोजनाओं को ब़ढावा देने की ज़रूरत है. इससे ज़मीन पर जल प्रदूषण की समस्या से निजात पाई जा सकती है. ऊर्जा संसाधनों की कमी और बिजली के स्वच्छ उत्पादन को विकास के एक लक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाने का एक फल यह है कि आम जनता के साथ-साथ निजी क्षेत्र भी ऊर्जा के ग़ैर-परंपरागत स्त्रोतों की ओर उन्मुख हो रही है. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन के बेहतर इस्तेमाल और सौर ऊर्जा के माध्यम से बिजली उत्पादन को ब़ढावा मिल रहा है. इसके लिए विदेशों से भी आर्थिक सहायता मिल रही है और हम यह उम्मीद करते हैं कि इससे इस क्षेत्र में विकास की गति तेज़ होगी. जिस तरह 1980 और 1990 के दशकों में कपड़ा उद्योग ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी, उसी तरह सौर ऊर्जा भी वर्तमान दशक में बांग्लादेश के विकास का इंजन साबित हो सकता है.  पर्यावरण मुद्दे पर रणनीति बनाने में जुटे योजनाकार एक और पहलू पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. यह है घरेलू कचरे को उर्वरक या ऊर्जा के रूप में परिवर्तित करने की दिशा में और ज़्यादा प्रयास. इसके लिए ज़रूरी है कि स्थानीय संस्थाएं घरों से कचरे को जमा करने से लेकर उसके प्रबंधन और निस्तारण के प्रति गंभीर हों. इसके साथ यह भी ज़रूरी है कि मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निस्तारण के लिए अलग और पर्याप्त व्यवस्था हो. इसके लिए नए सिरे से क्षमता निर्माण और लोगों को प्रशिक्षित करने की ज़रूरत होगी. हम उम्मीद करते हैं कि विकास के मौजूदा संसाधनों से ही इसके लिए व्यवस्था संभव हो सकेगी. हालांकि, ये सभी चीजें तभी संभव हो सकती हैं जब हम पर्यावरण से संबंधित क़ानूनी, व्यवस्था प्रबंधन और प्रशासनिक पहलुओं को मज़बूत करें और इसके मुताबिक़ संस्थाओं के गठन पर ध्यान दें. बाज़ार-आधारित उपायों के साथ पर्यावरण सुरक्षा उपायों का समुचित मिश्रण इसमें सहायक हो सकता है. इसके बाद संभव है कि इसी उद्देश्य से खास तौर पर गठित की जाने वाली पर्यावरण अदालतें पर्यावरण मानकों को कड़ाई से लागू करने में सक्षम हों.

(लेखक पूर्व सचिव और राजदूत हैं.)