बीटी बैगन पर रोक के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक पहलू

बीटी बैगन के इस्तेमाल पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने फिलहाल रोक की घोषणा की तो मीडिया में उसके ख़िला़फ आलोचनाओं का अंबार लग गया. कई लोगों ने तर्क दिए कि ऐसे फैसले वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दिए जाने चाहिए. लेकिन यह मामला विज्ञान और विज्ञान विरोध का नहीं है. दरअसल यह विज्ञान की ही दो अलग-अलग धाराओं से जुड़ा है. सच्चाई तो यह है कि बीटी बैगन पर लगाई गई रोक से संबंधित फैसले में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक सोच का सहारा लिया गया है.

जैव प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों से जीन पारिस्थितिकी एवं अन्य संबद्ध विषयों की विस्तृत समझ की अपेक्षा नहीं की जा सकती. यही वजह है कि जीएम फूड्‌स के इस्तेमाल से पर्यावरण एवं सामाजिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर और जोख़िमों का वास्तविक आकलन वे नहीं कर सकते. अधिकतर वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि जेनेटिक रिडक्शनिज़्म की अवधारणा में कई दोष हैं.

कई वैज्ञानिकों ने मांग की कि इस मुद्दे पर निष्पक्ष और भलीभांति विचार करने के बाद ही कोई फैसला लिया जाना चाहिए. भारत में जेनेटिक इंजीनियरिंग को स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाली वैज्ञानिक डॉ. पुष्पा भार्गव ने भी बीटी बैगन के ख़िला़फ अपनी आवाज़ बुलंद की. बीटी बैगन के पक्ष में बोलने वाले अधिकांश तथाकथित वैज्ञानिक वास्तव में तकनीकी विशेषज्ञ हैं, जो विज्ञान की एक पूर्ववर्ती शाखा की मदद से मोंसेंटो जैसी कंपनियों के लिए जीएम फसलों का विकास करने की कोशिश में लगे हैं. जैविक सुरक्षा जैसे गंभीर मसलों को ऐसे लोगों के भरोसे छा़ेड देना अनैतिक तो है ही, समाज के लिए ख़तरनाक भी है. यह अनैतिक इसलिए है, क्योंकि किसी नई तकनीक के विकास के काम में लगे लोग यह फैसला नहीं कर सकते कि वह तकनीक समाज के लिए अच्छी है या नहीं. यह हितों के टकराव से जुड़ा मामला है. फिर यह ख़तरनाक भी है, क्योंकि जैविक सुरक्षा का आकलन करने के लिए ज़रूरी वैज्ञानिक योग्यता की उनमें कमी है.

वे दरअसल रेफ्रिजरेटर निर्माताओं की तरह हैं, जिन्हें यह नहीं पता कि इसमें इस्तेमाल हुआ क्लोरो फ्लोरो कार्बन ओजोन परत को कमज़ोर करने में बड़ी भूमिका निभाता है. वे उन कार निर्माताओं की तरह हैं, जो बड़ी शान से अपने नए मॉडल्स लांच करते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि उनकी कार से निकलने वाला ख़तरनाक धुआं वातावरण को प्रदूषित करता है और पर्यावरण में अस्थिरता पैदा करता है. जेनेटिक इंजीनियरिंग जीव विज्ञान की एक शाखा रिडक्शनिस्ट बायोलॉजी पर आधारित है, जो यह मानती है कि हर सजीव चीज एक मशीन की तरह है. साथ ही यह भी कि मशीन की तरह इसके हर कलपुर्जों को बदला जा सकता है और इससे उसके अस्तित्व पर कोई असर नहीं पड़ता. प्राकृतिक और सामाजिक विविधताओं पर आर्थिक एवं राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए विज्ञान की इस शाखा का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन जीन को आधारभूत मानना विज्ञान से ज़्यादा विचारधारा की बात है. जीन का ख़ुद में कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, बल्कि वह एक पूर्ण संरचना का अभिन्न अंग मात्र है और इस संरचना से ही उसका अस्तित्व होता है. कोशिका के सभी अंग एक-दूसरे के संपर्क में होते हैं और किसी भी जैविक संरचना में जीनों का समूह एक जीन विशेष के मुक़ाबले ज़्यादा नहीं तो कम से कम उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

इसे ज़्यादा विस्तृत तरीक़े से इस तरह समझा जा सकता है कि किसी जीव को प्रोटीनों के एक समूह के रूप में नहीं देखा जा सकता. हर जीन का एक से ज़्यादा प्रभाव होता है और जीवों में पाए जाने वाले हर गुण के लिए एक से ज़्यादा जीन ज़िम्मेदार होते हैं. जेनेटिक इंजीनियरिंग में अलग-अलग प्रजातियों के जीनों को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है. विभिन्न स्रोतों से जमा किए गए उक्त जीन कई बार ऐसे जीवाणुओं से भी लिए जाते हैं, जिनमें कई ख़तरनाक मानवीय एवं पादपीय रोगों को पैदा करने वाले विषाणु पाए जाते हैं. पिछले कुछ सालों में जो जानकारियां हमारे सामने आई हैं, वे यही बताती हैं कि ऐसे जीन आनुवांशिकीय प्रदूषण फैलाते हैं और पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकते हैं.

जोखिम का आकलन

जैव प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों से जीन पारिस्थितिकी एवं अन्य संबद्ध विषयों की विस्तृत समझ की अपेक्षा नहीं की जा सकती. यही वजह है कि जीएम फूड्‌स के इस्तेमाल से पर्यावरण एवं सामाजिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर और जोख़िमों का वास्तविक आकलन वे नहीं कर सकते. अधिकतर वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि जेनेटिक रिडक्शनिज़्म की अवधारणा में कई दोष हैं. इस क्षेत्र में ताज़ा शोधों ने एपिजेनेटिक्स की एक नई अवधारणा को जन्म दिया है, जो न केवल जीनों की सही व्याख्या करती है, बल्कि प्रत्येक जीन के लिए तीस हज़ार से भी ज़्यादा प्रोटीन रूपांतरणों को तैयार कर सकती है. एपिजेनेटिक यह भी बताती है कि जीनों की गतिविधियां और कोशिकीय व्यवहार पर्यावरणीय कारकों से नियंत्रित होते हैं, न कि डीएनए की आंतरिक संरचना से.

लेकिन समस्या यहीं तक सीमित नहीं है. बीटी बैगन को कीट प्रबंधन की समस्या के एक समाधान के रूप में भी पेश किया जा रहा है. टॉक्सीन पैदा करने वाले जीन को एंटीबायोटिक के साथ पौधों में डाला जा रहा है. यह वैसी ही हालत है, जैसे अपने घर की दीवार में एक छोटा सा छेद करने के लिए आप अर्थ मूवर जैसी भारी-भरकम मशीन का इस्तेमाल कर रहे हों. जिस तरह अर्थ मूवर पूरी दीवार को ही ख़त्म कर देता है, वैसे ही जीनों के ऐसे इस्तेमाल से उनके व्यवहार और गतिविधियों में आने वाला बदलाव पूरी जैविक प्रक्रिया के लिए ही ख़तरनाक हो सकता है. अर्थ मूवर की तरह ही जेनेटिक इंजीनियरिंग भी आधुनिकतम तकनीक है, लेकिन कृषि कार्यों में कीट नियंत्रण के सहारे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने जैसे संवेदनशील काम में इसका उपयोग ख़तरनाक हो सकता है. कीटों पर नियंत्रण के लिए जैव विविधता का इस्तेमाल होता है. ऐसी जैविक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है, जिससे बीमारियों और कीटों के ख़िला़फ प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो सके. आंध्र प्रदेश में कीटनाशकों के प्रबंधन के लिए चलाई गई एक सरकारी परियोजना में 14 लाख एकड़ से ज़्यादा क्षेत्र को सम्मिलित किया गया है और इसके कई फायदे भी देखने को मिले हैं.

एग्रो इकोलॉजी, टॉक्सिक जीनों को हमारे खाद्य पदार्थों में जबरदस्ती ठूंसे जाने की इस क्रूर तकनीक का एक वैज्ञानिक विकल्प हो सकती है. एग्रीकल्चरल साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट पर किए गए अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण के जो नतीजे सामने आए हैं, वे यही बताते हैं कि जेनेटिक इंजीनियरिंग के मुक़ाबले एग्रो इकोलॉजी पर आधारित कृषि तंत्र ज़्यादा सफल होते हैं. सच तो यह है कि एपिजेनेटिक्स और एग्रो इकोलॉजी भविष्य के विज्ञान हैं, जबकि रिडक्शनिस्ट बायोलॉजी गुज़रे जमाने के विज्ञान का पिछड़ा हुआ स्वरूप है. खाद्यान्न एवं कृषि से संबंधित हमारे फैसले विज्ञान की नवीनतम और कारगर अवधारणाओं पर आधारित होने चाहिए. किसी क्रूर तकनीक को विज्ञान का दर्ज़ा देकर हम ऐसे फैसले नहीं ले सकते.

हमारा शरीर हमारे भोजन से ही बनता है और हमारे पास यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि हम क्या खाएं. विज्ञान और निर्णय प्रक्रिया का लोकतंत्रीकरण समय की ज़रूरत बन चुका है. अपना भला-बुरा सोचने की क्षमता हर इंसान में होती है और लोकतंत्र में हर नागरिक की इच्छा का सम्मान होना चाहिए. बीटी बैगन पर हुई सार्वजनिक बहस एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है. जो लोग यह मानते हैं कि हमारे भोजन से संबंधित फैसले बायोटेक कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों के जिम्मे छोड़ देने चाहिए, वे विज्ञान के साथ-साथ लोकतंत्र के भी ख़िला़फ काम कर रहे हैं.

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