चरण वंदना करके निबट गया महाकुंभ

जैसे-तैसे आख़िर निबट ही गया उत्तराखंड का पहला महाकुंभ! घोर असुविधाओं और शासन-प्रशासन एवं पुलिस द्वारा बाबा लोगों की चरण वंदनाओं के भरोसे-सहारे ही संपन्न हो गया 2010 का महाकुंभ. सच तो यह है कि आलोक ने आनंदपूर्वक संतों के चरण गहे और निशंक हो गए. यह और बात है कि आख़िर में आकर इन्हीं संतों के कारण लुटिया डूबी और हरिद्वार का कुंभ एक और त्रासदी दे गया. यूं 12 से 15 अप्रैल तक लाखों लोगों ने अपनी आस्था और श्रद्धा के बल पर तमाम परेशानियां झेलकर भी गंगास्नान कर ही लिया. 13 अप्रैल को फ़सल कटने के वार्षिक पर्व बैसाखी, 14 अप्रैल को बारह साला महापर्व महाकुंभ और 15 अप्रैल को अधिक वैशाख पुरुषोत्तम मास के प्रथम दिवस के स्नानपर्व आए और चले भी गए. सरकारी आंकड़ों में इस अवधि में ढाई करोड़ से भी अधिक लोग आकर गंगा नहा गए. अब सरकारी आंकड़ों की पोलपट्टी तो इसी स्तंभ में पहले खोली जा चुकी है. इसलिए मानना चाहिए कि इन त्रिपर्वों पर साठेक लाख लोगों ने हरिद्वार से ऋृषिकेश तक आस्था की डुबकी लगाई.

कुंभ पुलिस के ही एक उच्चाधिकारी ने बताया कि सामने से आती भीड़ पर साधुओं ने लाठियां भांजी और इस अफ़रातफ़री में मची भगदड़ में यात्रियों के दबाव से ही पुल की रेलिंग टूटी. लोग गंगा में गिरे. इस पूरी घटना के बाद पुलिस और प्रशासन ने दबाव बनाया और जूना अखाड़े को शाही स्नान के लिए हरकी पौड़ी जाने से बचने की सलाह दी.

महाकुंभ के शाही स्नान के दौरान क़रीब ग्यारह घंटों तक सामान्य स्नानार्थी के लिए हरकी पौड़ी बंद रही. वहां के सारे मंदिर-देवालय 13-14 अप्रैल की मध्य रात्रि में एक बजे से बंद कर दिए गए, जिन्हें अगले दिन रात को आरती के बाद ही खोलने की अनुमति दी गई. मंदिरों के बाहर पुलिस और अन्य अधिकारियों का पहरा था कि कोई आस्थावान दर्शन करने न घुस जाए. कुंभ के दिन सुबह सात बजे वह अघट घट गया, जिसका डर कुंभ की व्यवस्थित अव्यवस्थाओं को देखकर अधिकांश हरिद्वारवासियों के मन में बैठा हुआ था. एक ओर जहां बैरागियों की दो अणियों दिगंबर और निर्मोही के बीच बैरागी कैंप में जमकर मारपीट और ख़ूनख़राबा हुआ तथा दर्ज़न भर साधुओं को अस्पताल ले जाना पड़ा, वहीं दूसरी ओर जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर पायलट बाबा के कार-कारवां के नीचे कुचल जाने से सात लोग मौत की नींद सो गए. इन सबसे बाख़बर प्रदेश के औपचारिक प्रतिनिधि और मुखिया मुख्यमंत्री ने ऐन कुंभ के दिन हरिद्वार आकर सपत्नीक कुंभ स्नान कर लिया तो लगा मानों पूरे उत्तराखंड ने ही गठजोड़े से गंगा में डुबकी लगाकर कुंभ का पुण्य कमा लिया!

यह और बात है कि इस बार भी हरिद्वार के कुंभ मेले ने दशाधिक लोगों की बलि ले ली. शासन-प्रशासन की नज़र में फिर भी मेला सकुशल संपन्न  हो गया है. कुंभ वाले दिन घोषित तौर पर सात लोग काल के ग्रास बन गए और सत्रह बुरी तरह घायल हो गए. इसके प्रथम दृष्ट्‌या दोषी हैं संन्यासियों के प्रमुख पंच दशनाम जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर पायलट बाबा. उनकी गाड़ी ने ही इस हादसे को अंजाम दिया. इस दुर्घटना से पहले कुंभ शिविरों में अनेक अग्निकांडों में से एक ही अग्निकांड में तीन महिलाओं की मौत सर्वविदित है. चार महीने के कुंभकाल में कुंभ के लिए ही हरिद्वार आए यात्रियों के साथ हुई अन्य दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या भी शामिल कर ली जाए तो यह आंकड़ा अधिक बड़ा हो जाएगा. 14 अप्रैल का घटनाक्रम सबको विदित है. सब जान गए हैं कि कुंभ स्नान की सुबह किस तरह ललतारौ पुल की तरफ़ से आने वाले निरीह पैदल स्नानार्थियों पर जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर पायलट बाबा के क़ाफिले की गाड़ी चढ़ दौड़ी. हड़बड़ी और भगदड़ में सात लोगों की मौत हो गई और सत्रह बुरी तरह घायल हो गए. कुछ गंगा में गिर गए, जिन्हें बाद में बचा लिया गया. सारी घटना हुई बिरलाघाट के निकट गंगा पुल और पुल के पार चंडी चौक से पहले की सड़क पर.

कुंभ पुलिस के ही एक उच्चाधिकारी ने बताया कि सामने से आती भीड़ पर साधुओं ने लाठियां भांजी और इस अफ़रातफ़री में मची भगदड़ में यात्रियों के दबाव से ही पुल की रेलिंग टूटी. लोग गंगा में गिरे. इस पूरी घटना के बाद पुलिस और प्रशासन ने दबाव बनाया और जूना अखाड़े को शाही स्नान के लिए हरकी पौड़ी जाने से बचने की सलाह दी. व़क्त की नज़ाकत को समझते हुए यह सलाह जूना के सचिव-श्रीमहंत एवं अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरिगिरि ने बुद्धिमानीपूर्वक मान भी ली. वे ऐसा न करते तो 1998 के कुंभ की तरह निरंजनी और जूना फिर आमने-सामने होते और तब न जाने क्या-क्या अघटित घट जाता. क्योंकि, निरंजनी अखाड़ा अपने नियत समय से विलंब से पहुंचा और देर तक नहाता रहा. अगर जूना समय से पहुंच जाता तो दोनों अखाड़ों की भिड़ंत को कोई न रोक पाता. बहरहाल अखाड़ों की भिड़ंत तो नहीं हुई, अलबत्ता जनता के साथ महामंडलेश्वर का क़ाफिला भिड़ गया. अब यहां प्रश्न यह पैदा होता है कि अखाड़े के महामंडलेश्वर को गाड़ियां दौड़ाते हुए जनमार्ग पर आने की अनुमति किसने दी? पूरे शहर को जब प्रशासन ने वाहनविहीन कर रखा था तो पायलट बाबा के क़ाफिले की गाड़ियां उस मार्ग पर कैसे आईं? अगर उन्हें आना ही था तो ललतारौ पुल से उस ओर जाने वाले पैदल यात्रियों को क्यों नहीं रोका गया? सामर्थ्यवान कुंभ पुलिस के सामने परस्पर संवाद की ऐसी क्या मजबूरी थी कि क्षेत्र के अधिकारी परस्पर संपर्क भी नहीं कर सके और एक-दूसरे को वास्तविक स्थिति से अवगत भी न करा सके?

चलिए, यह सब तो हो गया. अब जनता पूछ रही है कि बाद की कार्रवाई के नाम पर जूना अखाड़े या उसके महामंडलेश्वर पायलट बाबा के ख़िला़फ क्या हो रहा है? सात मौतों की क़ीमत सरकार ने तो पांच लाख रुपये प्रति मृतक के हिसाब से पैंतीस लाख रुपये लगा दी और मजिस्ट्रेटी जांच का लॉलीपॉप थमाकर पल्ला झाड़ लिया, पर करोड़पति अखाड़े और उसके अरबपति मंडलेश्वरों ने मृतकों के परिवारों को दो रुपये की मदद करने का कलेजा भी नहीं दिखाया. यह कैसे संत हैं और उनकी कैसी मानवीय संवेदनाएं हैं? उधर सारा कुंभकाल गवाह रहा है कि वोटों के लोभ-लालच के चलते शासन-प्रशासन संतों के सामने कितना पंगु और निरीह रहा. पर अब तो कुंभ बीत गया. अब तो चमचागीरी छोड़कर सात मौतों के दोषियों पर नकेल कसने की हिम्मत दिखाओ. फिर वे दोषी चाहे पुलिस के लोग हों या संतों की जमात के. निरीहों की मौत से ऊपर कोई नहीं है. पर दुर्भाग्य यह कि धोबी की ग़लती के लिए गधे के कान उमेठे जा रहे हैं. व्यवस्था के दोष के लिए पायलट बाबा के वाहन चालक के ख़िला़फ मुक़दमा क़ायम करके कर्तव्य की इतिश्री समझी जा रही है. उधर हरकी पौड़ी पर पहला अखाड़ा निरंजनी आनंद अखाड़े के साथ अपनी समयावधि बीत जाने पर पहुंचा और देर तक रहा. वह तो अच्छा हुआ कि उसके पीछे आने वाला दूसरा अखाड़ा जूना था, जो कुछ शर्म और कुछ प्रशासनिक दबाव के कारण शाही जुलूस लेकर हरकी पौड़ी तक आया ही नहीं. पर विलंबित स्नान के चलते साधुओं के दो अखाड़ों नया उदासीन और निर्मलों ने तो आरती के बाद ही स्नान किया. तभी पूरे 11 घंटों बाद आम स्नानार्थी हरकी पौड़ी पर स्नान कर सके.

सफाई और सुचारु स्वास्थ्य सेवाओं का दंभ भरने वाला प्रशासन हड़बड़ाया रहा और सारा कुंभनगर एक विशाल कूड़ेदान में तब्दील होता चला गया. कोई बिजली या टेलीफोन का खंभा ऐसा नहीं बचा, जिसके नीचे कूड़े केबड़े-बड़े ढेर न लगे हों. स्नान करके अपर रोड से लौटने वाले यात्री सड़कों पर फैले कूड़े के ऊपर ही चलने के लिए विवश थे. पुलिस बल का भारी इंतज़ाम होते हुए भी पुलिस यात्रियों को केवल रोकने का काम कर रही थी, उनके मार्गदर्शन का नहीं! ये पंक्तियां लिखे जाने की तिथि 15 अप्रैल तक हरिद्वार के लोग थक कर चूर हैं, पर पुलिसिया पाबंदियों के चलते हाउस अरेस्ट ही अधिक हैं. वे अख़बार एवं दूध आदि रोज़मर्रा की चीज़ों को तरस गए हैं. उधर अखाड़ों में धर्मध्वजाओं की चारों रस्सियां ढीली कर दी गई हैं, जिसका अर्थ है साधुओं, अब आप कढ़ी पकौड़ा खाओ और हरिद्वार से विदा लो. कुंभ से उकताए हरिद्वारवासी, पुलिस और प्रशासन के अधिकारी भी मन ही मन कह रहे हैं कि जाओ अतिथियों, अब आप भी पधारो, ताकि कुछ दिन ही सही, हम भी चैन की सांस लें. उसके बाद हरिद्वार का धर्म तो है स्वागत, सो फिर तैयार रहेंगे हम अगवानी के लिए.

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