गंगापुत्र नहीं चाहते गंगा मंदिर सुंदर दिखे

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हरिद्वार में इन दिनों कुंभ का ज़ोर है. साधु-संतों के दो शाही स्नान हो चुके हैं. अगर कोई नई बात न हुई तो इस बार जोड़ा जा रहा नया शाही स्नान भी 30 मार्च को संपन्न हो जाएगा. फिर बचेगा आख़िरी और मुख्य कुंभस्नान पर्व, जो 14 अप्रैल की मेष-संक्रांति पर संपन्न होगा. सारे शाही स्नान हरकी पौड़ी ब्रह्मकुंड पर संपन्न होते हैं. इस प्रमुख स्नान स्थली पर अनेक देव मंदिर सैकड़ों वर्षों से प्रतिष्ठित हैं. हरिद्वार आने वाले श्रद्धालु हरकी पौड़ी पर स्नान करके इन्हीं देव मंदिरों में देवी-देवताओं के दर्शन और पूजा-आराधना करते हैं. हरिद्वार में चूंकि गंगा का महत्व अधिक है, इसलिए हरकी पौड़ी और अन्यत्र भी एकाधिक गंगा मंदिरों का आधिक्य है. हरकी पौड़ी के इन्हीं मंदिरों में आमेर के महाराजा मानसिंह प्रथम द्वारा निर्मित गंगा मंदिर, सिखौलों का गंगा मंदिर और महंतानी कौरादेवी से संबद्ध रहा अठखंभा गंगा मंदिर प्राचीन गंगा मंदिरों की कड़ी में हैं, जबकि तीर्थ पुरोहितों की संस्था द्वारा प्रतिष्ठित एक और गंगा मंदिर हरकी पौड़ी के उत्तर में महिला घाट से सटा हुआ है. बीसवीं सदी के नवें दशक में बना यह मंदिर अन्य गंगा मंदिरों में सबसे अधुनातन है.

इतिहासकार एवं भारतीय सर्वेक्षण विभाग के ब्रिटिशकालीन डायरेक्टर जनरल सर अलेक्जेंडर कनिंघम अपनी पुरातात्विक खोज रिपोटर्‌‌स में लिखते हैं कि मानसिंह प्रथम ने हरकी पौड़ी का भी जीर्णोद्धार करवाया और आज के हरिद्वार नगर की नींव भी डाली.

इन गंगा मंदिरों के अलावा हरकी पौड़ी पर तीन और प्रमुख मंदिर हैं. श्री गंगाधर महादेव मंदिर, हरिचरण पादुका मंदिर एवं इसी के निकट दुमंजिला लक्ष्मी नारायण मंदिर, जिसके भूतल पर विशाल गणेश प्रतिमा प्रतिष्ठित है. गणेश जी के ही ऊपर प्रथम तल पर भगवान लक्ष्मी नारायण का विग्रह है. हरिचरण और गंगाधर महादेव मंदिरों का जीर्णोद्धार एवं लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण 1938 के महाकुंभ से पहले हरकी पौड़ी विस्तार योजना के साथ-साथ हो गया था. पुरातन चित्रों और दस्तावेज़ों के अलावा इन तीनों मंदिरों का वर्तमान शिल्प भी इसका प्रमाण है. लक्ष्मी नारायण मंदिर की बाहरी परिक्रमा तो 1950 के कुंभ के बाद ही बनवाई गई थी, लेकिन

सोलहवीं सदी के राजा मानसिंह वाले गंगा मंदिर का जीर्णोद्धार तब नहीं हो पाया था. व़क्त और गंगा के सतत प्रवाह के थपेड़े झेलते इस गंगा मंदिर को भी जीर्णोद्धार की ज़रूरत थी. सो, इस गंगा मंदिर के पुश्तैनी स्वामियों ने 1997 में इसके जीर्णोद्धार की प्रक्रिया आरंभ की. सितंबर 1997 से 26 फरवरी 1998 तक जीर्णोद्धार कार्य अबाध गति से चला और महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर पर विधिवत कलश स्थापना भी हो गई. अब तक किसी ओर से कोई विरोध नहीं था.

यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि हरकी पौड़ी के मंदिरों की व्यवस्था से श्री गंगासभा का कोई लेना-देना नहीं है. न मंदिरों के मालिक और पुजारी गंगासभा के सदस्य हैं और न ही मंदिरों की व्यवस्था में दख़लंदाज़ी का कोई अधिकार गंगासभा को है. लेकिन, सभा के चंद स्वार्थी एवं राजनीति प्रेरित तत्वों द्वारा गंगा मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य में अड़ंगा लगाया गया. हरिद्वार विकास प्राधिकरण पर दबाव डालकर मंदिर का जीर्णोद्धार रुकवाया गया, जिसके विरुद्ध मंदिर के स्वामी पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय गए. वे हरकी पौड़ी की प्रबंधकारिणी संस्था श्री गंगासभा में आंतरिक चुनावों के चलते हो रही गुटबाज़ी के तहत भारी उठापटक के दिन थे. सभा के दोनों गुट एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तब भी तैयार थे और आज भी हैं. वही गुटबाज़ी आज तक बदस्तूर चली आ रही है. गंगा मंदिर से कोई संबंध किसी गुट का न होने पर भी परस्पर आरोपों-प्रत्यारोपों के चलते जीर्णोद्धार कार्य में कौन सा गुट कितनी अड़ंगेबाज़ी मंदिर कार्य में लगा सकता है, इसकी होड़ सी शुरू हो गई. स्वयं को गंगापुत्र और तीर्थ पुरोहित कहलाने वाला सारा पंडा समाज तो नहीं, पर हां समाज में राजनीतिक जोड़तोड़ करने वाले समाज का एक वर्ग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए गंगाजी के ही प्राचीन मंदिर के सौंदर्यीकरण की ख़िलाफ़त पर उतर आया. पहले अफ़वाह उड़ाई गई कि उक्त मंदिर तो मंदिर ही नहीं है, राजा मानसिंह की समाधि है. यह भी कहा गया कि मानसिंह की नहीं, बल्कि जोधाबाई की समाधि है, पर इन आधारहीन बातों का कोई प्रमाण नहीं दिया गया. इसके विपरीत मंदिर स्वामियों ने जयपुर के सवाई द्वितीय संग्रहालय से प्रमाण हासिल किए कि उक्त मंदिर स्वयं राजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में बनवाया. यही नहीं, इनकी दो समाधियां या कि छतरियां मौजूदा महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले में तहसील अचलपुर और राजस्थान के आमेर में आज भी सुरक्षित हैं. इनकी कोई तीसरी छतरी कहीं है ही नहीं. इतिहासकार एवं भारतीय सर्वेक्षण विभाग के ब्रिटिशकालीन डायरेक्टर जनरल सर अलेक्जेंडर कनिंघम अपनी पुरातात्विक खोज रिपोटर्‌‌स में लिखते हैं कि मानसिंह प्रथम ने हरकी पौड़ी का भी जीर्णोद्धार करवाया और आज के हरिद्वार नगर की नींव भी डाली.

यह तथ्य उजागर होने के बाद गंगा मंदिर को मानसिंह की छतरी कहने का अभिप्राय आम लोगों की समझ में आ गया कि वह मानसिंह का बनवाया हुआ छतरीनुमा मंदिर है, न कि अस्थियां गाड़ने की जगह! यूं भी हरिद्वार का प्रमुख स्नान एवं पूजास्थल हरकी पौड़ी कभी श्मशान नहीं रहा कि वहां कभी किसी राजा-महाराजा की समाधि या छतरी बनाई जाती. फिर गंगा में अस्थियां प्रवाहित करने की परंपरा है न कि अस्थियां गाड़ने की. जब उक्त तीर खाली चले गए तो कहा गया कि गंगा मंदिर में जीर्णोद्धार के अंतर्गत मंदिर के ऊपर कमरों का निर्माण कराया जा रहा है. मंदिर के शिखर की ओर के आठ स्तंभों को परस्पर जोड़ने के लिए शिखर के क़रीब जो क्रॉसबीम्स डाले गए, उन्हें परस्पर जोड़कर ईंट, सीमेंट, लोहा- लंगड़ डालने की जो अस्थायी जगह बनाई गई, उसे कमरा कहकर विरोध शुरू कर दिया गया. कहा गया कि मंदिर स्वामी वहां भी मूर्तियां रखकर ज़्यादा पुजापा चढ़वाने की जुगत में हैं. जबकि इस तथाकथित कमरे तक पहुंचने का कोई मार्ग या सीढ़ी है ही नहीं. इसके विपरीत इसी हरकी पौड़ी पर ऐसे उदाहरण उपलब्ध हैं, जहां देवी-देवताओं के सिर पर न केवल दूसरे देवी-देवता स्थापित हैं, बल्कि देवी-देवताओं की छत पर जूते पहने लोगों का विचरण भी संभव है. हरकी पौड़ी की प्रबंधकारिणी संस्था गंगा मैया की जिस रजत प्रतिमा की पूजा-आरती, सुबह-शाम करती-करवाती है, वह हरकी पौड़ी दशकों से सीढ़ियों के नीचे की बुखारी में रखी जाती है. इस बुखारी के ऊपर की सीढ़ियों पर जूते पहन कर लोगों का आवागमन होता है और भीड़-भड़क्के में वे सीढ़ियां महिलाओं के अस्थायी मूत्रालय तक में तब्दील होती देखी गई हैं.

हरकी पौड़ी पर ही लक्ष्मी नारायण मंदिर में गणेश जी के ऊपर  लक्ष्मी नारायण विराजमान हैं. आरती स्थान के पीछे बनी छतरीनुमा कोठरियों में नीचे देव प्रतिमाएं हैं और ऊपर लोग रहते हैं. पर आज तक किसी को कोई आपत्ति इन बातों को लेकर नहीं हुई. और तो और, हरकी पौड़ी में अप्रतिष्ठित एवं खंडित देव प्रतिमाओं को पुजवाते दर्ज़नों खोखानुमा मंदिर हैं, जिन्हें देखकर आम आस्तिक व्यक्ति को दु:ख होता है, पर इन सबके विरोध में बोलने से राजनीतिक लाभ के बजाय नुक़सान की आशंका अधिक है, इसलिए कोई कुछ कहना नहीं चाहता. इन सबके विपरीत मानसिंह वाले गंगा मंदिर का विरोध इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि वह जीर्णोद्धार पूरा होने के बाद हरकी पौड़ी का सुंदर मंदिर बन कर उभरेगा. यही कारण है कि इसे लेकर कोई न कोई विवाद खड़ा करने की कोशिश की जाती रही है. अब कहा जा रहा है कि इसकी ऊंचाई अधिक हो गई है, इसे कम कर दिया जाए. इस बेतुकी मांग के साथ कुतर्क यह दिया जाता है कि मंदिर की ऊंचाई के कारण मालवीय द्वीप से लोग आरती नहीं देख पाते. आरती ज़मीन पर गंगा तट पर होती है और पहले जैसे देखी जाती थी, वैसे ही अब भी देखी जा सकती है. पर कुतर्क का कोई जवाब होता ही नहीं है.

अब अगर शिखर तोड़कर गंगा मंदिर की ऊंचाई कम कर दी जाए तो पंडा समाज के वर्तमान कर्णधार मंदिर बनने देने को तैयार हैं. बने हुए मंदिर को तोड़ने की इन ब्राह्मणों की ज़िद का ही परिणाम था कि दूसरे शाही स्नान से पहले जब मंदिर स्वामियों ने लकड़ी के अस्थायी मेहराबदार पैनल्स लगाकर मंदिर को सुंदरता और सुरक्षा देनी चाही तो कतिपय गंगापुत्रों ने गंगा मैया के मंदिर की सुंदरता का विरोध करते हुए पुलिस और प्रशासन पर भारी दबाव डालकर उन्हें हटवा दिया. प्रशासन ने बहाना बनाया कि पैनल्स स्नानार्थियों पर गिर सकते हैं, इसलिए हटाना ज़रूरी है. पर सचाई यह है कि पुलिस मज़बूती से लगे पैनल्स को हटा नहीं सकी, इसलिए बढ़ई से उन्हें कटवा कर गंगा में बहा दिया गया, क्योंकि गंगा मंदिर की अस्थायी सुंदरता भी कुछ गंगापुत्रों को नागवार है. गंगा मैया के मंदिर का वर्तमान अधबनापन हर देखने वालों को अखरता है. स़िर्फ कुछ पंडों के अहंकार की तुष्टि के चलते प्रशासन, पुलिस एवं चुनी हुई सरकार निरुपाय है और मूकदर्शक की भूमिका में है. मंदिर स्वामी उच्च न्यायालय में न्याय की गुहार कर रहे हैं, पर बारह-तेरह बरसों बाद भी वहां से निर्णय प्रतीक्षा ही है.

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