गोंड राजाओं की राजधानी रामनगर बर्बादी की कगार पर

इतिहास और पर्यटन के मामले में भी सरकार और बाज़ार की शक्तियों का संकीर्ण रवैया बना हुआ है. भारत के इतिहास और पर्यटन में लाल किला, कुतुबमीनार, ताजमहल, खजुराहो, विजय नगरम्‌, कोणार्क आदि का तो बढ़-चढ़कर महत्व बताया गया है, लेकिन प्रतापी गोंड राजाओं के भव्य और शानदार किलों, महलों, मंदिरों और नगरों पर किसी का कोई ध्यान नहीं, जबकि यदि  इन स्मारकों और खंडहरों को ईमानदारी से देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि गोंड राजाओं की निर्माणकला, भवनों और ईमारतों की सजावट कितनी अदभुत और विशिष्ट रही है.

रामनगर के अनेक पुरातत्व महत्व के स्मारक संरक्षण के आभाव में नष्ट हो रहे हैं, जबकि केंद्र और राज्य के पुरातत्व विभाग इनकी रक्षा के लिए करोड़ों रुपया ख़र्च होने का हिसाब बताते हैं, लेकिन सच तो यह है कि रामनगर के महल जर्जर हो चुके हैं और कई शानदार स्मारक बर्बादी की कगार पर हैं.

मध्य प्रदेश का मंडला ज़िला प्राचीन और मध्यकालीन गोंड राजाओं के अनेक स्मारकों की समृद्ध स्थली है, लेकिन दुख की बात है कि मध्य प्रदेश और देश के पर्यटन मानचित्र में इनका कहीं कोई ज़िक्र नहीं मिलता है. मंडला ज़िले के गोंड राजाओं की राजधानी रामनगर, उपेक्षा के कारण खंडहर होते-होते अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है. रामनगर के अनेक आकर्षक स्मारक संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रहे हैं, जबकि केंद्र और राज्य के पुरातत्व विभाग इनकी रक्षा के लिए करोड़ों रुपया खर्च होने का हिसाब बताते हैं. रामनगर के महलों का इतिहास जानने के लिए हमने इतिहास के प्रध्यापक डॉ. शरद नारायण खरे से जानना चाहा तो, उन्होंने बताया कि मण्डला में स्थित गोंड कालीन राजधानी एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है, परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो पा रहा है. गोंड राजा समय-समय पर अपनी राजधानी बदलते रहे हैं, ऐसा वे परिस्थितियों के अनुसार करते थे. इस प्रकार गोंड राज्य की राजधानी कभी जबलपुर के नगर निगम के अंतर्गत ग़ढा क्षेत्र में थी, कभी सिंगोरगढ़ (ज़िला दमोह), तो कभी चौरागढ़ (ज़िला नरसिंहपुर) में थी. 1651 ई. में जुझार सिंह बुंदेला के छोटे भाई पहाड़ सिंह बुंदेला ने चौरागढ़ पर आक्रमण किया. इस आक्रमण के समय गढ़ा का शासक हिरदेशाह था. इस आक्रमण के फलस्वरूप चौरागढ़ सदा के लिए गोंड राजाओं के अधिकार से निकल गया. ऐसी स्थिति में हिरदेशाह ने अपनी राजधानी मंडला नगर से 17 किमी दूर नर्मदा के तट पर रामनगर में स्थापित की. हिरदेशाह ने यहां अनेक इमारतों का निर्माण कराया, जिनमें से अधिकांश वर्तमान में भी मौजूद हैं तथा पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं. लेकिन इनका पर्यटन की दृष्टि से न तो अभी तक उपयोग हुआ है और न ही प्रचार-प्रसार. इसके अतिरिक्त ज़िला मुख्यालय से यहां तक पहुंचने और इमारतों के भ्रमण हेतु भी पर्याप्त सुविधा का अभाव है. गाइड की उपलब्धता तथा लिखित विवरण (बुकलेट/पेम्पलेट आदि) का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है. यदि हम हिरदेशाह द्वारा निर्मित इन इमारतों व भवनों का अध्ययन करें, तो इनकी विशिष्टता के पूर्ण दर्शन होते हैं. रामनगर दुर्ग तो अब नष्ट (केवल दो बुर्ज़ो को छोड़कर) हो चुका है, परंतु उसके अंदर निर्मित इमारतें (अधिकांश) आज भी अच्छी स्थिति में है. अगर हम रामनगर स्थित राजा हिरदेशाह के महल मोती महल की बात करें तो यहां के हालात भी कुछ बाकी खंडहरों की तरह ही हैं. यह महल नर्मदा के दक्षिणी तट पर स्थित है. कनिंघम की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 1881 ई. में मोतीमहल नर्मदा के जलस्तर से 80 फुट ऊपर था. अब यह दूरी कम हो गई है. अपने निर्माण काल में अवश्य ही मोती महल नर्मदा से 80 फुट से भी बुहत अधिक ऊपर रहा होगा. यहां से नर्मदा नदी का बहुत रम्य दृश्य देखने को मिलता है. निश्चित ही दुर्ग-निर्माण के लिए स्थल का चुनाव करते समय हिरदेशाह को इस स्थान का सौंदर्य भाया होगा. मोतीमहल आयताकार है, जो बाहर से 64.5 मीटर लंबा और 61 मीटर चौड़ा है. भीतर आंगन 50.5 मीटर लंबा और 47.25 मीटर चौड़ा है. बीच के कमरे लंबे हैं और बगल के कमरे सामान्यत: आकार में छोटे हैं. मोतीमहल के बारे में मंडला गजेटियर (1912 ई.) के विचार पूर्वाग्रह पूर्ण और भ्रामक हैं, जो इसके सौंदर्य पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं. हालांकि मंडला गजेटियर में भी यहां से नर्मदा के सुंदर दृश्य की बात कही गई है. महल की तीन मंज़िलें हैं, उसमें बहुत से कमरे हैं, जिनमें राजा का अंत:पुर निवास करता था और हिरदेशाह के समय महल में स्त्रियों की संख्या 100 थी. इसमें एक शिलापट्ट भी है. मोतीमहल के आंगन में स्नानगार है. मंडला गजेटियर में इसे राजप्रासाद (पैलेस) कहा गया है. 1984 ई. में इसे मध्य प्रदेश शासन द्वारा संरक्षित घोषित किया गया था. वास्तव में राजमिस्त्रियों ने रामनगर के भवनों के रूप में उस समय का बेहतरीन स्थापत्य कौशल का नमूना प्रस्तुत किया था. अगर हम रानी महल की बात करें तो मोतीमहल से डेढ़ मील पर उत्तर-पूर्व दिशा में रानी महल है, इसे बघेल रानी का महल कहा जाता है. कनिंघम के अनुसार बघेल रानी के समीप एक बावड़ी भी है. रानी महल भारत शासन द्वारा सुरक्षित घोषित कर दिया गया है, पर इसकी भी स्थिति जस की तस बनी हुई है. मोतीमहल से दक्षिण-पश्चिम, लगभग तीस मीटर की दूरी पर एक विष्णु मंदिर स्थित है, जो बाहर से मक़बरे जैसा दिखाई देता है. इस मंदिर का निर्माण हिरदेशाह की पत्नी सुंदरी देवी द्वारा करवाया गया था.  कक्ष के ऊपर एक गुम्बज है और साथ ही प्रत्येक कोने में एक-एक छोटा कक्ष है. प्रत्येक पार्श्व के मध्य में एक खुला बरामदा है. पूर्व में बरामदे के दो स्तंभ गिर चुके हैं, परंतु उसका गारा इतना अच्छा है कि छत अब भी दुरूस्त है. मंदिर का यह वर्णन कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में दिया है. यह मंदिर मध्यकालीन गोंड स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है. मोतीमहल में रखे शिलापट्ट के लेख से ज्ञात होता है कि यह सिंहशाह दयाराम और भगीरथ नाम के स्थानीय कुशल कारीगरों द्वारा बनाया गया था. आज भी इस मंदिर के गुम्बज लगभग उसी प्रकार अक्षुण्ण हैं, जैसा उनका वर्णन कनिंघम की रिपोर्ट में है. पूर्वी बरामदे के भग्न स्तंभों और छत की भी वैसी ही स्थिति है, जैसी कनिंघम के समय थी. जहां तक मंदिर के स्थापत्य का संबंध है तो ज़िले के अन्य किसी भी मंदिर से इसकी समानता नहीं है. इस मंदिर को मध्य प्रदेश शासन ने 1984 में संरक्षित घोषित कर दिया था.

विष्णु मंदिर में प्रतिष्ठित देवमूर्तियों (गणेश, दुर्गा, शिव, सूर्य और विष्णु) में से गणेश व सूर्य गोंडकालीन हैं, शेष कलचुरिकालीन हैं. इस मंदिर का भी बुरा हाल है. रामनगर स्थित रायभगत की कोठी जो कि मोतीमहल से थोड़ी दूरी पर एक विशाल भवन है, जिसे रायभगत की कोठी कहा जाता है. रायभगत राजा हिरदेशाह के दीवान थे. यह भवन दीवान का निवास था. आज भी यह भवन भव्य दिखता है, भवन के प्रवेश द्वार पर स़फेद संगमरमर लगा हुआ है. द्वार के ऊपर नौबतखाना बना हुआ है. 1984 में इसे मध्य प्रदेश शासन द्वारा संरक्षित घोषित किया गया था पर इसकी भी स्थिति जर्जर है. अगर शासन चाहे तो इन सब किलों की हालत आज भी बदल सकती है और रामनगर का नाम  अच्छे पर्यटन स्थलों की लिस्ट मेंं शुमार किया जा सकता है. यह पर्यटन स्थल सरकार की आय का साधन बन सकता है तथा इससे गोंडकालीन इतिहास भी सुरक्षित रह सकेगा. इनकी समुचित देखभाल और विकास तो होना ही चाहिये, साथ ही इन्हें पर्यटन-केंद्रों के रूप मेंइस प्रकार से विकसित किया जाना चाहिए, जिससे कि वे पर्यटन-उत्पाद के रूप में काम आ सके. ऐसे पर्यटन-केंद्र बनने से वंचित स्थलों को सूचीबद्ध किया जाए और इसका सर्वे करके उन्हें संरक्षण व देखभाल की स्थिति में लाया जाए. मंडला ज़िला प्रदेश के मध्य में स्थित है. नर्मदा नदी ज़िले में से होकर बहती है, जिसने यहां के जीवन और चिंतन को सहस्त्राब्दियों से प्रभावित किया है, न केवल भौगोलिक-दृष्टि से बल्कि वैचारिक दृष्टि से भी नार्मदीय क्षेत्र का बहुत महत्व है. निश्चित रूप से मंडला ज़िले में स्थित गोंडकालीन ऐतिहासिक स्थली रामनगर को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की पूरी संभावनाएं हैं, तथा परिस्थितियां भी अनुकूल हैं. नर्मदा के कारण वैसे भी ज़िले की आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्ता है. महत्वपूर्ण किलों, मंदिरों, मूर्तियों व आदिवासी सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण ज़िले मे पर्यटन के विकास की अच्छी संभावनाएं हैं. आवश्यक बस यह है कि इस दिशा में गंभीरतापूर्वक प्रयास किये जाएं. यद्यपि कुछ स्थलों का संरक्षण व रखरखाव किया गया, परंतु अधिकांश स्मारक आज भी उपेक्षित हैं.

निष्कर्षत: धाराशायी होती इस धरोहर को गंभीरतापूर्वक संरक्षण की आवश्यकता है. चूंकि इन स्मारकों में हमारा गौरवशाली इतिहास, संस्कृतिक, कला व पुरातत्व समाहित है. इसलिए नष्ट होती हुई इस विरासत का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है.

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