अधिकतर ग़लतियां अक्सर दिमाग़ से शुरू होती हैं. यह सभी जानते हैं कि सुरक्षा मामलों में गृहमंत्री पी चिदंबरम अमेरिकी नीति के बड़े हिमायती हैं. इस नीति में अपनी कमियों पर ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन सुरक्षा का यह फार्मूला अमेरिका में मुख्य रूप से विदेशी चुनौतियों से निबटने के लिए तैयार किया गया था, न कि अंदरूनी समस्याओं से मुक़ाबला करने के लिए. सुरक्षा मामलों में अमेरिका देशी और बाहरी, दोनों ही चुनौतियों से मुक़ाबला कर रहा है, लेकिन इसके लिए वह एक ही तरीक़े का इस्तेमाल नहीं करता. वहां सीआरपीएफ जैसी कोई सुरक्षा एजेंसी नहीं है. फिर वहां माओवादियों ने इलाक़ों पर अपना अधिकार भी नहीं जमाया है, आम लोगों के रिहायशी इलाक़ों को अपने गढ़ में तब्दील नहीं किया है. उनके लड़ाके वर्दियों में नहीं होते और न ही घर लौटते समय उन्हें वर्दियां बदलने की ज़रूरत होती है. अमेरिका इराक या अ़फग़ानिस्तान में अपनी स्थिति मज़बूत करने की अहमियत को समझता है, लेकिन महत्व के हिसाब से यह उसका तीसरा और आख़िरी विकल्प है. यही वजह है कि या तो ऐसा हो नहीं पाता या फिर इसकी प्रक्रिया इतनी धीमी हो जाती है कि यह नज़र नहीं आता. सुरक्षा एजेंसियों की सारी ऊर्जा विरोधियों के खात्मे और अपनी स्थिति मज़बूत करने में ही ख़त्म हो जाती है. इसका मतलब यह है कि इन एजेंसियों का सबसे बड़ा दायित्व ख़ुद अपनी सुरक्षा करना हो जाता है. चिदंबरम का तर्क है कि माओवादियों के प्रभुत्व वाले इलाक़ों में तब तक कोई विकास कार्य नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें वहां से खदेड़ न दिया जाए. कोबरा फोर्स का गठन इसी इरादे से किया गया था. बाद में इसका नाम बदल कर स्पेशल एक्शन फोर्स कर दिया गया. शायद इसकी वजह यह थी कि आम आदमी के लिए बनी सरकार की सुरक्षा एजेंसी के नाम का सांपों की सबसे विषैली प्रजाति से मेल खाना हो सकता है कुछ लोगों को अतार्किक लगा हो. लेकिन आप नाम ही तो बदल सकते हैं, दिमाग़ी सोच और मानसिकता का क्या करेंगे.
गृह मंत्रालय का यह बहुप्रचारित अभियान अनिश्चितता के भंवर में ऐसे उलझ गया है कि हर चीज़ अस्पष्ट नज़र आती है. सरकार के एक विज्ञापन में लिखा गया है, मैं ग़रीब था और मेरे पास रोज़गार का कोई साधन नहीं था, इसलिए मैं माओवादियों के साथ हो लिया. बंदूक़ मेरी पहचान बन गई. मैंने लोगों की हत्याएं कीं, उनकी गर्दनें काट डालीं, विस्फोट कर पुलों और स्कूलों को उड़ाया. लेकिन मेरे पास अब भी कमाई का कोई साधन नहीं है. मेरे बच्चे स्कूल नहीं जा सकते. मैं न ही अपने परिवार के साथ रह सकता हूं और न ही अपने खेतों में जा सकता हूं. इसके बाद नज़र आता है संदेश, हिंसा का त्याग करें, विकास में साझीदार बनें. यदि इस तथ्य को दरकिनार भी कर दें कि माओवादी सुबह की चाय के साथ हाई प्रोफाइल अंग्रेजी अख़बार नहीं पढ़ते, तो भी यह विज्ञापन हिंसा के रास्ते को त्यागने के बजाय माओवादियों के साथ हो लेने का आमंत्रण ज़्यादा नज़र आता है.
गृह मंत्रालय का यह बहुप्रचारित अभियान अनिश्चितता के भंवर में ऐसे उलझ गया है कि हर चीज़ अस्पष्ट नज़र आती है. सरकार के एक विज्ञापन में लिखा गया है, मैं ग़रीब था और मेरे पास रोज़गार का कोई साधन नहीं था, इसलिए मैं माओवादियों के साथ हो लिया. बंदूक़ मेरी पहचान बन गई. मैंने लोगों की हत्याएं कीं, उनकी गर्दनें काट डालीं, विस्फोट कर पुलों और स्कूलों को उड़ाया. लेकिन मेरे पास अब भी कमाई का कोई साधन नहीं है.
मैं ग़रीब था और अमीरों को और ज़्यादा अमीर बनाने के अलावा सरकार हमारे लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाई. ऐसी हालत में बंदूक़ उठाने के अलावा शायद दूसरा विकल्प भी नहीं है. कोई विकास में साझीदार तभी हो सकता है, जबकि विकास कार्य हों. दंतेवाड़ा मुंबई का मेरीन ड्राइव नहीं है. ग़रीब लोग ग़रीब भले हैं, लेकिन मूर्ख नहीं हैं. उन्हें किसी अलादीन के चिराग से किसी जादू की उम्मीद नहीं है, जो पल भर में उनके सारे अरमानों को पूरा कर दे, लेकिन सरकारी टालमटोल और पक्षपात को वे अपनी क़िस्मत भी नहीं मान सकते. माओवाद की रगों में बहने वाला ख़ून ग़रीबी का है. यदि हम माओवाद को ख़त्म करना चाहते हैं तो पहले ग़रीबी को ख़त्म करना होगा. सुरक्षा के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण का एक विकल्प और भी है, पहले सशक्तिकरण, फिर शिक्षा और अंत में खात्मा. लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी समस्या के समाधान के लिए बंदूक़ आख़िरी विकल्प हो सकती है, न कि पहली. साथ ही यह भी कि कोई सरकार ग़रीब लोगों का विश्वास हासिल करके ही उन्हें बंदूक़ उठाने से रोक सकती है. इस सुझाव में कुछ ऐसा नहीं है, जो अनोखा हो. यदि प्रणब मुखर्जी या एके एंटोनी गृहमंत्री होते तो इस तर्क को बड़ी आसानी से मान लेते. आंध्र प्रदेश में अलग-अलग दलों के नेतृत्व वाली एनटी रामाराव, चंद्रबाबू नायडू और राजशेखर रेड्डी की सरकारों ने सफलतापूर्वक इस नीति को आज़माया था. उन्होंने जगह-जगह पर पुलिस बूथ बनाए और उसे ग्रेहाउंड (शिकारी कुत्ते) नाम दिया, जो लोगों की बोलचाल से जुड़े थे. लोगों का विश्वास हासिल करने के लिए उन्होंने रक्षक वाला रवैया अपनाया, न कि आक्रमणकारी वाला. अनुभवी पुलिस अधिकारियों ने गृह मंत्रालय को सुझाव दिया था कि कोबरा फोर्स का मुख्यालय हैदराबाद में होना चाहिए, ताकि यह इसी पुरानी रणनीति को आत्मसात कर सके, लेकिन चिदंबरम नहीं माने. उन्होंने इसे व्यक्तिगत पहल मान लिया और कोबरा-एसएएफ का मुख्यालय दिल्ली में ही बना रहा.
ग्रेहाउंड्स में ख़ुफिया जानकारियों का चतुराई से इस्तेमाल होता था, जहां चूक होने की आशंका कम होती थी. इसी के साथ आर्थिक विकास की गाड़ी को कमज़ोर-पिछड़े लोगों की ओर मोड़ दिया गया. सद्भावनापूर्ण पक्षपात विकास का मूलमंत्र बन गया. इसमें कोई शक़ नहीं कि यह प्रक्रिया धीमी थी. नक्सलवाद को अगले दो-तीन सालों में ख़त्म कर दिया जाएगा, ऐसे बड़े-बड़े दावे नहीं किए गए. महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि आंध्र प्रदेश के किसी भी राजनीतिज्ञ ने संकट की घड़ी में उल्टे-सीधे बयान देकर ख़ुद को नेपोलियन साबित करने की कोशिश नहीं की. अनुभवी राजनीतिज्ञ जानते हैं कि केवल एक अतिशयोक्तिपूर्ण बयान भी किसी बड़ी पहल को टांय-टांय फिस्स कर सकता है. ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब पश्चिम बंगाल के दौरे पर गए चिदंबरम ने मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार को राज्य में नक्सलवाद के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था. उन्होंने शायद यह कल्पना भी नहीं की होगी कि कुछ ही दिनों के अंदर यह बयान उनके गले की फांस बन जाएगा. लेकिन दंतेवाड़ा के लिए आख़िर ज़िम्मेदार कौन है? चिदंबरम बहाने तलाश करने में व्यस्त हैं, वह यह दावा करते फिर रहे हैं कि यह केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त अभियान था. लेकिन यह सही नहीं है, क्योंकि छत्तीसगढ़ के जंगलों की खाक छान रही कोबरा या स्पेशल एक्शन फोर्स को आदेश दिल्ली से मिल रहे थे. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति हेनरी ट्रूमैन ने अपनी मेज पर एक प्लेट लगाई थी, जिस पर लिखा था, यहां आकर सारी ज़िम्मेदारियां ख़त्म हो जाती हैं. यह वाक्य इतना प्रसिद्ध हो गया कि आम लोगों की बोलचाल का हिस्सा बन गया. एक अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति काल्विन कुलिज ने इससे ज़्यादा तर्कसंगत प्लेट अपनी मेज पर लगाई, मैं अपनी ज़िम्मेदारियां दूसरे पर नहीं थोपूंगा.
अपनी ज़िम्मेदारियों को दूसरों पर थोपने का मतलब देश को गुमराह करना है.
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