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हेडली से 26 नवंबर की पूरी सूची मांगें

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डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी उर्फ जाने क्या-क्या. अलग-अलग पहचान और विश्वासों के साथ केवल एक चीज के प्रति ही हेडली प्रतिबद्ध रहा है, धोखा और अविश्वास के आधुनिकतम सिद्धांतों के प्रति. यह सही है कि आप उसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ अपराधियों की श्रेणी में नहीं रख सकते. दाऊद इब्राहिम तो डेविड का केवल अरबी रूपांतरण ही है, लेकिन फिर भी वह बचा रहा, क्योंकि धंधे के सारे नियम-कायदे वह जानता था और हर हाल में उन पर टिका रहा.

हेडली को शुक्रगुज़ार होना चाहिए, इस बात के लिए कि वह अभी भी ज़िंदा है और ऐसे लोगों की कैद में है जिन्हें उसकी पिछली ज़िंदगी से जुड़ी जानकारियों में खासी रुचि है. उसने अमेरिका को आतंकियों के हाथों बेचा और आतंकियों को अमेरिका के हाथों. और, दोनों इसी गफलत में रहे कि यह उनके लिए फायदे का सौदा है. सच्ची सूचनाएं अभी भी गोपनीयता के अंधेरे में छुपी हैं और यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि हेडली किन लोगों के संपर्क में रहा था.

धंधे के तमाम नियम-क़ायदे एजेंसी-नियंत्रक और प्यादा एवं कठपुतली के बीच रिश्ते की ओर इशारा करते हैं. एजेंट चाहे डबल हों या ट्रिपल या और भी ज़्यादा, ख़ु़फिया अधिकारी जानकारी की सत्यता पर तभी भरोसा करते हैं, जब दुश्मन के साथ उसकी निकटता के पूरे सबूत हों. यह स्थिति शीत युद्ध वाले हालात से भी ज़्यादा जटिल है. उस समय का सिद्धांत था-चारा डालो, पटाओ, काम निकालो और फिर फेंक दो. इस नीति ने ख़ु़फिया अधिकारियों को हलकान कर छोड़ा था. और, कई बार तो तत्कालीन महाशक्तियों का पूरा ख़ु़फिया तंत्र इसमें उलझ कर रह जाता था.

राष्ट्रीयता की सीमा से बाहर निकल चुकी लड़ाई में डबल एजेंट की भूमिका अब बेमानी हो चुकी है. राष्ट्रीयता संकट के क्षणों में छोटी ही सही, लेकिन सुरक्षा के लिए उम्मीद की किरण जगाती है. यह और बात है कि राष्ट्रीयता के बंधनों से मुक्त दुश्मन ज़्यादा ख़तरनाक होता है, क्योंकि उसकी सेवाएं हर किसी के लिए उपलब्ध होती हैं. वह अपने आप में एक विरोधाभास होता है. द्वंद्व से भरा, अपने धंधे में नैतिकता की दुहाई देते हुए वह एक प्रशिक्षित सेल्समैन की तरह अपनी सेवाएं हर किसी को बेचने के लिए तैयार रहता है.

बड़े ओहदों पर काम करने वाले लोग जो उससे संपर्क साधते हैं, उन्हें भी यह पता होता है, लेकिन फिर भी वे इस रिश्ते को आगे बढ़ाते हैं. इस विश्वास के साथ कि जानकारी चाहे कितनी भी कम क्यों न हो, उसकी क़ीमत झूठ के पुलिंदों से कहीं ज़्यादा होती है. इन एजेंटों के तार कई लोगों से जुड़े होते हैं, क्योंकि सबसे मिलकर रहना और सबके पाप में भागीदार होना इनकी सुरक्षा की एकमात्र गारंटी होती है. यदि पकड़े जाने से पहले मौत नहीं हुई तो उनकी ज़ुबान कई लोगों के लिए ख़तरनाक हो सकती है, खासकर ऐसे लोगों के लिए, जो अपनी निजी ज़िंदगी के काले कारनामों को सार्वजनिक नहीं करना चाहते.

हेडली को शुक्रगुज़ार होना चाहिए, इस बात के लिए कि वह अभी भी ज़िंदा है और ऐसे लोगों की कैद में है जिन्हें उसकी पिछली ज़िंदगी से जुड़ी जानकारियों में खासी रुचि है. उसने अमेरिका को आतंकियों के हाथों बेचा और आतंकियों को अमेरिका के हाथों. और, दोनों इसी गफलत में रहे कि यह उनके लिए फायदे का सौदा है. सच्ची सूचनाएं अभी भी गोपनीयता के अंधेरे में छुपी हैं और यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि हेडली किन लोगों के संपर्क में रहा था. हालांकि आप अक्ल दौड़ाएं तो इसका जवाब ढूंढ सकते हैं. यदि शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों से उसके अच्छे संबंध नहीं होते तो भारत से दूर रहने की उसकी इच्छा फलित होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता.

हमारा सवाल यही है कि अमेरिका हेडली को अपने देश में रखने के लिए इतना जोर क्यों दे रहा है. हेडली पर डेनमार्क के एक कार्टूनिस्ट की हत्या की साजिश रचने का आरोप है और 26 नवंबर के मुंबई कांड में अपनी संलिप्तता की बात उसने ख़ुद स्वीकारी है. स्वाभाविक रूप से वह भारत और डेनमार्क का दुश्मन है. भारत का दावा इसलिए ज़्यादा मज़बूत है, क्योंकि कार्टूनिस्ट की हत्या नहीं हुई, लेकिन मुंबई कांड को अंजाम दिया गया.

अमेरिका की सरजमीं पर उसने कोई अपराध नहीं किया है, लेकिन अमेरिका उसे देश में रोके रखने पर आमादा है. पाकिस्तान पहले ही हेडली को अपने देश में रखने से इंकार कर चुका है. कोई भी ख़ु़फिया एजेंसी अपनी गिरफ़्त में आए लोगों को किसी दूसरे के हवाले करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती. वार अगेंस्ट टेरर के इस दौर में भी अमेरिका और ब्रिटेन के बीच ख़ु़फिया सूचनाओं के आदान-प्रदान में शत-प्रतिशत पारदर्शिता की उम्मीद नहीं की जा सकती. अमेरिका और भारत के बीच संबंध अब इतने परिपक्व हो चुके हैं कि भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में सीआईए के एजेंट की मौजूदगी के खुलासे से भी कुछ खास असर नहीं पड़ा. अब उन्हें हेडली के मामले में भी गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए.

आम लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए ही सही, लेकिन भारत को तय समय सीमा के अंदर अमेरिकी निगरानी में हेडली से पूछताछ करने का मौक़ा मिलेगा. लेकिन, हमारे अधिकारी उससे पूछेंगे क्या? इसके लिए सख्त मिजाज़ और अनुभवी अधिकारियों को भेजा जाना चाहिए. पहले से पता चीजों को फिर से पूछने का कोई मतलब नहीं है. हेडली जानकारियों का अथाह भंडार हो सकता है. लश्करे तैयबा, उसके कामकाज के तरीक़ों, रणनीति और पाकिस्तान के साथ संबंधों के बारे में वह कई सूचनाएं दे सकता है. लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि योजना बनाते समय मुंबई हमलों की जानकारी किन लोगों के पास थी और उन्हें यह सूचना कब मिली? हेडली संदेशवाहक था, तो उसने यह संदेश किन लोगों तक पहुंचाया था? जेम्स बांड की मृत्यु हो चुकी है. बांड के दौर का एक ही उसूल था, तीर निशाने पर लगा तो अच्छा, वरना मौत निश्चित थी और कहानी का वहीं पटाक्षेप हो जाता था. 1960-70 के दशक में जॉन ला कैरी के दौर के आते-आते इसमें बदलाव आ चुका था. बांड को यह पता था कि उसके दुश्मन कौन हैं, लेकिन कैरी की किस्मत इतनी अच्छी नहीं थी. उसे अपने दुश्मनों के बारे में भी पता नहीं होता था. भारत के दुश्मनों की भी कोई कमी नहीं है. और, ख़ामोशी उनमें से एक है.

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