जातिगत आरक्षण : व्यवस्थागत खामियों का प्रतिबिंब

सरकारी एवं ग़ैर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा बार-बार हमारे सामने आता रहा है. ठीक उसी दैत्य की तरह, जो हर बार अपनी राख से ही दोबारा पैदा हो जाता है. इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की ज़रूरत है. हमें यह सोचना होगा कि क्या आरक्षण वाकई ज़रूरी है. वैसे तो जाति आधारित आरक्षण को संविधान की शुरुआत के दस साल बाद ही ख़त्म कर दिया जाना चाहिए था, पर हमें आज भी इस आरक्षण के दैत्य से लड़ना पड़ रहा है.  इसकी वजह यह है कि हम समाज के निचले वर्ग को बराबरी का हक़ दे पाने में असफल रहे हैं. समानता की नींव पर मूल्य आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण अभी तक संभव नहीं हो पाया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि सद्‌भावनापूर्ण पक्षपात की अवधारणा पर आधारित आरक्षण की व्यवस्था समाज के सभी तबकों को समानता के स्तर पर लाने के लिए तात्कालिक ज़रूरत थी. लेकिन, यह अभी तक क़ायम है तो इसकी एकमात्र वजह लोकप्रियतावादी राजनीति और किसी अन्य आधार पर समाज को गोलबंद करने में हमारे राजनीतिक दलों की नाकामयाबी है.

सच्चाई तो यह है कि जाति आधारित आरक्षण जैसी बुरी व्यवस्था की ज़रूरत ही नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन जैसा कि अरस्तू और उनके जैसे अन्य समाजशास्त्री कहते हैं, बराबर वालों के साथ बराबरी का व्यवहार किया जाना चाहिए और जो बराबर नहीं हैं, उनके साथ उनके स्तर का ही व्यवहार किया जाना चाहिए. इस तरह एक ऐसा समाज जो जाति के अलावा अन्य कई स्तरों पर भी बंटा हुआ था, उसमें सामाजिक संतुलन को बनाए रखने और हर इंसान को व्यक्तिगत विकास के बराबर मौक़े उपलब्ध हों, यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ क़दम उठाना व़क्त की ज़रूरत थी.

एक ओर वे लोग हैं, जो हज़ारों सालों से सामाजिक पिरामिड के शीर्ष पर बने रहे हैं और दूसरी ओर वे लोग हैं, जो सदियों से प्रताड़ना के शिकार होते रहे हैं. ऐसे में आप इन दोनों वर्गों के बीच बराबरी के व्यवहार की उम्मीद भी नहीं कर सकते. यदि हम में से कुछ लोग योग्यता और क्षमता के पैमाने पर समाज के हर तबके के साथ बराबरी के व्यवहार का तर्क रखते हैं तो यह भी याद रखना होगा कि समाज के एक वर्ग विशेष से संबंधित होने के चलते हमारे अंदर स्वाभाविक पूर्वाग्रह भी मौजूद होते हैं. हो सकता है, हम इन दुर्भावनाओं के प्रति जागरूक न हों, लेकिन फिर भी हम इन्हें आसानी से अपने अंदर पाल लेते हैं, उन्हें तार्किकता की कसौटी पर कसने की कोशिश करते हैं तो इसकी वजह यही है कि इनसे हमारी ख़ुद की भलाई जुड़ी होती है. आख़िरकार दुनिया असमानताओं से भरी है, जहां समाज अलग-अलग स्तरों पर बंटा हुआ है. समाज में उच्च और निम्न दो स्तर हैं, जो प्रतियोगिता, सामाजिक आत्मविश्वास, सांस्कृतिक श्रेष्ठता, सामाजिक वातावरण, वास्तविकताओं एवं अवसरों, स्वहित की पहचान और यहां तक की अनुवांशिक पहचान के आधारों पर एकदम अलग हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं कि सद्‌भावनापूर्ण पक्षपात की अवधारणा पर आधारित आरक्षण की व्यवस्था समाज के सभी तबकों को समानता के स्तर पर लाने के लिए तात्कालिक ज़रूरत थी. लेकिन, यह अभी तक क़ायम है तो इसकी एकमात्र वजह लोकप्रियतावादी राजनीति और किसी अन्य आधार पर समाज को गोलबंद करने में हमारे राजनीतिक दलों की नाकामयाबी है. यदि हम समाज के कमज़ोर और अधिकार विहीन तबके को ज़िंदगी की ज़रूरी सुविधाएं मुहैया कराने में सफल हुए होते तो वही लोग आज आरक्षण की इस व्यवस्था के ख़िला़फ उठ खड़े हो चुके होते या फिर आरक्षण का मुद्दा आज भारतीय राजनीति में हाशिए पर आ चुका होता.

सच्चाई यह है कि हम आज भी सबको उचित शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने में सक्षम नहीं हैं. विशेषकर उन्हें, जो समाज में हाशिए पर हैं. आरक्षण ने सामर्थ्य और योग्यता के नाम पर भारतीय समाज के विशेष अधिकार पाने वाले और विशेष अधिकार न पाने वाले वर्गों के बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी है. समाज का कमज़ोर तबका ख़ुद पर शासन करने वाले तबके के मुक़ाबले स्वाभाविक रूप से सुविधाहीन है. स़िर्फ इसीलिए नहीं कि पक्षपात का लंबा इतिहास है, बल्कि इसलिए भी, क्योंकि वह लगातार दुराग्रह और दुर्भावनाओं का शिकार होता रहा है. आज़ादी के साठ साल बीत जाने के बाद भी हम समाज के सभी वर्गों के लिए उचित शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित नहीं करा पाए हैं, जिससे कमज़ोर तबका सालों से फायदे में रहने वाले तबके से बराबरी के आधार पर मुक़ाबला कर सके और इसीलिए आरक्षण का जिन्न बार-बार बोतल से बाहर आकर उछलने लगता है.

हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि लोकतंत्र में संख्या बल की बड़ी भूमिका होती है. इसीलिए जब एक विकासशील लोकतांत्रिक समाज में कमज़ोर और अधिकारों से वंचित लोगों को परे धकेल दिया जाता है तो वे स्वाभाविक रूप से अपनी संख्या की ताक़त का सहारा लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं. फिर अंकों का यह खेल राजनीति पर हावी होने लगता है और सामाजिक स्तर पर संख्या बल का इस्तेमाल सामाजिक हैसियत को ऊपर उठाने के लिए होने लगता है. भारत में पिछले कुछ समय से ऐसा ही हो रहा है. जाति पर आधारित राजनीतिक दलों और समूहों का देश में हुआ विकास इसी बात की पुष्टि करता है.

अगर हम पिछले कुछ समय की राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि राजनीतिक पार्टियां ख़ुद में सीमित होती जा रही हैं. एक जाति विशेष की राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हुए वे यह उम्मीद करती हैं कि इससे उनकी आकांक्षाओं को ज़्यादा अहमियत मिलेगी. इसीलिए भारतीय समाज में लोकतांत्रिक भावना और सेवाओं ने जातिगत आरक्षण का विकृत रूप धारण कर लिया. यही वजह है कि भारत जैसे बहुलवादी देश में आज गठबंधन की सरकार है, जो समाज के अलग-अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक समूहों के सहयोग से बनी है. पहचान पर आधारित राजनीति करके उक्त दल लगातार विकास कर रहे हैं. ग़ौरतलब है, पिछले कुछ समय से राजनीति का यह अंदाज़ भारत में लगातार बुलंदियों पर है.

ये सभी एक पिछड़े और पुरातनपंथी समाज के लक्षण हैं. जब तक हम समाज के सभी वर्गों को वास्तविक रूप से समानता की रेखा पर नहीं लाते, तब तक इस तरह की संकीर्ण विचारधारा हमारी राजनीति पर हावी रहेगी. किसी भी समाज के संतुलित विकास की पहली शर्त यही होती है कि मानव संसाधनों पर निवेश किया जाए. बहुत पहले जॉन स्टुअर्ट मिल ने भी इस तथ्य को स्वीकारते हुए कहा था कि कम योग्यता, संकीर्ण सोच और दोहरे चरित्र वाले लोगों के साथ एक महान देश की कल्पना नहीं की जा सकती.

भले ही पहली नज़र में जाति आधारित आरक्षण नकारात्मक प्रतीत होता है, लेकिन हमारे समाज में इसकी दूसरी भूमिका भी है. अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई देशों में कई ऐसे हैं, जो भारत के साथ ही विकास की राह पर अग्रसर हुए थे, लेकिन आज वे दौड़ में पीछे छूट चुके हैं, जबकि भारत दिनोंदिन एक ताक़तवर देश के रूप में उभर रहा है. इसका कारण है कि हमने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सामाजिक मूल्यों के विभाजन में संतुलित रवैया अपनाने की लगातार कोशिश की है. यहां सभी वर्गों के नैतिक मूल्य आज भी जीवित हैं. जबकि इसी प्रयास में अन्य देशों को रक्तपात का सामना करना पड़ा और आज वे या तो हाशिए पर हैं या सामाजिक रूप से असफल हो चुके हैं.  वहीं भारत सुदृढ़ बन रहा है और यहां सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं. इन बदलावों की गति धीमी ज़रूर है, यह एक शांतिपूर्ण क्रांति की तरह है, लेकिन इन बदलावों से लगभग सभी वर्गों के लोग संतुष्ट हैं.

हाल में आए सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए, जिसमें क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई है. लेकिन इसका दायरा बढ़ा कर इसमें अनुसूचित जाति और जनजातियों को भी शामिल किया जाना चाहिए. जिस तरह ओबीसी के क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का तर्क दिया गया, उसी तरह अनुसूचित जाति एवं आदिवासियों के क्रीमी लेयर को भी आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए. हालांकि क्रीमी लेयर का मापदंड क्या हो, यह सवाल अभी भी तमाम विसंगतियों से जूझ रहा है और इसीलिए इसे सुधारने एवं तर्कसंगत बनाने की ज़रूरत है.

सुप्रीमकोर्ट का मानना है कि ग्रेजुएट लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए, लेकिन जिस दर से हमारे देश में ग्रेजुएट पैदा हो रहे हैं, उसे देखते हुए यह तर्कसंगत नहीं लगता है. हमें यह मानने से गुरेज नहीं करना चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में तमाम तरह की ख़ामियां हैं. हमारे शिक्षा तंत्र के विभिन्न स्तरों पर जिस तरह शिक्षकों की नियुक्ति होती है, जिस तरह राजनीति का खेल खेला जाता है, उसके बारे में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है. राजनीतिक खींचतान से शिक्षा व्यवस्था प्रभावित है और इससे कई बार शिक्षा की गुणवत्ता भी पृष्ठभूमि में जाने को मजबूर होती है. राजनीतिक दखलंदाज़ी और आपसी खींचतान ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को आज मौजूदा हाल में ला खड़ा किया है. हालांकि इसमें कई अपवाद भी हैं, लेकिन अपवाद तो अपवाद ही होते हैं. हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था को इनसे छुटकारा दिलाने की ज़रूरत है.

मौजूदा समय में जाति आधारित आरक्षण भले ही सुनने में बेसुरा लगे, लेकिन यह हमारे समाज की सच्चाई है और यह शायद तब तक जारी रहेगा, जब तक हम इस बात की गारंटी नहीं देते कि सभी वर्गों को शिक्षा एवं स्वास्थ्य की समान सुविधाएं मिल रही हैं और सभी वर्गों को विकास के समान अवसर मिल रहे हैं. सभी के लिए समान अवसरों के साथ प्रगतिवादी और समतामूलक समाज का निर्माण आज हमारी ज़रूरत बन चुका है. और, ऐसा होने के बाद ही जाति आधारित आरक्षण की राजनीति के ताबूत में आख़िरी कील ठोंकने की उम्मीद की जा सकती है.

(लेखक प. बंगाल में आईएएस अधिकारी हैं, आलेख में व्‍यक्‍त विचार उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं