ज़िलाध्यक्ष चुनाव में भाजपा की नाक कटी

गठबंधन के सहारे सत्ता में पहुंचकर भारतीय जनता पार्टी में अब वे सारे दुर्गुण आ गए हैं, जो सत्ताधारी दलों में सत्ता की गंध से उत्पन्न हो जाते हैं. यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी में भी सत्ता की सोंधी महक ने सांगठनिक चुनाव में पद पाने की लालसा से पार्टीजनों के बीच विवाद को बढ़ा दिया है. सबसे अहम बात तो यह है कि जातीय राजनीति से दूर रहने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी अब अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह जातीय राजनीति से घिर गई है. इसका उदाहरण है गया ज़िला भाजपा अध्यक्ष का चुनाव. चुनाव के दौरान और बाद में गया ज़िले के भाजपाई जिस तरह जातीयता के आधार पर बंट गए हैं, एक-दूसरे के खिला़फ बयानबाज़ी कर रहे हैं, वह भाजपा जैसे राजनीतिक दल के लिए शर्म करने की बात है.

ज़िला भाजपा के नेता, वरीय कार्यकर्ताओं की ओर से आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाज़ी जारी है. इन सबके बावजूद विधान सभा में गया शहर के प्रतिनिधि और ज़िले के इकलौते भाजपा विधायक पथ निर्माण मंत्री, डॉ. प्रेम कुमार के साथ-साथ अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं की गहरी चुप्पी ने इस मामले के रहस्य को और गहरा कर दिया है. स्थिति चाहे जो हो, लेकिन इतना तय है कि गया ज़िला भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में जातीयता की बू के साथ जो बातें सामने आई हैं.

बात यहीं तक रहती तो कोई बात थी, (क्योंकि बिहार की राजनीति में जातीयता की बू कमोबेश हर दल में देखी जाती है), मामला चुनाव में मार-पीट, छीना-झपटी, जाति विशेष के खिला़फ गाली-गलौज करने के आरोप-प्रत्यारोप से आगे ब़ढते हुए गया के कोतवाली थाने तक पहुंच गया. गया ज़िला भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में चार उम्मीदवारों के नामांकन के बाद चुनाव पदाधिकारी रत्नेश कुमार सिंह और सहायक चुनाव पदाधिकारी मृत्युंजय झा ने ज़िला भाजपा के वरीय नेताओं के विचार-विमर्श से अध्यक्ष पद के लिए सर्वसम्मत निर्वाचन कराने का प्रयास किया. इस प्रयास से इतना हुआ कि सुनील सिन्हा और महेश शर्मा ने अपने नामांकन वापस ले लिए. चुनाव मैदान में दो उम्मीदवार जैनेन्द्र कुमार और अजय कुशवाहा रह गए. अंतत: मतदान कराया गया, जिसमें जैनेन्द्र कुमार को 27 और अजय कुशवाहा को 17 मत मिले. परिणाम की घोषणा के बाद ही पराजित खेमे ने आरोप लगाया कि चुनाव में धांधली हुई है. ज़िला भाजपा अध्यक्ष पद के पराजित उम्मीदवार परिणाम घोषणा के कुछ देर बाद ही अपने समर्थकों के साथ कोतवाली थाना पहुंचे और नवनिर्वाचित अध्यक्ष जैनेन्द्र कुमार समेत महेश शर्मा, राजीव कन्हैया आदि पर मार-पीट कर सोने का चेन और नगद राशि लूट लेने के साथ जाति विशेष को गाली देने की प्राथमिकी दर्ज़ कराई. कुशवाहा ने प्राथमिकी में आरोप लगाया कि यह सब पूर्व ज़िला अध्यक्ष कृष्ण कुमार सिंह के इशारे पर हुआ है, जबकि कृष्ण कुमार सिंह ने इसे बेबुनियाद बताया. बहुत मशक्कत के बाद कोतवाली थाने में प्राथमिकी जब दर्ज़ कर ली गई तो इसके विरोध स्वरूप दूसरे दिन नव निर्वाचित अध्यक्ष जैनेन्द्र कुमार के संरक्षक कृष्ण कुमार सिंह अपने समर्थकों के साथ कोतवाली थाना गिरफ़्तारी देने पहुंचे. पुलिस पदाधिकारियों ने यह कहते हुए गिरफ़्तारी से इंकार कर दिया कि प्राथमिकी दर्ज़ ज़रूर हुई है, लेकिन जांच के बाद ही पुलिस कोई कार्रवाई करेगी. दूसरी ओर अजय कुशवाहा का कहना है कि गया ज़िला भाजपा को किसी व्यक्ति विशेष की पार्टी कहे जाने से छुटकारा दिलाने तक संघर्ष जारी रहेगा.

पुलिस इस पूरे प्रकरण पर नज़र रखते हुए जांच करने में लगी है. ज़िला भाजपा के नेता, वरीय कार्यकर्ताओं की ओर से आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाज़ी जारी है. इन सबके बावजूद विधान सभा में गया शहर के प्रतिनिधि और ज़िले के इकलौते भाजपा विधायक पथ निर्माण मंत्री, डॉ. प्रेम कुमार के साथ-साथ अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं की गहरी चुप्पी ने इस मामले के रहस्य को और गहरा कर दिया है. स्थिति चाहे जो हो, लेकिन इतना तय है कि गया ज़िला भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में जातीयता की बू के साथ जो बातें सामने आई हैं. उसका असर कहीं दूर तलक जाएगा. हो सकता है इसकी चिंगारी आगामी विधान सभा चुनाव में भड़क जाए, जिसकी क्षति भाजपा को उठानी पड़ सकती है. हालांकि इस मामले में बड़े भाजपा नेता फूंक-फूंक कर क़दम उठाने के प्रयास में कुछ भी कहने से कतरा रहे हैं.

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