केवल उद्देश्य अच्छा होने से बात नहीं बनती

ज्‍यादा उत्साह स्पष्ट लक्ष्यों का कोई विकल्प नहीं है. महिला आरक्षण बिल की नेकनीयती को लेकर कोई संदेह नहीं, समस्या तो बिल के प्रावधानों को अमल में लाने के तरीक़ों पर है. ऐसा लगता है, जैसे राजनीतिक रूप से सही दिखने की चाहत में राजनीतिक वास्तविकताओं को परे रख दिया गया है. महिलाओं को आरक्षण क्यों चाहिए. आबादी के हिसाब से देखें तो चुनावी गणित में वे सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण हैं. देश का हर दूसरा वोटर एक महिला है. यदि यह वोट बैंक लिंग को इतनी अहमियत देता तो अधिसंख्य सांसद महिलाएं ही होतीं. लेकिन, वास्तविकताओं की कसौटी पर सिद्घांत अक्सर खरे नहीं उतर पाते हैं और कई बार तो उनके बीच ज़मीन-आसमान का फर्क़ नज़र आता है.

सशक्तीकरण हर महिला का अधिकार होना चाहिए, न कि किसी वर्ग विशेष का. इस तर्क, कि क़ानूनी बाध्यताओं के  बिना भी राजनीतिक दल चाहें तो किसी खास जाति या धर्म से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं को अपना प्रत्याशी बना सकते हैं, में कोई दम नहीं है. आख़िर पिछले छह दशकों में भाजपा या कांग्रेस पार्टी चाहती तो महिलाओं को आधी सीटों पर अपना उम्मीदवार बना सकती थी.

कोई भी राजनीतिक दल जब अपने प्रत्याशियों का चुनाव करता है तो उसका सबसे बड़ा आधार उसकी जीत हासिल करने की संभावना होती है. देश की दो सबसे शक्तिशाली महिला राजनीतिज्ञ, सोनिया गांधी और शीला दीक्षित मौजूदा समय में दिल्ली में कांग्रेस की खेवनहार हैं. उनकी धर्म निरपेक्ष विचारधारा पर भी संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. इन दोनों ने मिलकर लोकसभा चुनावों में दिल्ली की सात सीटों के लिए केवल एक महिला को चुना, जो अल्पसंख्यक समुदाय से नहीं आतीं. जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को पार्टी ने अपना प्रत्याशी चुना, लेकिन जब उनकी जीतने की संभावना संदेहास्पद दिखने लगी तो उनके नाम वापस ले लिए गए. यही राजनीति की हक़ीक़त है और यही वजह है कि महिला आरक्षण का मुद्दा इतना ज़ोर पकड़ने लगा, क्योंकि जब सभी प्रत्याशी महिला ही हों तो जीतने की संभावना का फैक्टर पृष्ठभूमि में चला जाता है. लेकिन, सभी महिलाएं एक ही विचारधारा को नहीं मानतीं. उनकी सोच अलग-अलग होती है, जो उनकी सामाजिक-आर्थिक हालत की ज़मीन पर तैयार होती है. जिस तरह लिंग-भेद रहित चुनाव में पुरूष स्वाभाविक रूप से महिलाओं के मुक़ाबले बढ़त की हालत में होते हैं, उसी तरह जाति, धर्म या सामाजिक-आर्थिक कारकों के चलते महिलाओं का एक वर्ग भी अन्य महिलाओं से बढ़त की हालत में होता है. जिस तर्क के आधार पर पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को आरक्षण देने की बात की जा रही है, वही तर्क आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग को भी जायज़ ठहराता है.

सशक्तीकरण हर महिला का अधिकार होना चाहिए, न कि किसी वर्ग विशेष का. इस तर्क, कि क़ानूनी बाध्यताओं के  बिना भी राजनीतिक दल चाहें तो किसी खास जाति या धर्म से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं को अपना प्रत्याशी बना सकते हैं, में कोई दम नहीं है. आख़िर पिछले छह दशकों में भाजपा या कांग्रेस पार्टी चाहती तो महिलाओं को आधी सीटों पर अपना उम्मीदवार बना सकती थी. उन्हें ऐसा करने से किसी ने भी नहीं रोका था, लेकिन उन्होंने नहीं किया. कोटे के भीतर कोटे का प्रावधान न हो तो महिलाओं के सशक्तीकरण का उद्देश्य उनके लिए आरक्षित सीटों पर भी जीतने की संभावना वाले फैक्टर की भेंट चढ़ जाएगा. चूंकि यह कोई सामान्य बिल नहीं, बल्कि एक संवैधानिक संशोधन है, इसलिए ज़रूरी है कि इसमें ऐसे प्रावधान किए जाएं, जिनसे इसकी वैधता को कठघरे में खड़ा न किया जा सके. इतना ही नहीं, बिल में कुछ ऐसे प्रावधान भी हैं, जो देश में संसदीय व्यवस्था की पहले से कमज़ोर पड़ी साख को और कमज़ोर कर सकते हैं.

हमारे संसदीय लोकतंत्र का आधार उम्मीदवारों और मतदाताओं के बीच एक करार है. जीतने वाले उम्मीदवार से वोट के बदले उस क्षेत्र के विकास की उम्मीद की जाती है. अपनी इस ज़िम्मेदारी का निर्वाह निर्वाचित सांसद कैसे करते हैं, यह उनके दोबारा निर्वाचन की संभावनाओं को प्रभावित करता है. हालांकि यह अकेला निर्णायक कारक नहीं है, लेकिन ऐसा कारक ज़रूर है, जो सांसदों को थोड़ा-बहुत ही सही, व्यवहारिकता के धरातल पर आने को मजबूर करता है. 108वें संविधान संशोधन विधेयक में सीटों को बारी-बारी से आरक्षित किए जाने का प्रावधान है. इसका मतलब है कि लोकसभा के क़रीब दो-तिहाई अर्थात 360 सदस्य एक बार ही अपने क्षेत्र से चुने जा सकेंगे. इनमें 181 वे सीटें हैं, जो पहली बार आरक्षित होंगी और 181 वे सीटें हैं, जिन्हें अगले चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा. इन दो श्रेणियों में आने वाली सीटों पर जीते हुए उम्मीदवार दोबारा चुनाव लड़ने की हालत में नहीं होंगे. हालांकि, कोई महिला उम्मीदवार चाहे तो अपनी सीट के अनारक्षित होने के बाद भी उस सीट से दोबारा चुनाव लड़ सकती है, लेकिन ऐसा होने की संभावना कम ही है. इस तरह लोकसभा के दो-तिहाई सदस्यों के पास अपने चुनाव क्षेत्र पर ध्यान देने का कोई राजनीतिक मक़सद नहीं होगा. राजनीति में नैतिकता की जो हालत है, उसे देखते हुए यह व्यवस्था सांसदों एवं मंत्रियों को अपने कार्यकाल के भीतर अपने व्यक्तिगत हितसाधन का लाइसेंस देने के समान होगी. लोग यह तर्क दे सकते हैं कि इससे ज़्यादा फर्क़ नहीं पड़ने वाला, क्योंकि राष्ट्रीय या अपने क्षेत्र विशेष के  विकास के मामले में सांसद पहले भी अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर भागते रहे हैं. यदि हम इस राजनीतिक हक़ीक़त से वाक़ि़फ हैं तो सबसे पहले और सबसे ज़्यादा वोट हासिल करने वाले को विजयी मानने की प्रचलित विचारधारा की जगह हमें देश में संसदीय लोकतंत्र की दूसरी परिभाषा तलाश करनी होगी. इसका एक विकल्प यह हो सकता है कि राजनीतिक दल मिले वोटों के अनुपात में अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को संसद में नामित करें. इस आधार पर संसद के दो-तिहाई सदस्यों का चुनाव किया जा सकता है. इस तरीक़े से सांसद और मतदाताओं के  बीच सीधे संबंध को आधिकारिक रूप से ख़त्म किया जा सकता है. राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व के लिए यह व्यवस्था बिन मांगी मुराद से कम नहीं होगी.

यदि इस ओर ध्यान दिया जाए तो महिला आरक्षण बिल की कमियों को आसानी से दूर किया जा सकता है. लेकिन, अब तक जो देखने को मिला है, उसमें ऐसी संभावना नहीं बनती. बिल के समर्थक अपनी कामयाबी पर इतराते नहीं थक रहे, जबकि इसके विरोधियों को लगता है कि हल्ला-हंगामा करने भर से उनके तर्कों को मान लिया जाएगा. बिल के समर्थकों ने अपनी ख़ुशी जताने के लिए मीडिया का सहारा लिया तो उसके विरोधियों ने अपनी बातों को प्रभावशाली ढंग से रखने के लिए भी मीडिया के इतर साधनों का भी बख़ूबी इस्तेमाल किया. कांग्रेस पार्टी शुरुआत में तो बिल को लेकर काफी उत्साह में थी, लेकिन जब देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रतिक्रियाएं मिलने लगीं तो उसके क़दम डगमगाने लगे. सरकार राजनीतिक दलों के विरोध से निश्चिंत थी, लेकिन वह मतदाताओं की नाराज़गी का ख़तरा मोल नहीं ले सकती. महिलाओं का सशक्तीकरण एक आवश्यक और उद्देश्यपूर्ण लक्ष्य है, लेकिन इसे हासिल करने का रास्ता क्या हो, इस पर गंभीरता से तार्किक आधार पर विचार किए जाने की ज़रूरत है.

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