उन्नीसवें राष्ट्रमंडल खेलों के शुरुआत की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, लेकिन इसके लिए तैयारियों का आलम यह है कि आयोजकों के जुबानी जमाखर्च के अलावा और कुछ खास देखने को नहीं मिलता. खेलों के लिए बनी आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी यह कहते नहीं थकते कि समय रहते सारी तैयारियां पूरी हो जाएंगी, लेकिन हालत यह है कि मुख्य स्टेडियम और स्वीमिंग कॉम्प्लेक्स अब तक तैयार नहीं हो पाया है. स्टेडियम तक पहुंचने के लिए बन रहे फ्लाईओवर और मेट्रो रेल परियोजनाएं भी अटकी पड़ी हैं लेकिन आयोजक निश्चिंत हैं. वे तो शायद यह भी भूल गए हैं कि जून-जुलाई में मानसून की आमद से पहले यदि सारे काम निपटा नहीं लिए गए तो सारी दुनिया के सामने भारत को शर्मसार होना पड़ सकता है.
तैयारियों के बाबत पूछे जाने पर तैयारी समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी सीजीएफ को भारतीय शादी का उदाहरण देते हैं. उन्हें भरोसा है कि जिस तरह अपने देश में शादियों में बाहर से देखने से सब कुछ अव्यवस्थित लगता है लेकिन शादी के फेरों की शुरुआत होते-होते सारा कुछ अपनी जगह पर होता है, उसी तरह खेलों की शुरुआत से पहले सारी चीजें व्यवस्थित हो जाएंगी. लेकिन कलमाडी यह भूल गए हैं कि अपने देश में कई बार कुव्यवस्था के कारण कुछ रसूखदार लोग बारात वापस भी ले जाते हैं.
कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (सीजीएफ) के अध्यक्ष माइक फेनेल कुछ दिनों पहले तैयारियों का जायजा लेने नई दिल्ली पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. मीडियाकर्मियों से बातचीत में उन्होंने स्पष्ट बताया कि तैयारियां काफी पीछे चल रही हैं और उन्हें संदेह है कि समय रहते सब कुछ तैयार हो पाएगा. उधर फेडरेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइक हूपर कहते हैं कि आयोजन समिति अपने वादों को पूरा नहीं कर रही है. हूपर के मुताबिक समिति ने पहले बताया था कि मुख्य स्टेडियम मार्च तक तैयार हो जाएगा. अब उन्होंने इसे खुद ही बढाकर जून कर दिया है. हूपर हैरत में हैं क्योंकि उनके मुताबिक तैयारी पूरी होने के बाद कम से कम दो महीने का समय तैयारियों की परीक्षा में और उसकी व्यवहारिक उपयोगिता में लगेगा. राष्ट्रमंडल खेलों की विधिवत शुरुआत से पहले सारी तैयारियों को आजमाना होगा, यह सुनिश्चित करना होगा कि आखिरी समय में सारे कल-पुर्जे अपनी जगह तंदुरुस्त हों. लेकिन खेल आयोजन समिति इन चिंताओं से बेखबर है.
तैयारियों के बाबत पूछे जाने पर तैयारी समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी सीजीएफ को भारतीय शादी का उदाहरण देते हैं. उन्हें भरोसा है कि जिस तरह अपने देश में शादियों में बाहर से देखने से सब कुछ अव्यवस्थित लगता है लेकिन शादी के फेरों की शुरुआत होते-होते सारा कुछ अपनी जगह पर होता है, उसी तरह खेलों की शुरुआत से पहले सारी चीजें व्यवस्थित हो जाएंगी. लेकिन कलमाडी यह भूल गए हैं कि अपने देश में कई बार कुव्यवस्था के कारण कुछ रसूखदार लोग बारात वापस भी ले जाते हैं. फिर भी वह यहां तक दावा करते हैं कि भारत में होने वाला राष्ट्रमंडल खेल मैनचेस्टर और मेलबर्न के मुकाबले कहीं भव्य और संगठित होगा. हो सकता है कि कलमाडी अपने दावे पर खरे उतर जाएं, पर खेल के आयोजन से जुड़े कई अन्य लोग कलमाडी की बातों से इत्तफाक नहीं रखते. तैयारियों को लेकर पिछले साल अक्टूबर में कलमाडी और हूपर के बीच छिड़ी जंग के बाद कोई खुलकर नहीं बोलना चाहता, लेकिन दबी जुबान से अधिकारियों को कोसते हैं. साल 2003 में भारत में उन्नीसवें राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को सीजीएफ ने मंजूरी दी थी. पिछले सात सालों में यदि योजनाबद्ध तरीके से तैयारियों को अंजाम दिया गया होता तो आज न यह भागमभाग वाली स्थिति होती और न ही आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर आता. लेकिन यदि आयोजक ही इतने बड़े आयोजन को एक परंगरागरत भारतीय शादी के पैमाने पर तौल रहे हों तो क्या कहा जा सकता है.
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