छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में नक्सली हमले में एक साथ 76 लोगों की मौत ने देश में लगातार गंभीर बनती जा रही इस समस्या की ओर फिर से ध्यान खींचा है. नक्सलियों की बढ़ती ताक़त, उनके प्रभाव क्षेत्र में विस्तार और मारक क्षमता के मद्देनज़र यह ज़रूरी है कि हम इस समस्या की गंभीरता पर नए सिरे से विचार करें. गुरिल्ला युद्ध कला की तकनीकों में पारंगत नक्सलियों के पास चाक-चौबंद ख़ु़फिया तंत्र मौजूद है. प्रेरक नेतृत्व, प्रतिबद्ध कैडर, प्रशिक्षित लड़ाके और अत्याधुनिक हथियार, नक्सली आज इस हालत में हैं कि सुरक्षा एजेंसियों की ख़ु़फिया जानकारियां भी आसानी से उन्हें उपलब्ध हो जाती हैं और वे अपनी मर्ज़ी से कभी भी और कहीं भी हमला कर सकते हैं.
आम जनता का समर्थन मिलता रहे, इसके लिए नक्सली जंगली इलाक़ों में विकास की किसी भी परियोजना का विरोध करते हैं. लोगों के दिलों में यह भय पैदा करते हैं कि विकास परियोजनाओं का असल उद्देश्य उनकी ज़मीन और अन्य संपत्तियों पर क़ब्ज़ा करना है. सच्चाई यह है कि सरकार की विकास परियोजनाएं यदि सफल हो जाएं तो नक्सली आम जनता को उसके ख़िला़फ गोलबंद करने में कामयाब नहीं हो पाएंगे. अल्प विकास और पिछड़ापन निर्दोष जनता को सरकार के ख़िला़फखड़ा करने में नक्सलियों के लिए कारगर हथियार का काम करता है.
नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र देश के 170 से भी ज़्यादा ज़िलों में फैला है. भूमि सुधारों की कमी, जंगलों के विनाश, माइनिंग या सिंचाई क्षेत्र की विकास परियोजनाओं के चलते विस्थापित हुए आदिवासियों एवं छोटे किसानों और सबसे बढ़कर विकास में क्षेत्रीय असंतुलन का फायदा उठाकर आज वे इस हालत में पहुंच गए हैं. सबसे ज़्यादा हैरानी तो यह जानकर होती है कि नक्सल प्रभावित ज़िलों का दो-तिहाई हिस्सा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ही है. आदिवासी एवं छोटे किसान नक्सलियों के कैडर का सबसे अहम हिस्सा हैं. उनके साथ कुछ डॉक्टर, इंजीनियर और बुद्धिजीवी वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोग भी हैं, जो विध्वंसक कार्रवाइयों में उनके लिए विशेषज्ञ सलाह उपलब्ध कराते हैं. प्रतिबद्ध एवं प्रेरक नेतृत्व, कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज और राष्ट्रविरोधी ताक़तों से मिल रही मदद के सहारे नक्सली आज इतने मज़बूत हो चुके हैं कि राष्ट्र की सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा बन गए हैं.
कॉम्पैक्ट रिवॉल्यूशनरी ज़ोन (सीआरजेड) के नाम से मशहूर रेड कॉरिडोर नेपाल से शुरू होकर भारत के कुछ सबसे पिछड़े इलाक़ों तक फैला है. इसमें बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और महाराष्ट्र के कुछ इलाक़े शामिल हैं. नक्सलियों का पहला लक्ष्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और महाराष्ट्र के कुछ ज़िलों तक फैले दंडकारण्य वन क्षेत्र में अपने लिए एक बेस एरिया तैयार करना है. द एनेमी विदिन, द फिफ्थ कॉलमिस्ट एवं द ट्रॉजन हॉर्स जैसे नामों से पुकारे जाने वाले नक्सली पिछड़े और अविकसित इलाक़ों में ज़्यादा सक्रिय हैं, क्योंकि इन इलाक़ों में रहने वाले लोग उनकी बातों-प्रोपेगेंडा पर आसानी से यक़ीन कर लेते हैं. शिक्षा एवं विकास से दूर ग़रीबी एवं भूख से बेहाल भोली-भाली जनता नक्सलियों के बहकावे में आकर उनकी बातें मानने के लिए तैयार हो जाती है. आदिवासी बहुल कई इलाक़ों में तो नक्सलियों का समानांतर प्रशासन भी चलता है. वे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और जन अदालतों का संचालन करते हैं तो ठेकेदारों, खदान मालिकों एवं उद्योगपतियों और यहां तक कि सरकारी अधिकारियों से भी लेवी के रूप में पैसा वसूल करते हैं.
आम जनता का समर्थन मिलता रहे, इसके लिए नक्सली जंगली इलाक़ों में विकास की किसी भी परियोजना का विरोध करते हैं. लोगों के दिलों में यह भय पैदा करते हैं कि विकास परियोजनाओं का असल उद्देश्य उनकी ज़मीन और अन्य संपत्तियों पर क़ब्ज़ा करना है. सच्चाई यह है कि सरकार की विकास परियोजनाएं यदि सफल हो जाएं तो नक्सली आम जनता को उसके ख़िला़फ गोलबंद करने में कामयाब नहीं हो पाएंगे. अल्प विकास और पिछड़ापन निर्दोष जनता को सरकार के ख़िला़फखड़ा करने में नक्सलियों के लिए कारगर हथियार का काम करता है. यह स्थापित सत्य है कि नक्सलियों के तार देश के अंदर और बाहर अलगाववादी और विध्वंसकारी शक्तियों के साथ भी जुड़े हैं. उक्त ताक़तें नक्सलियों की बेजा मांगों, जैसे आत्म निर्णय का अधिकार आदि का समर्थन करती हैं, जो देश की एकता और अखंडता के लिहाज से खतरनाक है. ऐसे सिद्धांत और आदर्शों के साथ उनके लिए राष्ट्रविरोधी तत्वों के साथ गठजोड़ करना मुश्किल नहीं होता. सच तो यह है कि एक राष्ट्र के रूप में भारत की अवधारणा पर उंगली उठाकर वे राष्ट्रीय अस्मिता और इसके अस्तित्व के लिए वैचारिक स्तर पर भी खुली चुनौती पेश करने में सक्षम होते हैं. नक्सलियों के लिए नक्सलवाद कोई समस्या नहीं है, बल्कि वे तो इसे देश की कई समस्याओं के समाधान के रूप में देखते हैं. ख़बरों के मुताबिक़, नक्सलियों ने नेपाल में सक्रिय माओवादियों से भी गठजोड़ कर लिया है और पश्चिम बंगाल के दोआर क्षेत्र और सिक्किम के तराई इलाक़ों में पीढ़ियों से रह रहे नेपालियों के दिलों में भारत के ख़िला़फ असंतोष पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. उनका उद्देश्य लोगों को आत्म निर्णय के अधिकार के लिए उकसा कर आंदोलन खड़ा करना है, ताकि बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाई जा सके. आज नक्सली पाकिस्तानी ख़ु़फिया एजेंसी आईएसआई के हाथों का भी खिलौना बन चुके हैं. आईएसआई नक़ली दवाओं और नोटों के प्रसार जैसे राष्ट्रविरोधी कामों के लिए उनका इस्तेमाल कर रहा है. इसके बदले में वह नक्सलियों को अत्याधुनिक हथियार और विस्फोटकों के निर्माण एवं इस्तेमाल की तकनीक मुहैया कराता है. सुरक्षाबलों द्वारा ज़ब्त किए गए हथियारों से यह बात प्रमाणित हो चुकी है. मौजूदा माहौल में कट्टरवादी इस्लामी ताक़तों और मार्क्सवादी-लेनिनवादी ताक़तों के बीच एक विस्तृत गठजोड़ की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन सबका एक ही उद्देश्य है, भारत के लिए परेशानियां खड़ी करना.
नक्सलवाद की समस्या से निबटने के लिए हमें अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है. क़ानून और व्यवस्था से बढ़कर हमें इसके सामाजिक-आर्थिक आयामों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी. यदि हम वास्तव में इस समस्या से मुक़ाबला करना चाहते हैं तो इसके लिए बहुआयामी रणनीति बनानी होगी. दूरदर्शी योजना और केंद्र एवं नक्सल प्रभावित राज्यों के बीच सामंजस्य स्थापित कर एक राष्ट्रीय नीति का निर्माण इस दिशा में पहला क़दम हो सकता है. पुलिसबलों का आधुनिकीकरण करने भर से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें उनकी संख्या बल का भी विस्तार करना होगा. बेहतर प्रशिक्षण, क्षेत्रीय ज़रूरतों के मुताबिक़ रणनीति का निर्माण और सुरक्षाबलों का बेहतर मनोबल स्तर नक्सली ख़तरे से निबटने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
छत्तीसगढ़ में प्रयोग किए गए सलवाजुड़ूम, जिसमें स्थानीय लोगों को दो हज़ार रुपये के मासिक पारिश्रमिक पर स्पेशल पुलिस फोर्स के रूप में तैनात किया जाता था,की तर्ज पर पब्लिक पीस फोर्स का गठन जैसे क़दमों पर नए सिरे से विचार कर उसे बढ़ावा दिया जा सकता है. 2005 में दंतेवाड़ा में अस्तित्व में आए सलवाजुड़ूम का पिछला अनुभव इस काम में मददगार हो सकता है. जम्मू-कश्मीर के आतंक प्रभावित क्षेत्रों में ऐसी कोशिशें खासी सफल रही हैं और कोई कारण नहीं है कि देश के दूसरे हिस्सों में नक्सलियों से मुक़ाबला करने के लिए ऐसे प्रयास सफल नहीं हो सकते. आंध्र प्रदेश में इस्तेमाल किया गया ग्रेहाउंड प्रयोग भी इसका एक और उदाहरण है. लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि ऐसी कोशिशों से समाज का विभाजन न हो जाए, वरना इसके परिणाम ख़तरनाक भी हो सकते हैं.
इतना ही नहीं, नक्सलियों से मुक़ाबले के लिए बनाई जाने वाली किसी भी योजना में इससे प्रभावित लोगों का सहयोग और विश्वास हासिल करना अनिवार्य है, अन्यथा कोई भी रणनीति कारगर नहीं हो सकती. सरकारी एजेंसियों को नक्सलियों द्वारा बनाए गए सरकार के जनविरोधी चरित्र को ख़त्म करने के लिए भी प्रयास करने होंगे. हालांकि ऐसे प्रयास अभी भी जारी हैं, लेकिन उन्हें और भी गंभीरता एवं मज़बूती से अमल में लाना होगा. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ग़रीबी, निरक्षरता और बेरोज़गारी उन्मूलन के लिए शुरू की गई सरकारी योजनाओं जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना, एमपीएलएडी, सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, स्पेशल कंपोनेंट प्लान, ट्राइबल सब-प्लान, इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और प्रधानमंत्री ग्रामीण रोज़गार योजनाओं का लाभ लक्षित लोगों तक पहुंच सके.
इसके अलावा नक्सल प्रभावित इलाक़ों के सर्वांगीण आर्थिक विकास के उद्देश्य से विशेष योजनाओं का निर्माण किए जाने की भी ज़रूरत है. यदि सरकार इस ओर ध्यान दे और लोगों का विश्वास हासिल करने की कोशिश करे तो नक्सलियों के प्रभाव वाले इलाक़ों में ख़ु़फिया तंत्र को भी मज़बूत किया जा सकता है, जो इस गंभीर समस्या से निबटने में अहम भूमिका निभा सकता है.
(लेखक पश्चिम बंगाल में आईएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने है और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)
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नक्सल वाद पर आज एक बहस का दौर चल निकला है समर्थक जहा इसे ग़रीबो आदिवासीयो और शोषित वर्ग के हितो की लड़ाई बता रहे हैं वही विरोधी इसे देश के विरुध एक युध्ह बता रहे हैं लेकिन दोनो मे से कोई भी सच समझने को तय्यार नही है नक्सल वाद के समर्थक ये क्यो भूल जाते हैं जिन लोगो का देश के लोकतंत्र मे कोई विश्वास नही है ,जिनका मकसद सिर्फ़ बंदूक के दम पर सत्ता परिवर्तन करना है जो लोग बाते तो ग़रीबो और शोषित वर्ग की करते हैं लेकिन खुद उनके पढ़ने के लिए बनाए गये स्कूलो को बम से उड़ा देते हैं,ना वाहा सड़के बनाने देते हैं ना रोज़गार के लिए किसी योजना को चलने देते हैं ना उन ग़रीबो तक स्वास्थ सेवाए पहुचने देते हैं वो बात ग़रीबो की नही करते वो तो चाहते हैं की ये ग़रीबी और ये पिछड़ापन बना रहे ताकि इनकी समान्तर सता चलती रहे अगर ये ग़रीबो के हितैषी ही हैं तो कैसे झारखंड मे (जहा ये इतनी ताक़त मे हैं की विधायक से लेकर सांसद तक को मार देते हैं)ग़रीबो के पैसे को नेताओ ने अपनी मर्ज़ी से लूटाया लेकिन इनकी दुश्मनी उनसे नही क्योकि वो तो इन्हे पैसा खिलाते रहे और खुद खाते रहे इनकी दुश्मनी को उन जवानो से है जो देश के लिए लड़ने की कसम खाते हैं फिर चाहे उन्हे किसी से भी लड़ना पड़े ,अपने आप को शोषित वर्ग की आवा ज कहने वाले ये सिर्फ़ समाज विरोधी हैं ,और एक तरफ हैं नक्सल वाद के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की माँग करने वाले ये सही है की इन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन क्या जिन माँगो के लिए ये लोग अपनी लड़ाई को जायज़ ठहरा रहे हैं उसके बारे मे सोचा जा रहा है क्यो बड़ी औध्योगिक परियोजनाओ के नाम पर आदिवासीयो और किसानो को उजाड़ा जा रहा है अगर ये सब कुछ विकास के नाम पर हो रहा है तो क्यो देश मे ३७% लोग आज ग़रीबी की रेखा से नीचे पहुच गये ,देश की नितिनिर्माताओ को सोचना चहाइए की उनकी नीतिया देश ई ९०% आबादी के लिए हैं या सिर्फ़ १०% लोगो के लिए .