पंचायत चुनाव की कठिन डगर

झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन 15 जून से पहले पंचायत चुनाव की घोषणा कर चुके हैं और उप मुख्यमंत्री रघुवर दास उनके सुर में सुर मिलाकर बरसात के पहले पंचायत चुनाव करा लेने का दावा कर रहे हैं. हाल में भूरिया आयोग के अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह भूरिया एक कार्यशाला में शिरकत करने रांची आए. वह राज्यपाल समेत अन्य प्रमुख राजनेताओं से मिले. इस मौके पर उन्होंने पेसा क़ानून के तहत जल्द से जल्द पंचायत चुनाव कराने का अनुरोध किया. उनका कहना था कि शेड्यूल एरिया धारा 244 के  तहत केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह यहां की आदिम जनजातियों और मूल निवासियों को उनका हक़ दिलाए. उन्होंने कहा कि खनिज संपदा पर पहला हक़ आदिवासियों का ही बनता है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां पंचायत चुनाव नहीं होने देना चाहतीं, लेकिन पेसा एक्ट के जरिए चुनाव कराना ही इस क्षेत्र के विकास का एकमात्र रास्ता है. उनका यह भी कहना था कि पेसा क़ानून के तहत चुनाव कराने से आदिवासियों की पारंपरिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

झारखंड हाईकोर्ट ने पेसा क़ानून के विरोध में फैसला दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पेसा क़ानून के  तहत पंचायत चुनाव कराने का फैसला देकर हाईकोर्ट के फैसले को उलट दिया. इसकी प्रतिक्रिया भी उल्टी हुई. जहां वर्ष 2005 में हाईकोर्ट के फैसले के बाद आदिवासी समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए थे, वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड के सदान आंदोलित हो उठे.

भूरिया कमेटी के सदस्य बंदी उरांव मानते हैं कि पेसा क़ानून से ग्रामीणों को लघु वन उपज, माइनर मिनरल और बाज़ार की व्यवस्था का लाभ मिलेगा. उनका दावा है कि पेसा क़ानून आदिवासियों के हित में है. इसी प्रकार के विचार सूचना आयुक्त गंगोत्री कुजूर और विकास भारती के अशोक भगत के  भी हैं. उनका मानना है कि पेसा क़ानून के तहत पंचायत चुनाव होने से आदिवासी खुशहाल होंगे और राज्य भी खुशहाल होगा.

दूसरी तरफ ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि झारखंड के सदान पेसा क़ानून को वर्तमान स्वरूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. वे इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं. झारखंड के प्रखंडों और जिला मुख्यालयों से लेकर राजधानी तक वे धरना, प्रदर्शन एवं मशाल जुलूस आदि के जरिए अपना विरोध प्रकट कर चुके हैं. उनका कहना है कि यदि पेसा क़ानून में संशोधन के बगैर चुनाव कराए गए तो राज्य में गृह युद्ध छिड़ सकता है. दरअसल शेड्यूल एरिया एक्ट में ज़िले को प्राथमिक इकाई मान लिया गया है. सदानों का कहना है कि किसी भी ज़िले की सभी पंचायतें आदिवासी बहुल नहीं हैं. कई पंचायतों में तो आदिवासी आबादी है ही नहीं. सदान विकास परिषद के  अध्यक्ष पांडे हिमांशु नाथ राय एवं उपाध्यक्ष बब्बन सिंह का कहना है कि सरकार पेसा क़ानून में आवश्यक संशोधन कराने के बाद ही चुनाव कराए तो उचित होगा. शेड्यूल एरिया की प्राथमिक इकाई पंचायत को माना जाए और अन्य विसंगतियां दूर की जाएं, तभी सौहार्दपूर्ण माहौल में चुनाव संपन्न हो सकता है. 27 प्रतिशत आदिवासियों के लिए 73 प्रतिशत सदानों के हितों की अनदेखी करना कहीं से भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत न्यायसंगत नहीं है.

ग़ौरतलब है कि झारखंड हाईकोर्ट ने पेसा क़ानून के विरोध में फैसला दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पेसा क़ानून के  तहत पंचायत चुनाव कराने का फैसला देकर हाईकोर्ट के फैसले को उलट दिया. इसकी प्रतिक्रिया भी उल्टी हुई. जहां वर्ष 2005 में हाईकोर्ट के फैसले के बाद आदिवासी समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए थे, वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड के सदान आंदोलित हो उठे. एक तरफ जहां उन्होंने अपना विरोध जताया है, वहीं कई संगठनों में विभाजित सदान इस मुद्दे को लेकर अब एक मंच पर आ चुके हैं. पेसा क़ानून देश के नौ आदिवासी बहुल राज्यों में लागू है. इनमें छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव संपन्न हो चुके  हैं. झारखंड ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां अभी तक चुनाव नहीं कराए जा सके हैं. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इसे आदिवासी बहुल राज्य कहा ज़रूर जाता है, लेकिन 2001 की जनगणना के  अनुसार उनकी आबादी यहां मात्र 27 प्रतिशत है. सदान नेताओं का दावा है कि अब यह प्रतिशत और भी घट गया है.

पेसा क़ानून ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1874 में बने शेड्यूल डिस्ट्रिक्ट एक्ट पर आधारित है, जिसे गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 और 1935 में भी बहाल रखा गया था. बाद में इसे भारतीय संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल किया गया. अब समस्या यह है कि इस एक्ट के  तहत पूरे ज़िले को एक इकाई मान लिया गया है, जबकि एक ज़िले में कई प्रखंड होते हैं. एक प्रखंड में कई पंचायतें होती हैं. एक पंचायत में कई गांव होते हैं और एक गांव में कई टोले होते हैं. ज़िले के हर टोले में आदिवासियों की बहुलता हो, यह ज़रूरी नहीं है, लेकिन क़ानून का दायरा उन पंचायतों को भी समेट लेता है, जहां जनजातीय आबादी शून्य है. वहां दूसरे गांवों से इनके प्रतिनिधि उधार मंगाने होंगे. सदान चाहते हैं कि पेसा एक्ट में संशोधन किया जाए और ज़िले की जगह पंचायत को शेड्यूल एरिया की इकाई माना जाए, लेकिन अब सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद उसकी पूर्ण पीठ ही सदानों की भावनाओं पर विचार कर सकती है और पार्लियामेंट्री कमेटी ही आवश्यक संशोधन कर सकती है.

बहरहाल बरसात के पहले पंचायत चुनाव कराने का सरकारी दावा कहीं से भी व्यावहारिक नहीं दिखता. हालांकि सरकार ने इस बार के बजट में पंचायत चुनाव के  लिए 70 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, लेकिन जब तक इस क़ानून पर सर्वसम्मति नहीं बनती, चुनाव कराना कई तरह के विवादों को निमंत्रण देने जैसा होगा. राज्य में सत्तारूढ़ लोगों को इसका एहसास है. इसलिए जुबानी जमा खर्च तो किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर चुनाव की कहीं कोई तैयारी नहीं दिख रही है.

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