पर्यावरण सुरक्षा और भारत

क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति भारत का दृष्टिकोण

भारत ने अगस्त, 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और उसका अनुमोदन किया. इस प्रोटोकॉल की कई शर्तों से भारत को छूट हासिल है और तकनीकी हस्तांतरण एवं विदेशी निवेश के क्षेत्र में फायदा हो सकता है. जून, 2005 को जी-8 के सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि विकासशील देशों के मुक़ाबले विकसित देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की दर कहीं ज़्यादा है. भारत हालांकि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने की दिशा में अपनी ज़िम्मेदारियों से भलीभांति वाक़ि़फ है, फिर भी उसका मानना है कि विकसित देशों को इस दिशा में ज़्यादा प्रयास करने की ज़रूरत है. दूसरी ओर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का तर्क है कि आने वाले कुछ दशकों में भारत और चीन जैसे राष्ट्रों में औद्योगीकरण और तीव्र आर्थिक विकास के चलते उत्सर्जन की दर में तेज़ी आ सकती है.

कोपेनहेगन समझौता

कोपेनहेगन समझौते में भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील शामिल हैं. हालांकि समझौते के प्रावधान समझौते में शरीक राष्ट्रों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन यह क्योटो प्रोटोकॉल को बनाए रखने की अनुशंसा करता है. इसमें यह माना गया है कि जलवायु परिवर्तन मौजूदा दौर की गंभीरतम समस्याओं में से एक है और इससे तत्काल निपटने के लिए सम्मिलित ज़िम्मेदारी एवं योग्यता के सिद्धांत के अनुरूप मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है. पर्यावरण तंत्र के साथ मानवीय छेड़छाड़ की गंभीरता को रेखांकित करते हुए समझौते में इस वैज्ञानिक तथ्य को स्वीकार किया गया है कि दीर्घकालीन विकास और जलवायु परिवर्तन के नज़रिए से वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि दो डिग्री सेल्सियस से कम होनी चाहिए. इस ख़तरे से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों का पीड़ित राष्ट्रों पर पड़ने वाले असर, ख़ासतौर से ऐसे राष्ट्र जो इससे ज़्यादा प्रभावित हैं, को रेखांकित करते हुए समझौते में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ विस्तृत कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करने पर बल दिया गया है. इसमें यह भी माना गया है कि वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाए जाने की तत्काल ज़रूरत है (आईपीसीसी एआर 4). इतना ही नहीं, समझौते में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित करने के लिए कम उत्सर्जन पर आधारित विकास की रणनीति बनाई जानी चाहिए.

ऐसे विकासशील देश जहां पहले से ही उत्सर्जन का स्तर कम है, उन्हें विकास के इसी रास्ते पर चलने के लिए प्रोत्साहित करने की बात कही गई है. समझौते में कहा गया है कि इन देशों में कम उत्सर्जन सुनिश्चित करने वाली विकास प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए तमाम आर्थिक और तकनीकी सहूलियतें मुहैया कराई जाएंगी. समझौते में यह सहमति भी बनी कि विकसित राष्ट्र साल 2010-2012 के बीच 30 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त कोष पैदा करेंगे.

इसमें कहा गया है कि उत्सर्जन के ख़िला़फ विकासशील राष्ट्रों में प्रतिरोधी क्षमता के विकास और उन पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं सामंजस्य से तत्काल क़दम उठाए जाने चाहिए. ऐसे देशों में मुख्य रूप से अल्प विकसित राष्ट्र, छोटे द्वीपीय राष्ट्र और अफ्रीकी महादेश के राष्ट्र शामिल हैं. समझौते में विकसित राष्ट्रों से यह अपील की गई है कि जलवायु परिवर्तन के गंभीर ख़तरे से निपटने के लिए वे विकासशील राष्ट्रों को पर्याप्त और दीर्घकालीन आर्थिक एवं तकनीकी संसाधन मुहैया कराएं. उत्सर्जन को कम करने की दिशा में इसमें कहा गया है कि विकसित राष्ट्र 31 जनवरी, 2010 से पहले साल 2020 तक उत्सर्जन के स्तर में कमी से संबंधित अपने लक्ष्य की घोषणा करेंगे और क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं के मद्देनज़र इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रयास करेंगे. विकसित राष्ट्रों की इन कोशिशों का सीओपी के दिशानिर्देशों के तहत आकलन और पुनरीक्षण किया जाएगा. विकासशील देशों को भी उत्सर्जन के अपने लक्ष्यों को 31 जनवरी, 2010 से पहले घोषित करना होगा. अल्प विकसित और छोटे द्वीपीय राष्ट्रों के लिए इसमें कहा गया है कि वे अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर इस दिशा में स्वत: ही कदम उठाएंगे.

समझौते में बताया गया है कि विकासशील देश संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय के माध्यम से हर दो साल पर अपने प्रयासों का लेखाजोखा प्रस्तुत करेंगे. समझौते में जंगलों की कटाई से होने वाले उत्सर्जन की भूमिका पर भी जोर दिया गया है और इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में होने वाली वृद्धि को कम करने की ज़रूरत को रेखांकित किया गया है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए विकसित देशों से आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए एक सुनियोजित तंत्र विकसित करने की ज़रूरत पर भी बल दिया गया है और ऐसे मौक़ों की तलाश करने की बात की गई है, जिससे उत्सर्जन के स्तर में कमी लाने के इन प्रयासों को बाज़ार के मुताबिक़ कम ख़र्चीला बनाया जा सके.

ऐसे विकासशील देश जहां पहले से ही उत्सर्जन का स्तर कम है, उन्हें विकास के इसी रास्ते पर चलने के लिए प्रोत्साहित करने की बात कही गई है. समझौते में कहा गया है कि इन देशों में कम उत्सर्जन सुनिश्चित करने वाली विकास प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए तमाम आर्थिक और तकनीकी सहूलियतें मुहैया कराई जाएंगी. समझौते में यह सहमति भी बनी कि विकसित राष्ट्र साल 2010-2012 के बीच 30 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त कोष पैदा करेंगे. इतना ही नहीं, साल 2020 के आते-आते विभिन्न स्रोतों से हर साल 100 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त कोष जमा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया, जिसका इस्तेमाल विकासशील देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों के हित में किया जाएगा. इन प्रयासों के लिए भविष्य में भी आर्थिक सहायता सरकारी तंत्र के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी.

समझौते के तहत एक कोपेनहेगन ग्रीन क्लाइमेट फंड की स्थापना का प्रावधान है, जो उत्सर्जन में कमी लाने के विकासशील देशों के प्रयासों, नीतियों और कार्यक्रमों के प्रोत्साहन के काम में उपयोगी होगी. इस दिशा में एक उच्चस्तरीय निकाय के गठन का भी प्रावधान है, जो हर देश की ज़रूरत के हिसाब से तकनीकों के हस्तांतरण पर नज़र रखेगा और इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित भी करेगा.

अंत में इसमें यह भी कहा गया है कि समझौते के प्रावधानों के क्रियान्वयन की समीक्षा 2015 तक पूरी कर ली जाएगी. यह समीक्षा समझौते के दीर्घकालीन लक्ष्यों, जैसे वैश्विक तापमान में वृद्धि की दर को 1.5 डिग्री तक नियंत्रित करना, के संदर्भ में की जाएगी. समझौते में शामिल सभी देश, जिनमें भारत भी शामिल है, का स्पष्ट मानना है कि हालांकि वे इन सभी प्रावधानों को सिद्धांत रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन ये प्रावधान क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं.

पर्यावरण से संबंधित रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के दिशानिर्देश

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने सभी बैंकों से यह अपील की है कि वे परियोजनाओं के लिए लोन आवंटन की प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन का ध्यान रखें. आरबीआई के दिशानिर्देशों के मुताबिक़, बैंक के अलावा कॉरपोरेट सेक्टर को भी अपनी व्यवसायिक रणनीति में कार्बन उत्सर्जन की समस्या को जगह देनी होगी. इस परिप्रेक्ष्य में निम्न पांच प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखना मददगार हो सकता है:

निरंतरता : व्यवसायिक मुना़फे को बढ़ाने के लिए ऐसी नीति अपनाई जाए, जो सामाजिक और पर्यावरणीय ज़रूरतों से मेल खाती हो.

कोई नुकसान नहीं : अपनी व्यवसायिक गतिविधियों को इस तरह नियंत्रित करना कि पर्यावरण और समाज को कोई नुक़सान न पहुंचे.

उत्तरदायित्व     : अपनी व्यवसायिक गतिविधियों का पर्यावरण एवं समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की पूरी ज़िम्मेदारी लेना.

जवाबदेही       : व्यवसायिक गतिविधियों से प्रभावित होने वाले सभी पक्षों के प्रति जवाबदेही.

पारदर्शिता      : सभी संबद्ध पक्षों के साथ पारदर्शिता बनाए रखना. यहां पारदर्शिता से तात्पर्य केवल नियमित अंतराल पर प्रसारित-प्रकाशित की जाने वाली उद्‌घोषणाएं नहीं हैं, बल्कि पूछे जाने पर बैंक की नीतियों, प्रक्रियाओं और लेनदेनों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराने से है.

अन्य प्रतिबद्धताएं

2009 में कोपेनहेगन सम्मेलन की शुरुआत में भारत के पर्यावरण मंत्री ने ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए हर प्रयास के प्रति भारत के सहयोग और समर्थन की घोषणा की. उन्होंने इस संदर्भ में छह ऐसे क़दमों का ख़ासतौर पर ज़िक्र किया, जिन्हें देश के क़ानून में जगह देने की पहल शुरू हो चुकी है, जैसे- साल 2011 तक ईंधन के साधनों में सभी आवश्यक मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना. 2012 तक निर्माण कार्यों में सभी आवश्यक मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना. वनीकरण में वृद्धि, ताकि देश के कुल कार्बन उत्सर्जन का कम से कम 10 प्रतिशत उसके जंगलों में ही खप जाए. 2020 तक ईंधन के मानकों में 10 प्रतिशत और वृद्धि. साल 2020 तक देश के कुल बिजली उत्पादन में वायु, सौर एवं हाइड्रो स्रोतों की 20 प्रतिशत हिस्सेदारी (फिलहाल यह केवल 8 प्रतिशत है) संभव हो सके और सभी नई कोयला परियोजनाओं में 50 प्रतिशत को कोयला मुक्त बनाना.

धनी राष्ट्र केवल उपदेश देते हैं, प्रयास नहीं करते

विश्व के धनी देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर में कोई कमी नहीं आई है. यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) द्वारा जारी किए ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाता है. यूएनएफसीसी के इन आंकड़ों में क्योटो प्रोटोकॉल के अनुसार 1990 को आधार वर्ष (बेस इयर) माना गया है. इसके मुताबिक़, साल 2007 में धनी राष्ट्रों में उत्सर्जन के स्तर में 1990 के मुक़ाबले 12.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि उक्त सभी राष्ट्र क्योटो प्रोटोकॉल को मानने के लिए अपनी हामी भर चुके हैं. इन 17 सालों में अकेले अमेरिका में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 17 प्रतिशत इज़ा़फा हुआ है. इसके बावजूद भारत धनी देशों के निशाने पर है, जबकि उत्सर्जन के मामले में भारत का रिकॉर्ड अमीर देशों के मुक़ाबले कहीं अच्छा है. फिर भी तीव्र आर्थिक विकास के नाम पर धनी राष्ट्र भारत को ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार बताते हैं. जलवायु परिवर्तन पर बहुपक्षीय बातचीत के इस निराशाजनक माहौल को देखते हुए भारत और चीन ने अपने स्तर पर इस दिशा में कुछ क़दम उठाने की पहल की है. ग्लोबल वार्मिंग और इससे संबंधित अन्य पर्यावरणीय मामलों में बेहतर सहयोग और जानकारियों के आदान-प्रदान के लिए दोनों देशों ने एक सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर भी किए हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि जलवायु परिवर्तन की समस्या से लड़ने के लिए अलग-अलग स्तरों, द्विपक्षीय, बहुपक्षीय और क्षेत्रीय, पर पहल करना व़क्त की ज़रूरत है. संयुक्त राष्ट्र समर्थित 192 देशों के बीच बहुपक्षीय बातचीत का अपना अलग महत्व है. इसने विभिन्न देशों के बीच विचार-विमर्श के अलावा नागरिक संस्थाओं एवं मीडिया में इसे गर्मागर्म बहस का मुद्दा बना दिया है. वास्तविकता यह है कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता भले बढ़ी हो, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका कोई ख़ास परिणाम नहीं निकल पाया है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के ताज़ा आंकड़ों को देखें तो यही लगता है कि अभी तक इसके परिणाम अपेक्षाओं के विपरीत ही रहे हैं.

प्रभावोत्पादकता के नज़रिए से द्विपक्षीय बातचीत और समझौते ज़्यादा सफल हो सकते हैं, क्योंकि इनमें लक्ष्यों की स्पष्ट व्याख्या होती है और उन पर नज़र रखने के लिए समुचित निगरानी तंत्र का गठन भी आसान है. देश में कोयला परियोजनाओं और गाड़ियों की बढ़ती संख्या के चलते चीन वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है.  इससे निपटने के लिए चीन ने स्वच्छ तकनीकों के इस्तेमाल की योजना बनाई है और इस मुद्दे पर भारत-चीन के बीच सहयोग काफी संभावनाएं पैदा कर सकता है. दोनों देश यानी भारत और चीन तकनीकी रूप से सक्षम हैं और यदि वे उत्सर्जन के अलावा प्रदूषण के अन्य कारकों पर नियंत्रण करने में कामयाब रहे तो यह उनके नागरिकों के लिए काफी अच्छा होगा. तकनीक, सूचनाओं एवं एक-दूसरे के अनुभवों के आदान-प्रदान से भी काफी कुछ हासिल किया जा सकता है.

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