सार-संक्षेप

प्रारंभिक शिक्षा की केंद्रीय योजना कहां गई?

केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा में गुणात्मक सुधार और उसे रोचक बनाने के प्रयास में अरबों रुपए ख़र्च करने के बाद भी राज्य में सैटेलाईट के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा (एडूसेट) की योजना पूरी तरह नाकाम हो गई है. इस योजना को सर्वप्रथम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सीधी ज़िले में, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रारंभ किया था. मोनिटरिंग के अभाव में और तक़नीकी ख़राबियों के चलते सीधी और सिंगरौली ज़िले में ही नहीं, बल्कि प्रदेश के अधिकांश ज़िलों में भी यह योजना दम तोड़ चुकी है. इस योजना को इसरो, इग्नू और मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से लागू किया गया था. इस योजना के तहत दो लाख रुपए का सामान शिक्षा केंद्रों को उपलब्ध कराया गया था. केवल सिंगरौली के बेढ़न क्षेत्र में ही 65 विद्यालयों में सवा करोड़ रुपए ख़र्च किये गए थे, परंतु अब इस योजना का अस्तित्व इस क्षेत्र में कही नहीं है.

इमारती लकड़ी का दुरुपयोग ज़ारी

वनों में रहने वाले आदिवासियों का बहुत गहरा संबंध वनों के साथ है. सरकारी तंत्र लगातार आरोप लगाता है कि आदिवासी वन काट रहे हैं, जबकि मंडला ज़िले में ही यह तथ्य ग़लत साबित होता है. मंडला से 40 किलोमीटर दूर ग्राम बबलिया में जंगलों की लकड़ी एक ट्रैक्टर में खुलेआम ले जाई जा रही थी . ड्राईवर राजेंद्र से पूछने पर उसने सरपंच का माल बताया और पुरानी तारीख़ की एक रसीद भी दिखा दी. रसीद भी ऐसी, जिसपर न हस्ताक्षर थे और न ही सील. बाद में पता चला कि इसी गांव के ईट-भट्‌टे के ठेकेदार भूरा यादव, ईटों का भट्‌टा वनों की लकड़ी के माध्यम से ही चलाते हैं. जंगल विभाग के डिप्टी रेंजर एमडी अवस्थी ने इस अवैध कार्यवाही से मुंह मोड़ते हुए यह बयान दे दिया कि भट्‌टे में लकड़ियां है ही कहां, इसमें तो कोयला जल रहा है.  डीएफओ श्री कोरी के मुताबिक़ इस पूरे मामले की जांच की जाएगी.

मंदाकिनी का अस्तित्व खतरे में

मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के वनवास के दौरान जिस नदी को राम, लक्ष्मण के स्नान का पुण्य प्राप्त था वह मंदाकिनी नदी प्रदूषण के कारण अपना अस्तित्व खोती जा रही है. जल आंदोलन से जुड़े हुए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि लाचारी, बेकारी, बीमारी और विस्थापन का शिक़ार हमारी नदियां ही हुई हैं. वह कहते हैं कि इस क्षेत्र में कभी पुण्य सलिला कही जाने वाली मंदाकिनी का अस्तित्व आज संकट में है. गत वर्ष हुए अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव के एजेंडे से भी मंदाकिनी ग़ायब थी. यदि यही आलम रहा तो आने वाले समय में इस नदी का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा. मंदाकिनी का इतिहास धार्मिक एकता पर आधारित है. इस नदी के तट पर एक ओर रामघाट है तो ठीक दूसरी ओर रहीम घाट भी निर्मित है.राजेंद्र सिंह का कहना है कि मंदाकिनी को इस समय सर्वाधिक ज़रूरत एक जन आंदोलन की है, जो संभवत: इसके भविष्य को सुरक्षित कर सकता है.

यात्री कुलियों से परेशान हैं

जबलपुर रेलवे स्टेशन पर इन दिनों कुलियों की मनमानी चल रही है. जबलपुर रेलवे स्टेशन में कुल 79 कुली रजिस्टर हैं जिन्हें 12-12 घंटे की शिफ्ट में काम दिया जाता है. नियमों के विपरीत काम के दौरान इनके बीच ही आपसी तकरार का माहौल कई बार बन जाता है. कुलियों की समस्याओं से निपटने में स्थानीय रेलवे पुलिस भी कोई रूचि नहीं लेती है. शहर में आने वाले यात्रियों से ये कुली निर्धारित पारिश्रमिक से 25 से 30 प्रतिशत अधिक राशि वसूल करते हैं. एक कुली की मासिक आय इस स्टेशन पर 6 हज़ार रुपए के आसपास है. इन कुलियों को सालभर में आने जाने का पास, रेलवे अस्पताल में मुफ़्त इलाज और नए बज़ट में स्वास्थ्य बीमा सुविधाएं प्रदान की गई हैं. कुलियों को प्रशासन से शिक़ायत है कि गैंगमैनों की भर्ती में वरिष्ठता को नज़र अंदाज़ किया जाता है. पुराने कुलियों को उपेक्षित कर नए कुलियों की भर्ती की जाती है.  इलाज के दौरान महंगी दवाईयां भी स्वयं ख़रीदनी पड़ती हैं. ड्रेस के रूप मे दो मीटर से भी कम कपड़ा मिलता है. कुली विश्रामालय की हालत भी जर्ज़र है. इन शिक़ायतों के बावज़ूद कुलियों से यात्रियों को होने वाली परेशानियों का हल किसी के पास नहीं है.

वनग्रामों में मांझी सेना

मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों में स्थित आदिवासियों एवं वनवासियों के गांवों में अधिकारों के प्रति जागरूकता लाने के लिए मांझी सेना नामक संगठन अपना नेटवर्क फैला रहा है. मांझी सेना के बढ़ते प्रभाव को कुछ लोग नक्सली गतिविधियों से भी जोड़कर देखते हैं. मध्य प्रदेश की लगभग एक तिहाई आबादी वन क्षेत्रों में रहती है. इनमें गोंड एवं भील जनजाति के लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा है, लेकिन आज भी इन जनजातियों में साक्षरता और शिक्षा की कमी है. इसी कारण लोग अपने अधिकारों के प्रति अंजान हैं. मांझी सेना ने लगभग एक सौ से ज़्यादा स्वयंसेवक तैयार कर उन्हें वनवासियों एवं आदिवासियों के बीच भेजना शुरू किया है. उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सचेत होने और ज़रूरत पड़ने पर संघर्ष करने की सीख दी जा रही है. अकेले होशंगाबाद ज़िले में 15 से ज़्यादा गांवों में मांझी सेना के सदस्य बन चुके हैं और वे जब-तब जुलूस आदि का आयोजन कर अपनी ताक़त का प्रदर्शन भी करते हैं. हाल में होशंगाबाद के कलेक्टर को ज्ञापन सौंप कर मांझी सेना ने वन भूमि पर क़ाबिज़ वनवासियों को भू-अधिकार देने और वन मान्यता क़ानून पूरी तरह लागू करने की मांग की है. वनग्रामों में मांझी सेना के तेज़ी से फैल रहे नेटवर्क को कहीं वनवासियों के हित में बताया जा रहा है तो कहीं नक्सली गतिविधि के संकेत. वैसे इस सेना का प्रमुख उद्देश्य अपनी समस्या प्रशासन के सामने रखकर उनका समाधान कराना है. सेना के जवान हर माह अलग-अलग वनग्राम में बैठक कर समस्याओं की जानकारी लेते हैं. सभी जवान बैठक में बाक़ायदा वर्दी पहन कर उपस्थित होते हैं. जंगलों में रहने वाले आदिवासियों की मांझी सेना का मुख्यालय दिल्ली में है. अकेले होशंगाबाद ज़िले में सेना के लगभग 15 पदाधिकारी और तीस हज़ार जवान हैं. सभी जवानों को बेल्ट, टोपी एवं गणवेश दिल्ली मुख्यालय से दिए गए हैं.

मल्कीत के पांच लक्ष्य

ज़िला पंचायत के नवनिर्वाचित अध्यक्ष मल्कीत सिंह ने पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए पांच लक्ष्य निर्धारित किए हैं. पांच सालों में युवा मल्कीत सिंह बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में विशेष तौर पर काम करेंगे. आम आदमी को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना और ज़िले के आधारभूत ढांचे में सुधार की संभावनाओं की खोज करना मल्कीत सिंह एवं उपाध्यक्ष यादवेंद्र सिंह यादव का प्रमुख लक्ष्य है. देखना है, युवाओं के हाथों में सौंपी गई कमान ज़िले को पांच वर्षों में कहां से कहां तक ले जाती है.

कृषक राहत योजना पर किसानों का भरोसा नहीं

मध्य प्रदेश सरकार ने दो साल पहले जिस कृषक राहत योजना को शुरू किया था, उस पर किसानों को भरोसा नहीं है और इसी कारण लगभग तीन लाख़ ग्यारह हज़ार किसानों ने इस योजना को अपनाने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जनवरी 2008 में भोपाल में एक विशाल किसान महापंचायत का आयोजन कर बिजली बिल में राहत देने के लिए एक योजना शुरू करने की घोषणा की थी. लेकिन सरकार ने यह शर्त भी रखी थी कि बकाया वसूली के लिए जितना ऊर्जा प्रभार होगा, उसका 50 प्रतिशत माफ कर दिया जाएगा. इसके अलावा 50 प्रतिशत राशि जमा करने पर सरचार्ज की पूरी राशि ही मा़फ करने की बात भी कही गई थी. कृषकों पर 31 जनवरी 2008 तक 1044 करोड़ रुपए ऊर्जा प्रभार की राशि शेष थी, जिसमे 50 प्रतिशत मा़फ होने के बाद 521.82 करोड़ रुपया जमा होना था, और 242 करोड़ रुपए की सरचार्ज राशि को भी मा़फ किया जाना था. लेकिन अबतक मात्र 535616 किसानों ने ही योजना के तहत राशि जमा कराई है.

शिशुओं और माताओं की स्वास्थ्य रक्षा में कंजूसी

भारत में सबसे ज़्यादा बाल-मृत्युदर मध्य प्रदेश में है. इसके अलावा बच्चों में कुपोषण और गर्भवती तथा प्रसूता माताओं में खून की कमी के कारण उनका स्वास्थ्य हमेशा कमज़ोर रहता है. लेकिन मध्य प्रदेश सरकार पिछले पांच वर्षो में स्वास्थ्य बजट को खर्च करने में सबसे ज्यादा कंजूसी बच्चों और माताओं की ही स्वास्थ्य सेवाओं में ही कर रही है. राज्य सरकार के पास शिशु-मृत्युदर रोकने के लिए न तो कोई नीति है और न ही रणनीति. यही वज़ह है कि पिछले पांच सालों में सरकार इसके लिए आवंटित पूरी राशि, 65 करोड़ रुपए खर्च भी नहीं कर पाई है और इसमें से 26 करोड़ से अधिक राशि लैप्स हो गई. सत्ता में आने के बाद राज्य सरकार जब तक जागती, प्रदेश में शिशु-मृत्युदर भारत में सबसे ज़्यादा हो चुकी थी. अब राष्ट्रीय ग्रामीण-स्वास्थ्य मिशन की रणनीति का अनुसरण कर रही सरकार शिशु-मृत्युदर को बढ़ने का ठीकरा गर्भवती महिलाओं और उसके परिवारों पर ही फोड़ने की कोशिश कर रही है. प्रदेश में एक हज़ार जन्में शिशुओं में सत्तर की मौत हो जाती है. यह आंकड़ा देश भर में सबसे ज़्यादा पहुंच चुका है. सरकार का दावा है कि शिशु-मृत्युदर अधिक होने के पीछे कम उम्र में मां बनना, गर्भवती महिलाओं में खून की कमी होना, उचित देखभाल नहीं होना, संस्थागत प्रसव में कमी, बच्चों के कम वज़न का होना और उनका समुचित देखभाल नहीं होना आदि शामिल है. शिशु-मृत्यु दर रोकने के लिए आरसीएच कार्यक्रम के लिए पिछले पांच साल में 65 करोड़ 7 लाख रुपए के खर्च का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन जनवरी 2009-10 तक स़िर्फ 38 करोड़ 85 लाख 65 हज़ार रुपए ही ख़र्च किए जा सके. इसमें भी सबसे ज़्यादा राशि वर्ष 2008-09 और 2009-10 में ख़र्च की गई. इससे पहले करोड़ों रुपए में स़िर्फ चंद लाख रुपए ही ख़र्च किए जा सके. वर्ष 2005-06 और 2006-07 में सबसे कम पैसे ख़र्च किए गए.

भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है सरकार

मध्य प्रदेश का प्रशासन, भ्रष्टाचार की बुराई के लिए बुरी तरह बदनाम हो गया है. मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव भी प्रशासन का शुद्धिकरण करने का इरादा रखते हैं, लेकिन सब कहने भर की बातें हैं. सच्चाई तो यह है कि आज भी मध्य प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार को दबाने और संरक्षण देने में लगी हुई है. हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसआर आलम और अराधे की खण्डपीठ ने राज्य सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं के संचालक अशोक शर्मा द्वारा पल्स पोलियो कार्यक्रम के प्रभारी रहते हुए लगभग 12 करोड़ रुपयों का घपला करने के मामले में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से जवाब तलब किया है. न्यायालय ने सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का व़क्त दिया है. यह याचिका भोपाल के एक सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद सलीम की ओर से दायर की गई है. याचिका में कहा गया है कि डॉ. अशोक शर्मा ने पल्स पोलियो अभियान में 12 करोड़ रुपयों का घपला किया है. इस बारे में लोकायुक्त में दर्ज प्रकरण में जांच भी शुरू हो चुकी है. लेकिन प्रशासन ने अब तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया है. इस याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि इंदौर में मुख्य ज़िला स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अधिकारी के पद पर रहते हुए डॉ. अशोक शर्मा ने कई गंभीर वित्तीय हेरा-फेरी की थी. न्यायालय के कामकाज के जानकार बताते हैं कि याचिका दायर होते ही न्यायालय की ओर से इसकी एक प्रति सरकार के महाधिवक्ता कार्यालय को भेज दी जाती है. इसके अलावा याचिकाकर्ता भी अनावेदक या प्रतिवादी पक्ष को याचिका की सूचना देता है. निश्चित ही मोहम्मद सलीम की याचिका राज्य सरकार के प्रमुख स्वास्थ्य सचिव या मुख्य सचिव को उच्च न्यायालय के निर्देश के पहले ही मिल गई होगी, लेकिन भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने में माहिर प्रशासन ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. फिलहाल अशोक शर्मा दूसरे मामलों में निलंबित हैं, लेकिन इस नये मामले में अभी राज्य सरकार को अपना जवाब उच्च न्यायालय में एक माह के भीतर देना होगा.

पौने छह सौ करोड़ रुपए पानी में बहाए

मध्य प्रदेश का जल संसाधन विभाग कितना लापरवाह है इसका एक उदाहरण महानियंत्रक लेखा परीक्षक ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में दिया है. विभाग की लापरवाही से जलदरों का निर्धारण नहीं हो सका. नतीज़तन विभाग को पौने छह सौ करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ और सरकारी जलाशयों से पानी लेने वाले मुफ़्त में ही पानी का उपयोग करते रहे. रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंचाई क्षमता का अधिकतम उपयोग न कर पाने के चलते विभाग को 161 करोड़ रुपयों की राजस्व की क्षति हुई, तो वहीं दूसरी ओर राज्य के किसान कई इलाकों में पानी के लिए तरसते रहे. इसके अलावा जल दरों के ग़लत निर्धारण से सवा 24 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ. रिपोर्ट में बताया गया है कि सिंचाई और ग़ैर-सिंचाई उद्देश्यों के लिए जल-आपूर्ति की दरों के निर्धारण और संग्रहण में भारी कमियां पाई गईं और इसी वज़ह से सरकार को राजस्व क्षति हुई है.

आय 21 हज़ार और क़र्ज़ 9 हज़ार

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को भलीभांति मालूम है कि राज्य के नागरिकों की औसत आय 21648 रुपये वार्षिक है और सरकार ने प्रत्येक नागरिक को औसतन 9 हज़ार रुपये का क़र्ज़दार बना दिया है. मध्य प्रदेश सरकार ने पिछले छह वर्षों में जिस त़ेजी से क़र्ज़ लिया है, वह सरकारी हिसाब-किताब देखने से सा़फ पता चलता है. मार्च 2004 की स्थिति में राज्य सरकार पर 34109 करोड़ रुपये का क़र्ज़ था, जो मार्च 2009 की स्थिति के अनुसार 54111 करोड़ रुपये हो गया है. अनुमान है कि मार्च 2010 तक यह क़र्ज़ बढ़कर 60000 करोड़ रुपये हो जाएगा. पिछले चार वर्षों में जिस तेज़ी से क़र्ज़ का बोझ बढ़ा है, उस अनुपात में राज्य की विकास दर में वृद्धि नहीं हुई है. क़र्ज़ में लिया गया पैसा ज़्यादातर अनुत्पादक मदों में ही खर्च हुआ है.

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