यूपीए युवावस्था के मुहासों से परेशान है

साल 2010 अभी अपने युवावस्था में ही है. केंद्र सरकार के चेहरे पर अचानक नज़र आने लगे मुहासों की वजह भी कहीं यही तो नहीं है? यह न तो लाइलाज है और न ही ज़्यादा गंभीर. बस एक छोटी सी चाहत कि इस खुजलाहट और धब्बे वाले चेहरे के बिना ज़िंदगी शायद ज़्यादा आसान और हसीन होती. जनवरी तक सरकार बिल्कुल सेहतमंद और चाक-चौबंद नज़र आ रही थी, लेकिन मार्च आते-आते उसके क़दम लड़खड़ाने लगे और कम से कम एक वाकया ऐसा भी हुआ, जब लगा कि उसके पैर केले के छिलके पर फिसल गए हैं. अप्रैल में सरकार ने सावधानी भरा रुख़ अपनाया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अनिवार्य शिक्षा की ख़ूबियों को बताने के लिए देशवासियों से रूबरू हुए. हालांकि अनिवार्य शिक्षा के प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता छह दशक पहले ही ज़ाहिर कर चुके थे और इसे बहुत पहले ही कार्यरूप में परिणित हो जाना चाहिए था. हमें फिर भी प्रधानमंत्री की सराहना करनी चाहिए. आख़िर वह मूलत: एक शिक्षक हैं और उनकी गंभीरता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन हमें आश्चर्य उनका भाषण तैयार करने वाले लोगों पर होता है. वही पुराने, घिसे-पिटे मुहावरों के अलावा क्या वे नए विचारों, नई संभावनाओं और बदलाव की दिशा में नहीं सोच सकते? ज़रा सोचिए, मौजूदा माहौल में शिक्षा के प्रसार में मोबाइल फोन एक क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है. एक तो ज़रूरत और दूसरा इसका क्रेज मोबाइल फोन को दूरदराज के ग्रामीण इलाक़ों तक पहुंचा रहा है. मोबाइल फोन में उपलब्ध सुविधाओं में एसएमएस का अहम स्थान है, लेकिन इसके इस्तेमाल के लिए साक्षर होना ज़रूरी है. यदि आधुनिक तकनीक को बाज़ार की ज़रूरत के अनुरूप ढाला जा सके तो विकास का नया मॉडल तैयार हो सकता है.

मनमोहन का स्वाभिमान अभी भी कहीं नज़र नहीं आता. अब यह बात और है कि यूपीए की पहली पारी में उनके भाग्य से छींका भले टूटा हो, लेकिन गठबंधन के दूसरे शासनकाल में उनकी हैसियत के बारे में कोई शक नहीं रह गया है. समस्या स़िर्फ यह है कि उनकी सरकार अक्सर बेवजह उपजी समस्याओं में फंस जाती है. स्वभाव से सौम्य मनमोहन अब नौकरशाहों के साथ तो कड़ाई से पेश आने लगे हैं, लेकिन राजनीतिज्ञों के साथ पेश आने में वह पहले से भी ज़्यादा कमज़ोर नज़र आते हैं.

देश के नाम इस संबोधन से कहीं सोनिया गांधी का कोई रिश्ता तो नहीं है? राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) के रास्ते अप्रत्यक्ष रूप से सरकार में उनके प्रवेश की मंशा का असर कहीं मनमोहन सिंह के भाषण में नज़र तो नहीं आता. श्रीमती गांधी पिछले दो आम चुनावों में कांग्रेस की जीत की नायिका रही हैं, पार्टी अध्यक्ष और संसद में एक सामान्य सदस्य की तरह बैठने वाली सोनिया की वास्तविक हैसियत इससे कहीं ज़्यादा है. यूपीए के पहले शासनकाल में उन्होंने एनएसी को सामाजिक क्षेत्र के लिए नीति निर्माण के लिए इस्तेमाल किया. एनएसी से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद ही नीतियों को सरकारी स्तर पर आगे बढ़ाया जाता था. इसके पीछे छुपी मंशा यह थी कि मनमोहन सिंह एक अराजनीतिक प्रधानमंत्री हैं और उन्हें राजनीतिक धरातल पर सहयोग की ज़रूरत है. एनएसी के माध्यम से सोनिया अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री को वही सहयोग उपलब्ध कराती थीं. हालांकि ऐसी व्यवस्था में अक्सर संबद्ध पक्षों का स्वाभिमान आड़े आ जाता है, लेकिन मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व ऐसा है कि उन्हें देखकर व्यक्तिगत अहम या स्वाभिमान का एहसास भी नहीं होता.

मनमोहन का स्वाभिमान अभी भी कहीं नज़र नहीं आता. अब यह बात और है कि यूपीए की पहली पारी में उनके भाग्य से छींका भले टूटा हो, लेकिन गठबंधन के दूसरे शासनकाल में उनकी हैसियत के बारे में कोई शक नहीं रह गया है. समस्या स़िर्फ यह है कि उनकी सरकार अक्सर बेवजह उपजी समस्याओं में फंस जाती है. स्वभाव से सौम्य मनमोहन अब नौकरशाहों के साथ तो कड़ाई से पेश आने लगे हैं, लेकिन राजनीतिज्ञों के साथ पेश आने में वह पहले से भी ज़्यादा कमज़ोर नज़र आते हैं. एनएसी की दूसरी पारी से सोनिया की राजनीतिक हैसियत पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि उनकी हैसियत को तो किसी ने चुनौती दी ही नहीं थी. लेकिन एनएसी का दोबारा गठन प्रधानमंत्री के कमज़ोर होने का एहसास ज़रूर दिलाता है. इसकी वजह यह है कि छह साल तक प्रधानमंत्री रहने के बाद उन्हें ऐसी मदद की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए थी. राजनीति में वास्तविकताएं कभीकभार ही सामने आती हैं. ऐसे में जो सामने दिखता है, लोग उसी को सच्चाई मान लेते हैं. दिल्ली के राजनीतिक हलकों में शारीरिक भाषा को प़ढने में लोगों को ज़्यादा समय नहीं लगता. कैबिनेट की बैठकों में मंत्रियों की ग़ैर मौजूदगी की शिक़ायत प्रधानमंत्री पहले ही कर चुके हैं. ऐसा नहीं है कि महत्वपूर्ण बैठकों से नदारद रहने वाले मंत्रीगण कहीं और देशसेवा में लगे हैं. उन्हें तो अपनी ज़िम्मेदारियों की कोई फिक्र ही नहीं है. लेकिन क्या वे सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई बैठकों से नदारद रहने की हिमाकत कर सकते हैं?

प्रधानमंत्री इससे ख़़फा हैं कि भारत-अमेरिका संबंध, पाकिस्तान के साथ शांति और आर्थिक सुधार के जिन तीन मुद्दों पर उन्होंने मज़बूती से क़दम आगे ब़ढाए, उनकी गति अचानक रुक गई है. आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान ने भारत को अंगूठा दिखा दिया और अमेरिका एवं चीन उसकी मदद के लिए आगे आ गए. बराक ओबामा ने मनमोहन सिंह के लिए शाही डिनर का आयोजन किया, लेकिन रणनीतिक बातचीत पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कयानी के साथ की. चीन ने भारत को सलाहें तो ख़ूब दीं, लेकिन और कुछ नहीं. जबकि पाकिस्तान को 82 प्रतिशत लोन सुविधा के साथ दो परमाणु प्लांटों का तोह़फा दिया. अब वह 2.5 बिलियन डॉलर का निवेश कर ईरान गैस पाइप लाइन को पाकिस्तान होते हुए आगे ब़ढाने की संभावनाएं तलाश रहा है. मनमोहन सिंह ने वाशिंगटन को ख़ुश करने के लिए ईरान-पाक-भारत गैस पाइप लाइन परियोजना से अपने हाथ खींच लिए, लेकिन इस्लामाबाद ऐसे किसी ख़ौ़फ से दूर है.

आर्थिक सुधारों की राह में अड़ंगा लगाने के लिए प्रधानमंत्री पांच साल तक वामदलों को जिम्मेदार बताते रहे. वामदल आज भले ही हाशिए पर हैं, लेकिन आर्थिक सुधार कहां हैं? एक राजनीतिक दल की हैसियत से जनभावनाओं को समझते हुए कांग्रेस ने सरकार के परमाणु उत्तरदायित्व विधेयक के ख़िला़फ छुपा अभियान चला दिया है. यह विधेयक पहले ही भारतीय संसद और अमेरिकी परमाणु उद्योग के दो पाटों के बीच पिस रहा है. एनएसी का दोबारा गठन संगठन और सरकार के बीच की दूरी की ओर इशारा करता है. संगठन का सारा उद्देश्य जहां अगले चुनावों में जीत हासिल करना है, वहीं सरकार का सारा ध्यान शासन चलाने पर है. ख़ुद सोनिया गांधी द्वारा चुने गए एनएसी के सदस्य एक पोलित ब्यूरो की तरह काम करेंगे. वे लोकलुभावन नीतियों की रूपरेखा तैयार करेंगे और फिर उनके क्रियान्वयन के लिए सरकार पर दबाव बनाएंगे.

2014 के आम चुनावों के लिए अभी से चिंता करना कहीं सोनिया की जल्दबाज़ी तो नहीं है? वह दरअसल आत्मविश्वास और अति आत्मविश्वास के बीच की खाई को पाटना चाहती हैं. महिला आरक्षण विधेयक पर मचे हल्ला-हंगामे से पार्टी तो मज़बूत हुई, लेकिन सरकार कमज़ोर हो गई. कहावतें बोलने में उस्ताद लालू यादव ने कह दिया कि लाश को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए चार लोग ही काफी होते हैं और उनके पास चार सांसद हैं. सरकार को कोई ख़तरा नहीं है, लेकिन एक अनिश्चितता का माहौल तो बन ही गया है, जिसे विपक्षी दल सदन की अगली बैठकों में भुनाने की कोशिश कर सकते हैं. अपनी कमज़ोरी को पहचान कर उसके लिए तैयारी करने में जल्दबाजी जैसी कोई बात नहीं होती.

अमिताभ बच्चन वाले मामले में भी कांग्रेस केले के छिलके पर फिसल गई. लोग हंसते रहे और पार्टी बयान पर बयान देती रही. जब चेहरे पर मुहासों की टीस कहीं अंदर महसूस हो रही हो तो अक्सर छोटी बातें भी बुरी लग जाती हैं, जबकि एक छोटी सी मुस्कान किस्से को वहीं ख़त्म कर सकती है.